ब्रह्म समाज पर निबंध – Essay On Brahmo Samaj In Hindi

ब्रह्म समाज पर निबंध  Essay On Brahmo Samaj In Hindi: १८ वी सदी में भारतीय समाज में ब्रह्म समाज की स्थापना एक महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक था. राजाराम मोहनराय द्वारा स्थापित इस समाज के बारे में तथा राजा राम मोहन राय का संक्षिप्त विवरण भी ब्रह्म समाज निबंध के इस लेख में पढ़ेगे.

Essay On Brahmo Samaj In Hindi [ ब्रह्म समाज पर निबंध ]

Essay On Brahmo Samaj In Hindi

भूमिका- 19 वीं शताब्दी में भारतीय नव जागरण का प्रथम फल ब्रह्म समाज आंदोलन था. यूरोप की संस्कृति तथा धर्म से प्रभावित होकर हिन्दू धर्म का यह नया रूप था तथा यह यूरोपीय बुद्धिवाद के अनुरूप था. ब्रह्म समाज के संस्थापक राजा राममोहन राय थे, उन्हें आधुनिक भारत का पिता भारतीय नवजागरण का अग्रदूत कहा जाता हैं.

राजा राममोहन राय का संक्षिप्त जीवन परिचय- राजा राममोहन राय का जन्म १७७४ इ में बंगाल के वर्द्धमान जिले के राधानगर में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था. १८०५ से १८१४ तक उन्होंने ईस्ट इंडिया कम्पनी में विभिन्न पदों पर नौकरी की. इस नौकरी से त्यागपत्र देकर वे धर्म तथा समाज के सुधार में लग गये. राजा राममोहन राय एक महान विद्वान् थे,

अपने जीवन के अंतिम वर्ष में मुगल सम्राट का एक प्रतिवेदन लेकर इंग्लैंड गये थे, जहाँ उनका १८३३ में देहांत हो गया.

ब्रह्म समाज की स्थापना– अपने विचारों को व्यापक रूप देने के उद्देश्य से राजा राममोहन राय ने १८२८ में ब्रह्म समाज की स्थापना की, यह समाज मूलतः भारतीय था और इसका आधार उपनिषदों का अद्वैतवाद था.

भारत में धार्मिक सुधारों को लाने में ब्रह्म समाज की भूमिका– राजा राममोहन राय वस्तुतः एक महान समाज सुधारक थे. उन्होंने धर्म के यज्ञ सम्बन्धी कर्मकाण्ड, मूर्तिपूजा तथा जातिवाद का खंडन किया. उन्होंने कहा कि प्रचलित कर्मकांड और रुढियों से हिन्दू धर्म का कोई सम्बन्ध नहीं हैं. उन्होंने देशवासियों का ध्यान वेदों और उपनिषदों की तरफ आकर्षित किया और कहा की उनमे वर्णित धर्म ही मानवीय हैं. न कि प्रचलित कर्मकांड और अंधविश्वास. मूर्तिपूजा को व्यर्थ प्रमाणित करने के लिए उन्होंने फ़ारसी में तुहफतुल मुहा विदीन नामक पुस्तक लिखी. प्रचलित बहुदेववाद के वे कट्टर विरोधी थे.

सामाजिक सुधार– ब्रह्म समाज ने बाल विवाह तथा बहु विवाह का विरोध किया और विधवा विवाह का समर्थन किया. स्त्री शिक्षा तथा स्त्रियों के स्मानाधिकारों का वह प्रबल समर्थक था. सती प्रथा का राममोहन राय ने कड़ा विरोध किया, ब्रह्म समाज के नैतिक समर्थन व राममोहन राय के बार बार के आग्रह के कारण अंत में १८२९ इ में तत्कालीन गर्वनर जनरल लार्ड विलियम बैंटिक ने सती प्रथा को गैर कानूनी घोषित कर इसके विरुद्ध कड़ा कानून बना दिया.

सती प्रथा के अलावा राममोहन राय तथा ब्रह्म समाज ने अस्प्रश्यता और छुआछूत को अनुचित बताया. जाति पांति को छोड़कर अंतर जातीय विवाह का समर्थन किया. राममोहन राय ने बाल विवाह का कड़ा विरोध किया और इस प्रथा को वेदों के विपरीत बतलाया. राम मोहन राय राय ने हिन्दू धर्म व समाज को सुधारने के प्रयास के साथ साथ पश्चिमी शिक्षा की अच्छाईयों को ग्रहण करने के लिए भी कहा.

राजा राममोहन के पश्चात ब्रह्म समाज आंदोलन और देवेन्द्रनाथ टैगोर– राजा राममोहन राय की मृत्यु के बाद १८४२ में देवेन्द्रनाथ टैगोर ब्रह्म समाज के अध्यक्ष बने. देवेन्द्रनाथ टैगोर ने हिंदुत्व का तर्कसंगत रूप प्रस्तुत किया. और भारत में इसे धर्म के प्रसार को रोकने का प्रयत्न किया. पहले ब्रह्म समाज में वेदों तथा उपनिषदों को प्रमाणिक माना जाता था. देवेन्द्रनाथ के समय उपनिषदों को ही प्रमाणिक माना गया. देवेन्द्रनाथ ने हिन्दू ग्रंथों से सामग्री एकत्र करके ब्रह्म धर्म नामक प्रसिद्ध ग्रंथ लिखा. जिसमें ब्रह्म समाजियों के लिए उपासना के नियम थे.

केशवचन्द्र सेन ने भी ब्रह्म समाज के विकास में योगदान दिया. १८६६ में उन्होंने भारतीय ब्रह्म समाज की स्थापना की. उन्होंने हिन्दू धर्म के अनुष्ठानों का विरोध किया और पाश्चात्य धर्म तथा सभ्यता का प्रचार किया. ब्रह्म समाज में बाइबिल तथा अन्य ईसाई धर्म ग्रंथों का अध्ययन किया जाने लगा.

केशवचन्द्र सेन ने मूर्तिपूजा, जाति प्रथा, उंच नीच तथा छुआछूत का विरोध किया तथा सामाजिक समानता पर बल दिया. उन्होंने पर्दा प्रथा, बाल विवाह, बहु विवाह आदि बुराइयों के निवारण पर बल दिया. उन्होंने अन्तर्जातीय विवाह, विधवा पुनर्विवाह एवं स्त्री शिक्षा का समर्थन किया.

उनके प्रयासों से १८७२ ई में सरकार ने सिविल मैरिज एक्ट पास किया, जिसके अनुसार अंतरजातीय विवाह मान्य हो गया तथा वर की आयु १८ वर्ष तथा वधू की आयु १४ वर्ष निश्चित कर दी गई. १८७० में उन्होंने भारतीय सुधार संस्था की स्थापना की जिसने अनेक सामाजिक सुधार किये.

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