Essay On Child Labour In Hindi | बाल श्रम पर निबंध हिंदी में

Essay On Child Labour In Hindi बाल श्रम पर निबंध हिंदी में भारत में बच्चों और महिलाओं की सुरक्षा का स्तर निम्न है जिनका कारण बाल श्रम (Child Labour) जैसी बुराइयों का हमारे समाज में व्याप्त होना हैं. “बाल मजदूरी” व बालश्रम पर निबंध में विद्यार्थियों के लिए चाइल्ड लेबर एस्से कक्षा 1,2,3,4,5,6,7,8,9,10 के स्टूडेंट्स के लिए 5 लाइन, 10 लाइन 100, 150,200,250,300,400,500 शब्दों में छोटा बड़ा उपलब्ध करवा रहे हैं. 

Essay On Child Labour In Hindi | बाल श्रम पर निबंध हिंदी में

Essay On Child Labour In Hindi | बाल श्रम पर निबंध हिंदी में

Child Labour Essay In Hindi बाल श्रम के कारण अर्थ परिभाषा कानून रोकथाम अधिनियम एवं दुष्परिणाम पर निबंध देश भर में हर रोज सवा सौ से अधिक बच्चे लापता हो जाते है. जिनमे से ज्यादातर कभी लौटकर नही आते है. लापता बच्चे आखिर जाते कहाँ है? इसका जवाब ज्यादा मुश्किल नही है. कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों के अध्ययन से यह साबित हो चुकि है कि मानव तस्करी करने वाले गिरोह इस काम में बड़े पैमाने पर सक्रिय है.

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speech on child labour परिचय (बाल श्रमिक कौन)– 14 वर्ष से कम आयु के मजदूरी या उद्योगों में काम करने वाले बालक आते हैं. खेलने कूदने और पढ़ने की उम्रः में मेहनत मजदूरी की चक्की में पीसता देश का बचपन समाज की सोच पर एक कलंक हैं. ढाबों, कारखानों और घरों में अत्यंत दयनीय स्थतियों में काम करने वाले ये बाल श्रमिक देश की तथाकथित प्रगति के गाल पर एक तमाचा है, इनकी संख्या लाखों में हैं.

बाल श्रमिक की दिनचर्या– इन बाल श्रमिकों की दिनचर्या पूरी तरह से इनके मालिकों या नियोजकों पर निर्भर हैं. गर्मी हो, वर्षा या शीत इनको सवेरे जल्दी उठकर काम पर जाना होता हैं, इनकों भोजन साथ ले जाना पड़ता हैं या फिर मालिकों की दया पर निर्भर रहना पड़ता हैं. इनके काम में घंटे नियत नही होते हैं बारह से चौदह घंटे तक भी काम करना पड़ता हैं. कुछ तो चौबीस घंटे के बधुआ मजदूर होते हैं. बिमारी या अन्य किसी कारण से अनुपस्थित रहने पर इनसे कठोर व्यवहार यहाँ तक की निर्मम पिटाई भी होती हैं.

गृहस्वामियों व उद्यमियों द्वारा बाल श्रमिकों का शोषण– घरों में या कारखानों में काम करने वाले इन बाल मजदूरों का तरह तरह से शोषण होता हैं. इनको वेतन बहुत कम दिया जाता हैं. काम के घंटे नियत नही होते हैं. बीमार होने या अन्य किसी कारण से अनुपस्थित रहने पर उनका वेतन काट लिया जाता हैं. इनकी कार्यस्थल पर बड़ी दयनीय स्थिति होती हैं. सोने और खाने की कोई व्यवस्था नही होती हैं, नगी भूमि पर खुले आसमान या कहीं कौने में सोने को मजबूर होते हैं.

रुखा सूखा या जूठन खाने को दिया जाता हैं. बात बात पर डांट फटकार, पिटाई, काम से निकाल देना तो रोज की कहानी हैं. यदि दुर्भाग्य से कोई नुकसान हो गया तो पिटाई या वेतन काट लेना आम बात हैं. वयस्क मजदूरों की तो यूनियन है जिनके द्वारा वह अन्याय और अत्याचार का विरोध कर पाते है किन्तु इन बेचारों की सुनने वाला कोई नही. केवल इतना ही नही मालिकों और दलालों द्वारा इनका शारीरिक शोषण भी होता हैं.

