साइकिल पर निबंध Essay on Bicycle in Hindi

दोस्तों आज का लेख साइकिल पर निबंध Essay on Bicycle in Hindi पर दिया गया है. हम सभी के जीवन में साइकिल का कभी न कभी बड़ा महत्व रहा है, खासकर स्कूल जाने के दिनों में बच्चों को साइकिल की सवारी का बड़ा शौक हुआ करता हैं. आज के साइकल निबंध भाषण स्पीच अनुच्छेद में हम साइकिल के महत्व लाभ आदि बिन्दुओं पर आधारित शोर्ट हिंदी निबंध प्रस्तुत कर रहे हैं.

साइकिल पर निबंध Essay on Bicycle in Hindi

साइकिल पर निबंध Essay on Bicycle in Hindi

हमारे बचपन के दिनों में हीरो साइकिल बेहद लोकप्रिय हुआ करती थी. स्कूल के बहुत से साथी इसी पर सवारी कर स्कूल आते और जाते थे. साइकिल चलाना सीखना हर बच्चें का सपना भी होता हैं. कक्षा 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10 क्लास के स्टूडेंट्स के लिए यहाँ सरल भाषा में निबंध दिया गया है. परीक्षा के लिहाज से यह निबंध छात्रों के लिए उपयोगी सिद्ध होगा.

साइकिल का आविष्कार Invention of bicycle In Hindi

साइकिल एक आम आदमी के सवारी से जुड़ा महत्वपूर्ण साधन है. खासकर किसान, मजदूर और निम्न आय वर्ग के लोगों के लिए यह वरदान की तरह हैं. साइकिल के अपने कई लाभ है, एक से दो लोगों को कम दूरी के गन्तव्य तक जाना हो तो बिना कुछ भी व्यय के समय पर यात्रा की जा सकती हैं. साइकिल चलाने के लिए न किसी विशेष प्रशिक्षण अथवा लाइसेंस की जरूरत होती हैं. साइकिल से सड़क दुर्घटना की सम्भावना भी काफी कम रहती हैं.

आज हम जिस रूप में साइकिल को देखते है इसका पहला ढांचा 1839 में स्काटलैंड के किर्कपैट्रिक मैकमिलन ने तैयार किया था, इस साइकिल को चलाने के लिए ऊपर बैठे व्यक्ति को अपने पैर जमीन पर पीछे की ओर धकेलने पड़ते थे. जाहिर है यह साइकिल का उतना सफल मॉडल नहीं था. कालान्तर में 1817 में जर्मनी के बैरन फ़ॉन ड्रेविस ने लकड़ी की बनी एक साइकिल तैयार की.

इसे ड्रेसियन का नाम दिया गया था. यह एक घंटे में पन्द्रह किलोमीटर की दूरी तय कर सकती थी. अगले कुछ वर्षों में मैक मिलन अपने इस मॉडल में निरंतर सुधार करते गये. अन्तः उन्होंने साइकिल के साथ वेलोसिपीड नामक यंत्र लगा दिया जिससे पैरों द्वारा चलाया जाने लगा.

साइकिल का महत्व व लाभ Importance And Benefits Of Bicycle In Hindi

एक व्यक्ति की यात्रा के लिए साइकिल एक उत्तम परिवहन साधन है. जो बेहद कम समय में अल्प खर्च और जोखिम के साथ हमारे पर्यावरण को प्रदूषित करे बगैर हमारी यात्रा को सफल बनाता हैं. दूर दराज के इलाके, ग्रामीण, पहाड़ी, रेतीले भागों में जहाँ पक्की सड़के नहीं हैं वाला कंक्रीट या पथरीली सड़क पर भी साइकिल को आसानी से चलाया जा सकता हैं. साइकिल का मॉडल इतना सरल है कि कोई भी व्यक्ति उसमें हुई किसी खराबी को आसानी से रिपेयर कर सकता हैं.

