लोहार पर निबंध | Essay On Blacksmith In Hindi Language

Essay On Blacksmith In Hindi Language: नमस्कार दोस्तों आज हम लोहार पर निबंध पढ़ेगे. आदिम व्यवसायों में सुनार, लोहार, कुम्हार, बढ़ई के कार्य की तरह लोहार (about blacksmith) भी पारम्परिक समुदाय हैं. जो लोहे, स्टील आदि के सामान बनाते हैं. इनका जीवन बेहद श्रमसाध्य होता हैं. आज के निबंध, अनुच्छेद, आर्टिकल, भाषण, स्पीच, लेख में हम लोहार समाज के इतिहास, उसके कार्य व जीवन के बारें में यहाँ जानेगे.

Essay On Blacksmith In Hindi Language

Essay On Blacksmith In Hindi Language

भारत में लोहार समुदाय के करोड़ों लोग हैं जो लोहे की वस्तुएं बनाते हैं. हथोड़ा, छेनी, धौंकनी की मदद से ये अपना कार्य करते हैं. विभिन्न तरह के लौह उपकरण, हथियार, कृषि औजार फाटक, ग्रिल व सभी प्रकार के बर्तन बनाने का कार्य करते हैं. भारत में इन्हें अनुसूचित जनजाति में शामिल किया गया हैं. प्राचीन वर्ण व्यवस्था में लोहार शुद्र वर्ण से सम्बन्धित माने जाते थे.

लोहार दो प्रकार के होते हैं, एक गाड़िया लोहार एवं मालविया लोहार. गाड़िया लोहार एक घुमंतू जाति है जो कभी भी एक स्थायी आवास बनाकर नहीं रहती हैं. इनका इतिहास बताता है कि ये पूर्व में राजपूत थे. चित्तौड पर मुगलों के आक्रमणों के बाद से इन्होने घुमंतू जीवन जीना शुरू कर दिया.

वही मालविया लोहार वे हैं जो मध्यप्रदेश के मालवा प्रदेश से आकर विभिन्न स्थलों पर बसे हैं, ये लकड़ी का कार्य भी करते हैं. ये शक्ति एवं अग्नि का पूजन करते हैं. हिन्दुओं से परिवर्तित होकर मुसलमान बनने वाले लोहारों के दो फिरके है एक मुलतानी और दूसरा नागौरी.

गाड़िया लोहार मुख्यतः राजस्थान में ही रहते हैं, इनका घर परिवार एक कलात्मक बैलगाड़ी पर ही निर्भर रहता हैं. जीवन के 16 संस्कार जन्म से मृत्यु तक बस इसी गाड़ी और घुमक्कड़ जीवन में बिताते हैं. ऐसा नहीं है कि ये स्थाई घर बनाकर रह नहीं सकते, दरअसल लोहार समाज के लोगों की मान्यता है कि उनके पुरखे राणा प्रताप के सहयोगी थे.

एक समय वे युद्ध अभियान से लौट रहे थे, तभी उन्हें बीच राह में भगवान का रथ दिखा, जिसका एक पहिया टूटा हुआ था. उन लोगों ने भगवान के रथ की घुरी जोड़ दी तो भगवान इससे प्रसन्न हुए और उन्हें वरदान दिया कि वे लोहे के काम में कभी पराजित नहीं होंगे. इसी मान्यता के चलते कई पीढियां गुजर गई मगर ये अपना खानाबदोश जीवन व्यतीत करते हैं.

गाड़ियाँ लोहार आज भी अपनी कला से बेहद सम्रद्ध माने जाते हैं मगर इनका सम्पूर्ण जीवन अभावों के बीच व्यतीत होता हैं. ये लोहे को पीटकर विभिन्न उपकरण बनाकर बेचते है तथा अपने पेट का गुजारा चलाते हैं. इनके इस कार्य में लोहारन उनकी मददगार होती हैं. लोहे को घौकनी में गर्म करने के बाद उन्हे एरन पर रखा जाता हैं, जिस पर महिला हथोड़े से वार पर वार करती हैं, इस तरह गर्म लोहे को पीटकर ये औजार आदि बनाते हैं.

गाँवों में लोहार ग्रामीण जीवन का महत्वपूर्ण सदस्य होता हैं, जो गाँव के सभी लोगों के लिए सुई से लेकर दरवाजे, तगारी, फावड़ा, लोहे के फर्नीचर, बाल्टी समेत कृषि में उपयुक्त सभी औजारों का निर्माण करता हैं. काम के बदले वह अनाज या पैसा प्राप्त करता हैं, इस तरह वे अपने जीवन निर्वहन करते हैं.

इस जाति का प्रत्येक सदस्य अपनी प्राचीन मान्यताओं एवं संस्कृति का कठोरता से पालन करता हैं. इनकी अपनी एक बोली हैं. स्त्रियों व पुरुषों के पहनावे एवं आभूषण विशिष्ट होते हैं. महिलाएं गले में कड़ा, भुजाओं तक कांच या ताबे की चूड़िया, नाक में नथ और सिर पर कई चोटिया गुंथती हैं. प्रत्येक स्त्री के हाथ पर कई गोदना बने होते है, जिसे लोहार जाति की पहचान के साथ जोड़कर देखा जाता हैं.

सिर पर कोई टोपी या वस्त्र नहीं, जमीन पर सोना, पक्के घर में न रहना, दीपक न जलाना, कुँए का पानी न भरना, कमर में काला धागा बांधना, दूसरी जाति में विवाह न करना तथा मृत्यु पर अल्प शोक लोहार जाति की कठिन प्रतिज्ञाएं है जिन्हें प्रत्येक व्यक्ति पालन करता हैं.

इस तरह लोहार भारत की प्राचीन संस्कृति, परम्परागत कलात्मक व्यवसाय को अगली पीढ़ी तक ले जाने वाला समुदाय हैं जिसके लोग आज के अंधदौड़ के युग में भी अपनी पहचान के साथ शान से जीते हैं. उनके जीवन में कठिनाइयों एवं संघर्ष के अलावा अन्य कुछ और नहीं हैं. फिर भी वे गर्व करते है कि लोहार के रूप में समाज के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन कर सके, प्रत्येक सभ्य व्यक्ति को इनकी कला का सम्मान करना चाहिए तथा लोहार कर्म को प्रोत्साहित किये जाने की जरुरत हैं.

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