बाल श्रम को रोकने के कानूनी प्रयास उपाय (stop child labour in hindi)– बाल श्रमिकों की समस्या बहुत पुरानी हैं इसके पीछे गरीबी के साथ ही माता पिता का लोभ और परिवारिक परिस्थियाँ कारण होती है. बाल श्रम की समस्या के रोकथाम के लिए सामाजिक और शासन के स्तर पर प्रयास आवश्यक हैं. सामाजिक स्तर पर माँ बाप को बालकों को शिक्षित बनाने के लिए समझाया जाना आवश्यक हैं. इस दिशा में स्वयंसेवी संस्थाएं महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं. सरकारी स्तर पर बाल श्रम रोकने के लिए कठोर कानून बनाए गये हैं. लेकिन उनका पालन भी सही ढंग से होना चाहिए. विद्यालयों में पोषाहार एवं छात्रवृति आदि की सुविधाओं को दिया जाना, बाल श्रमिकों के माता-पिता की आर्थिक स्थिति में सुधार किया जाना आदि प्रयासों से बाल श्रम की समस्या समाप्त हो सकती हैं.

Short Essay On Child Labour In Hindi 300 Words, article on child labour बाल श्रम (बाल मजदूरी पर निबंध)

बाल श्रम निबंध हिंदी में (चाइल्ड लेबर एस्से)-शहरों के गरीब इलाकों या गाँव देहांत से अपहरण कर या बहला फुसला कर लाए गये बच्चों को न सिर्फ बंधुआ मजदूरी या भीख मांगने के कार्य में लगा दिया जाता है. बल्कि बहुत सारे मानव अंगो के तस्करों के जाल में फस जाते है. लड़कियों को नौकरानी का काम करने या देह व्यापार के लिए बेच दिया जाता है.

बीते कुछ सालों में हमारे यहाँ यौन पर्यटन एवं बाल तस्करी एक संगठित अपराध के रूप में सामने आया है. इसमे मासूम बच्चो का, पैसो के लिए शोषण, मजदूरी कराने के लिए शोषण, अंगो की तस्करी, भीख मांगने आदि के लिए इस्तमोल होता है.

बाल श्रम व तस्करी के कारण (child labour paragraph, child labour information in hindi)

speech on child labour in 100 words– हमारे देश में भारी आर्थिक विषमता है, मात्र 50 लोगों के पास देश की आधी दौलत है. ज्यादातर लोग गरीब है. जिनके सामने परिवार पालन का बड़ा संकट है. इस स्थति के चलते माँ बाप नही चाहते हुए भी नाबालिग बच्चों को श्रमसाध्य कामों में लगाने पर विवश होते है. जिनके परिणामस्वरूप बच्चें होटलों, ढाबों, एवं कारखानों में दिन रात मेहनत करते हुए सार्वजनिक स्थलों पर भीख मांगते दीखते है. यहाँ वे विभिन्न अपराधिक व्यक्तियों के जाल में फस जाते है और कालान्तर में वे अपराधिक कार्य करने पर मजबूर हो जाते है. कई अपराधिक गिरोह नशीले पदार्थो की तस्करी, जेबकटी, जैसे अपराधों में बच्चों का दुरूपयोग करते है.

बीड़ी, माचिस, पटाखे,आरीतारी व चूड़ी निर्माण जैसे व्यवसायों में बच्चों को लगाना बहुत फायदेमंद साबित हो सकता है. कम मजदूरी में अच्छा श्रम उपलब्ध हो जाता है. लालची व्यवसायी बच्चों के माता-पिता को को भी पैसों का प्रलोभन देकर सहमत कर लेते है. वे बच्चों से दिनरात मेहनत करवाते है. उनके बचपन का भारी दुरूपयोग करते है.