बहुत से लोग स्वास्थ्य लाभ के लिए भी साइकिल चलाते हैं. यह तेजी से वजन घटाने, शरीर को तन्दुरस्त बनाने में एक कारगर उपाय माना जाता हैं. बिना एक पैसे के ईधन खर्च के आप इसकी मदद से सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा कर सकते हैं. पर्यावरण सम्बन्धी समस्याओं को मद्देनजर रखते हुए, अब शहरों में भी साइकिल को पुनः तेजी से अपनाया जा रहा हैं. बहुत से लोग अपने ऑफिस, दूकान कार्यस्थल जाने के लिए साइकिल ले जाते हैं.

साइकिल चलाने वाले व्यक्ति को स्वावलंबी माना जाता हैं. उन्हें न किसी तरह के ट्रैफिक जाम में फसने का भय रहता हैं न किसी बड़ी दुर्घटना का संदेह. इस कारण वह नियत समय पर अपने कार्य के लिए पहुँच पाता हैं. अब हाईटेक साइकिलें भी बाजार में आने लगी हैं जो बैटरी से चलती हैं और गियर भी लगते हैं. लोगों को पर्यावरण के हित को ध्यान में रखते हुए अपने संतुलित स्वास्थ्य के लिए भी साइकिल चलानी चाहिए.

मेरी साइकिल पर निबंध Essay on my bicycle In Hindi

बच्चें बच्चियां नौजवान बुड्ढे सभी दो पहियों की साइकिल की सवारी करना पसंद करते है. खासकर बच्चों के लिए तो यह बेहद प्रिय वस्तु होती है. भले ही यांत्रिकी तकनीकी के कारण सैकड़ों तरह के वाहन आज उपलब्ध है, मगर जो आनन्द साइकिल चलाने में आता है वह अन्यत्र नहीं है. भले ही कई बार साइकिल चलाते गिर जाओ मगर उतनी चोट नहीं आती जितनी अन्य तरह के वाहनों में आने की सम्भावना रहती है.

मुझे बचपन में साइकिल चलाने का बेहद शौक था, जब मै नौ साल का था तो मेरी जिद्द पर पिताजी ने मुझे हीरो की छोटी वाली साइकिल लाकर दी थी. लगभग एक महीने तक अपने दोस्तों के साथ घर के पार्क और गली में इसके अभ्यास के बाद मैंने इसे चलाना सीखा था. गुलाबी रंग की वो साइकिल आज भी मेरे घर के कबाड़ में पड़ी है. जब भी मैं सड़क पर गुजरता हूँ और कोई साइकिल की घंटी सुनाई देती है तो बचपन के दिनों की यादे पुनः ताजा हो उठती हैं.

मेरे घर से तकरीबन एक किलोमीटर दूर मेरा विद्यालय था. मैं अपने छोटे भाई को बस्ता व टिफिन देकर पीछे की सीट पर बिठाकर साथ स्कूल ले जाता था और शाम को दोनों साथ ही लौट आते थे. एक बार छोटे भाई द्वारा साइकिल चलाने की जिद्द पर हम गिर पड़े थे. सायंकाल को घर के बाहर साइकिल की सवारी का खूब मजा लिया करते थे. आज भी मुझे वो दिन अच्छी तरह याद है जब मैंने पैंडल पर पहली बार पैर रखकर इसे चलाने की चेष्टा की थी. सैकड़ों असफल प्रयत्न के बाद अन्तः मैं सीख पाया था. उस दिन की सीख आज भी मेरे जीवन में काम आती हैं. कोई भी काम यदि हम दिल लगाकर करे तो एक दिन हमें कामयाबी जरुर प्राप्त होगी.