कृषि प्रधान आर्थिक व्यवस्था – हमारे देश की 75 प्रतिशत आबादी गाँवों में रहती है. जो खेती पर निर्भर है. वर्षा, अकाल, ओलावृष्टि जैसी कई अनिश्चिंताओ के अलावा खेती करने में भारी मानव श्रम की आवश्यकता होती है. खेती का धंधा लाभकारी नही होने के कारण हर आदमी खेती के लिए मजदूरों का प्रबंध नही कर पाता है और वह मजबूरन अपने नाबालिग बच्चों को पढ़ाई के स्थान पर खेतों के काम में लगा देते है.

नशाखोरी-समाज के बड़े वर्ग नशे की चपेट में है. शराब, भांग, गाजा, अफीम जैसे नशीले पदार्थ व्यक्ति की शारीरिक और बौद्धिक क्षमताओं को बुरी तरह प्रभावित किया है. नशीले पदार्थो की लत पड़ जाने से छोड़ना मुश्किल हो जाता है. तथा नशाखोर व्यक्ति शारीरिक और बौद्धिक बाल श्रम करने में असमर्थ होता है. इसी दशा में मज़बूरी में माताएं अपने नाबालिग बच्चों को श्रमसाध्य कार्यो में लगाने या भीख मंगवाने पर विवश होती है.

महंगी व रोजगार विहीन शिक्षा व्यवस्था- गरीब माँ बाप भी अपने बच्चों से अमीरों जितना प्यार करते है. वे भी अमीरों की तरह अमीरों की तरह अच्छी स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ाना चाहते है. किन्तु वे आर्थिक विफलताओं के कारण अच्छे स्कुलो का खर्चा वहन करने की स्थति में नही होते है. इसके अलावा यह कटु वास्तविकता है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था में रोजगार की गारंटी नही है.अधिकाशं पढ़े लिखे व्यक्ति रोजगार हेतु इधर -उधर भटकते हैं इस स्थति में माँ बाप की यह सोच है कि वे पढ़ने की अपेक्षा बच्चो को रोजगार में लगाए. जिसकी परिणति बाल मजदूरी में हो रही है.

बाल श्रम पर निबंध बाल मजदूरी के दुष्परिणाम (Side effects of child labor and Essay On Child Labour)

(paragraph on child labour in 100 words)

  • बच्चे देश के भविष्य है, बच्चे यदि स्वस्थ, शिक्षित एवं बुद्धिमान होंगे तो निश्चित रूप से देश भी विकसित होगा. अन्यथा बच्चो के अस्वस्थ, अशिक्षित व् अविकसित होने पर देश का पराभव निश्चित है.
  • शिक्षा का अभाव-: माँ-बाप की गरीबी के चलते अधिकाश बच्चे या या तो शिक्षा प्रारम्भ ही नही कर पाते या वे जल्दी पढ़ाई छोड़कर काम में लग जाते है. अशिक्षित व्यक्ति नशाखोरी, अन्धविश्वास व अनेकों सैम,सामाजिक बुराइयों में आसानी से लिप्त हो जाता है. वह समाज की आर्थिक प्रगति में भागिदार नही हो पाता है. यह स्थिति उनके लिए व देश के लिए हानिकारक है.
  • नशे के कारोबार व अपराध की दुनिया में लिप्त लोग स्वयं कानून से बचने के लिए नाबालिक बच्चों का दुरूपयोग करते है. ऐसे धंधो में लिप्त रहने पर बच्चे भी नशाखोरी में लिप्त हो जाते है. तथा उन्हें ये अपराधिक दुनिया अच्छी लगने लगती है. इस तरह उन्हें खूखार अपराधी बनने एवं अपराध की दुनिया में जाने में देर नही लगती है. यह स्थिति उनके साथ साथ समाज के लिए भी घातक है.