साइकिल का इतिहास और इसके यंत्र History of bicycle in hindi

आज हम जिस दुपहिया यंत्र को साईकिल के रूप में जानते हैं इसने दो सदियों की विकास यात्रा के बाद अपना यह विकसित स्वरूप पाया हैं. पहली बार यह 1879 में सड़क पर चलने हेतु उपयुक्त साधन के रूप में सड़क पर उतरी थी. बहुत कम उंचाई की इन साइकिल को दो पहियों के मध्य बने क्रैक पर एक आदमी चलाता था. क्रैक में लगे चैन की मदद से पिछला पहिया चलता था और साइकिल आगे की ओर गति करने लगती थी.

पहले पहले स्वरूप की इस साइकिल में बहुत सी खामियां थी, जिसके चलते यह अधिक लोगों तक नहीं पहुँच पाई इसके टायर बेहद ठोस हुआ करते थे इसलिए इस पर बैठना अधिक सुविधाजनक नहीं था. साथ ही पैडिल भी जमीन से कुछ ही उंचाई पर थे इस कारण वे धुल से सने रहते थे. मगर अगले दस सालों बाद अपने नयें रूप में आई इस साइकिल ने सभी के दिल जीत लिए, अब अगला पहिया पैडिल के दवाब से मुक्त होकर सिर्फ संतुलन के लिए था. इसे दोनों हाथ हटाकर भी चलाया जा सकता था. साथ ही कैरियर आने पर इस पर एक की बजाय दो व्यक्ति सवारी कर सकते थे अथवा माल ढो सकते थे.

वर्ष 1885 में पहली बार टायर ट्यूब का उपयोग किया गया, जिससे साइकिल के भार में बड़ी कमी दर्ज की गई और उबड़ खाबड़ जगहों पर झटकों को सवार आसानी से झेल सकता था. इस तरह 1890 तक आते आते साइकिल एक अच्छा आरामदायक अनुभव देने वाले साधन के रूप में विकसित हो चुकी थी. आमजन में इसकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ने लगी, खासकर मजदूर वर्ग ने इसे उपयोगी साधन के रूप में अपनाया.

साइकिल के हिस्से (Bicycle parts)

  • पहिये: मानव सभ्यता ने पहली बार गति की समझ लुढकते पत्थर को देखकर बनाई थी, कालान्तर में उसने पहिये का अविष्कार किया. यातायात क्षेत्र में पहिया एक चमत्कारी आविष्कार था. साइकिल में पहले जो पहिया लगता था वो बेहद भारी हुआ करता था. बाद में केन्द्रीय हब से पहिये में तार की बनी तीलियाँ लगाने से इसकें भार में काफी कमी आई.
  • हवा से युक्त टायर: वर्ष 1888 में पहली बार साइकिल में हवा वाले टायर उपयोग में लिए गये. इससे पूर्व में काम आने वाले बेहद ठोस रबड़ से बने हुआ करते थे, जो बेहद कम्पन करते थे. हवा वाले टायर में दवाब देकर हवा भरी जाती थी. टायर का बाहरी भाग काफी मोटा और कठोर बना होता हैं जिसमें रबर की मजबूत डोरियाँ बिछी रहती हैं. अधिक हवा भरे ये टायर साइकिल की गति को बढ़ाने में सहायक हैं मगर गड्डे तथा पथरीले रास्ते पर ये अधिक झटके भी दिलाती हैं.
  • बेयरिंग्स: जहाँ साइकिल की धुरियाँ साफ्ट को घुमाती है उसे बेयरिंग्स कहा जाता है. इन्हें समय समय पर साफ़ कर तेल डालना पड़ता है ताकि इसका घर्षण कम हो. बेयरिंग्स एक बाहर तथा एक भीतरी भाग में कप की आकृति की कठोर स्टील होती है आंतरिक कप में गेंदे घूमती है. समय समय पर साइकिल सवार को इन बेयरिंग्स की सफाई करनी चाहिए तथा जाम हो जाने पर नया डालना चाहिए, यह साइकिल की गति को कई गुना तक कम या अधिक कर देता है.
  • चेन: शुरुआत में साइकिल में जिन चेन का उपयोग किया जाता था वो पिन के प्रकार की थी जो स्प्राकिट के दांतों में घुसकर लुढकती इससे दांत बहुत जल्दी घिस जाया करते थे. बाद में इनके स्थान पर रोलर और बुश काम में लिए जाने लगे. वर्ष 1880 में निर्मित बुश रोलर चेन आज भी साइकिल समेत कई अन्य वाहनों में शाफ्ट के लिए उपयोग में ली जाती हैं.
  • फ्रीव्हील: यह साइकिल के पैंडल में प्रयुक्त महत्वपूर्ण पुर्जा है जो हब के साथ जुड़ा होता है तथा जब स्प्राकिट आगे की ओर घूमता है तो फ्रीव्हील स्प्राकिट को हब से जोड़ता है, तथा जब स्प्राकिट उलटी दिशा में घुर्णन करता है तो यह स्थिर या मुक्त हो जाता है. चलती साइकिल के साथ चढना तथा उतरना इसी के कारण होता है. इसी कारण ढलान में जब पहिया गति करता है तो पैंडल फ्री हो जाते हैं.
  • ब्रेक: साइकिल को रोकने या गति कम करने के लिए ब्रेक सिस्टम लगाया जाता है. यह दोनों पहियों के साथ जुड़ा होता है साथ ही पैंडल को उल्टा घुमाने पर भी ब्रेक की तरह काम करने लगता है. आजकल हवा वाले टायरों के लिए स्ट्रिप ब्रेक का उपयोग किया जाता है जिसमें रबड़ के कुछ गुटके रिम के अंदर वाले भाग को ब्रेक दबाने पर रगड़ते है और साइकिल की गति स्वतः कम हो जाती हैं.