बाल मजदूरी रोकने हेतु कानून बाल श्रम अधिनियम 1986 (Laws to prevent child labor Essay On Child Labour In Hindi)

  • बच्चों का भीख मांगने के लिए अन्यथा अपहरण भारतीय दंड सहिता में दंडनीय अपराध है.
  •  भारतीय दंड सहिता की धारा 370, 367, 368
  • बंधुआ श्रम पद्धति उन्मूलन अधिनियम 1976
  • बाल अधिकार सरक्षण आयोग अधिनियम 2005
  • उपरोक्त कानूनों में भीख मांगने के लिए या अन्यथा बच्चों का अपहरण भारतीय दंड सहिता में दंडनीय अपराध है. 14 वर्षो के बालकों को मजदूरी में लगाना वर्जित है. ऐसा किया जाने पर शासित एवं कठोर दंड के प्रावधान है.
  • आर्थिक विषमताओं एवं उपरोक्त सामाजिक समस्याओं के चलते उक्त कानूनों का वास्तविक प्रभाव नही हो पा रहा है. इन बुराइयों पर नियन्त्रण के लिए कानूनी उपाय पर्याप्त नही है. बल्कि समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने के लिए चौतरफा सघन प्रयास आवश्यक है.

बाल श्रम रोकथाम के उपाय (essay on child labour in hindi wikipedia)

  • सघन प्रचार प्रसार विधिक सेवा संस्थाओं का दायित्व है कि वे बाल श्रम व बाल तस्करी से जुड़े सरकारी विभागों से समन्वय स्थापित कर उनके साथ मिलकर बाल श्रम व बाल तस्करी के विरोध में एकजुट होकर जन जन तक जागृति फैलाए कि बाल श्रम व बाल तस्करी अपराध है तथा इसमे लिप्त होने पर सजा मिलना निश्चित है. ऐसी जन जागृति हो तो इस समस्या पर काबू पाया जा सकता है.
  • सस्ती, गुणवतापूर्ण व रोजगारपरक शिक्षा व्यवस्था-कल्याणकारी राज्य का दायित्व है. कि वह ऐसी सस्ती गुणवतापूर्ण व रोजगारपरक शिक्षा व्यवस्था करे कि देश का हर बच्चा शिक्षा प्राप्त कर सके तथा इसके उपरांत रोजगार प्राप्त कर अपना जीवन मानवीय गरिमा के अनुसार जी सके, ऐसा न किया जाने पर बाकी प्रयास वृक्षों की जड़ो को सीचने के स्थान पर पत्तों को पानी देने के समान है.
  • विधिक सेवा संस्थाए पुलिस, स्वयंसेवी संस्थाओं एवं अन्य संस्थाओं से मिलकर कार्य योजना तैयार करे और बीड़ी माचिस फटाखे व आरी-तारी चूड़ी जैसे अन्य उद्ध्योगो पर निगरानी रखे इन स्थानों पर या भीख मांगने व नशाखोरी के धंधो में लिप्त बच्चों को मुक्त कराने एवं दोषियों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही करने व् बच्चों के मुक्त होने पर उनके पुनर्वास तथा प्रतिकर की माकूल व्यवस्था सुनिश्चित करे.
  • वर्तमान में बाल श्रमिकों को मुक्त कराने पर वे जिस प्रदेश में होते है उन्हें उस प्रदेश की गाड़ी में बिठाकर उनके राज्य में भेज दिया जाता है, जो पुनः वहां जाकर उसी धंधे में लिप्त हो जाते है या दूसरे राज्यों में चले जाते है. ऐसी स्थति में हमे सुनिश्चित करना होगा कि मुक्त कराएं गये बच्चों को उनके माता-पिता के पास पहुचाया जाए और यदि उनके माता-पिता उन्हें रखने में समर्थ नही है तो पालनहार जैसी योजना की संस्थाओं में भेजकर उन बच्चों की देखभाल व शिक्षा की व्यवस्था की जाए.