जब मैंने साइकिल चलाना सीखा When i learned cycling in Hindi

हरेक बालक का सपना होता है कि वह साइकिल चलाना सीख जाए, मगर छोटी उम्रः में जब हमारी पकड़ उतनी मजबूत नहीं होती है, तब यह कार्य अधिक चुनौतीपूर्ण बन जाता है जो बच्चों को बेहद प्रिय होती हैं. मैं भी जब ग्यारह वर्ष का था और कक्षा 5 में पढ़ता था तो मैंने साइकिल चलाना सीखा.

गर्मियों की छुट्टियों का वक्त था. पिताजी नई नई साइकिल लाए थे. अगले सत्र मुझे घर से चार किमी दूर स्थित विद्यालय में उसी साइकिल को चलाकर जाना था. अतः मेरे लिए नियत समय में साइकिल चलाना सीखना एक चुनौती थी. मेरे बड़े भाई ने मुझे साइकिल सिखाने में बड़ी मदद की.

हमारे घर के पास ही खाली पड़े खेतों में मेरा मशक्कत भरा यह अभियान आरम्भ हुआ. जब मैं पहली बार ड्राईवर सीट पर बैठा तो गिर गया, उठने गिरने घुटने छिलने की घटनाएं कुछ दिनों तक बारम्बार चलती रही. बड़े भाई की शरारतों ने भी काफी तंग कर रखा था. भाई मुझे साइकिल पर बिठाकर पीछे से पकड़े रखने की बात कहते थे मगर थोड़ी देर में ही अकेला ही छोड़ देते थे और कुछ ही दूर जब मुझे अहसास होता कि रथ के सारथि हम ही तो डर के मारे साइकिल समेत जमीन पर गिर जाता था.

यह सिलसिला चंद दिन ही चला था. अब मैं अकेले ही साईकिल लेकर लम्बी दुरी तक जा रहा था. आत्म विश्वास बढ़ चूका था दिन के दो पहर निरंतर और अकेले ही प्रयास करने लगा और इस तरह महज पन्द्रह दिन में ही मेरा साइकिल चलाना सीखने का सपना साकार हो गया.

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