बाल तस्करी से मुक्त कराये गये बच्चों का पुनर्वास एवं प्रतिकर व्यवस्था (essay on child labour in hindi 1000 words)

  • बाल तस्करी से मुक्त कराए गये बच्चों को पुनर्वास एवं प्रतिकर हेतु एक लाख रूपये प्रदान किये जाने की व्यवस्था है. लेकिन इसका लाभ नही मिल पा रहा है. राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण ने बाल बंधको को मुक्त कराने पर उनके पुर्नवास व प्रतिकर दिलाने में मदद करने की व्यवस्था की है. आशा है इसका परिणाम सामने आएगा.
  • बाल पीड़ितो को विधिक सहायता- बंधुआ मजदूरी व बाल श्रमिक या बाल अपराध के मामले में यह सुनिश्चित किया जाए कि पीड़ित बालकों को समुचित सहायता मिले, उनके मामले में ठोस पैरवी हो और दोषियों को निश्चित रूप से सजा मिले.
  • न्यायालय का दायित्वबाल बंधुआ मजदूर, बाल अपराधों से जुड़े न्यायालयों का दायित्व है कि ऐसे मामले का प्राथमिकता से निस्तारण करे. बाल अपराध एक गंभीर समस्या है इसका प्रभाव पूरे देश व समाज पर पड़ता है. ऐसे में दोषी व्यक्ति को कठोर दंड दे जिससे वह बाल अपराधों से दूर रहे.

उपरोक्तानुसार ऐसे सम्मलित प्रयासों की आवश्यकता है कि बाल श्रम करवाने वालों को ऐसा साफ़ एवं वास्तविक संदेश दिया जाए कि ऐसी गतिविधियों में लिप्त व्यक्ति नही बचेगे वे निश्चित रूप से कानून के हवाले होंगे, तो वह दिन दूर नही जब बाल बंधुआ मजदूरी पर नियंत्रण हो जाएगा.

Essay On Child Labour In Hindi With Quotes- बाल श्रम पर बड़ा निबंध

बाल मजदूरी पर निबंध- child labour essay,Essay on Child Labour best essay on child labour in hindiबाल श्रम एक ऐसा अभिशाप है जो शहरों में गाँवों मर चारो तरफ मकडजाल की तरह बचपन को अपनी आगोश में लिए हुए हैं. खेलने कूदने के दिनों में कोई बच्चा बाल श्रम करने को मजबूर हो जाये तो इससे बड़ी विडम्बना किसी भी समाज के लिए और क्या हो सकती हैं. बाल श्रम से परिवारों को आय स्रोत का केवल एक छोटा सा भाग ही प्राप्त होता है जिसके लिए गरीब परिवार अपने बच्चों के भविष्य को गर्त में झोक देते हैं. गोपालदास ने बाल श्रम की स्थिति पर छोटी कविता लिखी.

जिनको जाना था यहाँ पढ़ने को स्कूल
जूतों पर पॉलिश करे वो भविष्य के फूल

बाल श्रम की परिभाषा और अर्थ (child labour in hindi)– वास्तव में बाल श्रम मानवाधिकारों (child rights) का हनन है. मानवाधिकारों के अंतर्गत शारीरिक मानसिक एवं सामाजिक विकास का हक पाने का अधिकार प्रत्येक बच्चे को हैं लेकिन यथार्थ में स्कूल, खेल, प्यार स्नेह आत्मीयता आदि उनकी कल्पना में ही रह जाता हैं. कूड़े के ढेर से रिसाइकलिंग के लिए विभिन्न सामग्रियों को बटोरने वाले बच्चों में समय से पूर्व ही ऐसी बीमारियाँ घर कर जाती है, जिन्हें छोटी उम्रः में उन्हें ढ़ोना पड़ता हैं. कूड़े के ढेर से उन्हें कई संक्रामक रोग जकड़ लेते हैं जिससे बचपन एवं जवानी का उन्हें पता ही नही चल पाता है सीधे बुढ़ापे में ही उनके कदम चले जाते हैं.

यह एक सच्चाई है कि निर्धनता के कारण इन बच्चों को श्रम कार्यों में सामान्यतः उनके अभिभावक ही धकेलते हैं, जहाँ थोड़े से पैसे के लिए उनकी जिन्दगी तबाह हो जाती हैं. इनके दिन की शुरुआत ही गाली गलौच और लानत मलामत से होती हैं. ऐसी परिस्थियों में इनका कुंठित होना स्वाभाविक हैं. यह कुंठित मन धीरे धीरे नशे की ओर चला जाता हैं.

भारत में बाल श्रम की समस्या पर निबंध– भारत जैसे देश में जहाँ जनसंख्या के लगभग ४० प्रतिशत से अधिक व्यक्ति निर्धनता की स्थितियों में रह रहे हैं. वहां बाल श्रम एक गम्भीर विषय है. बच्चे निर्धनता के कारण विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करते हैं और उनकी कमाई के बिना उनके परिवारों का जीवन स्तर और भी गिर सकता हैं.

उनमें से कई बच्चों के तो परिवार ही नही होते हैं या सहारे के लिए आशा नही कर सकते. बाल श्रम का प्रमुख कारण निर्धनता है बच्चे या तो अपनी माता पिता की आय बढाते हैं या परिवार में वे अकेले ही वेतनभोगी होते हैं. दूसरा प्रमुख कारण सस्ते मजदूर पाने के लिए निहित स्वार्थों को जानबूझकर उत्पन्न किया जाता हैं.

बाल श्रमिकों का शोषण रोजगार की खतरनाक परिस्थतियाँ, कई घंटे काम किये जाने के बदले अल्प वेतन आदि ऐसे महत्वपूर्ण मुद्दे है जो बाल श्रम से जुडे हुए है, शिक्षा को छोड़ने के लिए बाध्य होकर, अपनी आयु से अधिक दायित्वों का निर्वाह करके ये बच्चें कभी जान नही पाते कि बचपन क्या होता है.

भारत में बाल मजदूरी को रोकने के लिए बनाए गये कानून और उपायभारतीय संविधान में बाल श्रम को रोकने या हतोत्साहित करने के लिए विभिन्न व्यवस्थाएं की गई हैं. जैसे चौदह वर्ष से कम आयु के किसी बालक को कारखाने में काम करने के लिए या किसी जोखिम वाले रोजगार में नियुक्त नही किया जाएगा. बाल्यावस्था और किशोरावस्था को शोषण तथा नैतिक एवं भौतिक परित्यक्ता से बचाया जाएगा. संविधान के प्रारम्भ होने से 10 वर्ष की अवधि में सभी बालकों की, जब तक कि वे 14 वर्ष की आयु समाप्त नही कर लेते, राज्य निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था करने का प्रयत्न करेगा.

big essay on child labour in hindi बाल श्रम पर निबंध

बाल श्रम में कार्यरत अधिकतर बच्चे ग्रामीण क्षेत्रों में केन्द्रित हैं. उनमे से लगभग 60 प्रतिशत दस वर्ष की आयु से कम हैं. व्यापार एवं व्यवसाय में २३ प्रतिशत बच्चे सलग्न हैं जबकि ३६ प्रतिशत बच्चे घरेलू कार्यों में. शहरी क्षेत्रों में उन बच्चों की संख्या सर्वाधिक है जो कैंटीन एवं रेस्तरां में काम करते हैं या चिथड़े उठाने एवं सामान की फेरी लगाने में सलग्न है, लेकिन वे रिकॉर्ड में नही हैं. अधिक बदकिस्मत बच्चे वे हैं जो जोखिम वाले उद्यमों में कार्यरत हैं.

बच्चे हानिकारक प्रदूषित कारखानों में काम करते हैं जिनकी ईंटो की दीवारों पर जमी कालिख रहती हैं और जिनकी हवा में विशाद्जनक बू होती हैं. वे ऐसी भट्टियों में काम करते हैं जो 1400 सेल्सियस ताप पर चलती हैं. वे आर्सेनिक एवं पोटेशियम जैसे खतरनाक रसायन काम में लेते हैं. वे कांच धमन की इकाइयों में कार्य करते हैं जहाँ उनके फेफड़ों पर जोर पड़ता हैं जिससे तपेदिक जैसी बीमारियाँ हो जाती हैं.

कई बार ऐसा भी होता है जब उनके बदन में दर्द होता है, दिमाग परेशान होता है दिल रोता है और आत्मा दुखी रहती हैं लेकिन तब तक मालिकों के आदेश पर उन्हें 12 से 15 घंटे काम लगातार करना पड़ता हैं.

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कारखानों खदानों एवं जोखिम वाले उद्यमों में 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों के नियोजन में बालकों की कार्यस्थिति को नियंत्रित करना भारत सरकार की नीति हैं. बाल श्रम निषेध एवं विनियमन अधिनियम 1986 पहला विस्तृत कानून है जो 14 वर्ष से  कम आयु के बच्चों को व्यवस्थित उद्योगों एवं अन्य कठिन औद्योगिक इकाइयों जैसे बीड़ी कालीन माचिस आतिश बाजी आदि के निर्माण में रोजगार देने पर प्रतिबन्ध लगाता हैं. इन्हें अधिनियम की अनुसूची के भाग क और ख में सूचीबद्ध किया गया हैं. इस अधिनियम का खंड बाल श्रम तकनीकी सलाहकार समिति के गठन का सुझाव देता हैं. जिससे अधिनियम की अनुसूची में व्यवसायों एवं प्रक्रमों को सम्मिलित करने के लिए केंद्र सरकार को सुझाव दिए जा सके.

बाल श्रम प्रतिषेध एवं विनियमन अधिनियम 1986 को कार्यान्वित करने का अधिकार राज्य सरकार को दिया गया हैं. राज्य में श्रम विभाग को अपने निरिक्षणालय तन्त्र के माध्यम से परिवर्तित करने का अधिकार प्राप्त हैं. सरकार के बाल श्रम कानून 1986 के अंतर्गत ऐसे क्षेत्रों को चुना हैं जहाँ अधिक संख्या में बाल मजदूर कार्य कर रहे हैं. एवं हानिकारक उद्योगों में काम कर रहे हैं. 

सरकार ने देश के 250 जिलों में राष्ट्रीय श्रम प्रोजेक्ट तथा २१ जिलों में इंडस प्रोजेक्ट द्वारा जिलाधिकारियों को आदेश दे रखा है कि वे बाल श्रम को रोकने के लिए हर संभव प्रयास करे. इसके लिए विशेष स्कूल संचालित किये जाये बाल श्रमिकों के परिवारों हेतु आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जाये तथा 18 वर्ष से पूर्व किसी भी स्थिति में उनसे मजदूरी ना कराई जाए.

बाल श्रम पर निबंध इन हिंदी (essay on child labour in hindi with headings)

बाल मजदूरी एक अभिशाप पर निबंध, बाल श्रम की रोकथाम पर निबंध, बाल मजदूरी एक कलंक, बाल श्रम समस्या और समाधान: वास्तव में हम यह सोचते है कि इस तरह की सामाजिक कुरीतियों को समाप्त करने का दायित्व सिर्फ सरकार का हैं. सब कुछ कानूनों के पालन एवं कानून भंग करने वालों को सजा देने से सुधारा जा सकता हैं. लेकिन यह असम्भव हैं हमारे घरों में ढाबों में होटलों में अनेक बाल श्रमिक मिल जायेगे. जो कड़ाके की ठंड या तपती धुप की परवाह किये बिना काम करते हैं.

सभ्य होते समाज में यह अभिशाप अभी तक क्यों बरकरार हैं. क्यों तथाकथित सभ्य और सुशिक्षित परिवारों में नौकरों के रूप में छोटे बच्चों को पसंद किया जाता हैं. आर्थिक रूप से सशक्त लोगों को घर में कामकाज हेतु गरीब एवं गाँव के बाल श्रमिकों को ही पसंद करते हैं. इन छोटे श्रमिकों की मजदूरी समझिये कि उनके छोटे छोटे कंधों पर बिखरे हुए परिवारों के बड़े बोझ हैं.

आज आवश्यकता इस बात की हैं कि सरकारी स्तर से लेकर व्यक्तिगत स्तर तक सभी लोग इसके प्रति सजग रहे और बाल श्रम के कारण बच्चों का बचपन न छीन जाए, इसके लिए कुछ सार्थक पहल करे. हम सबका दायित्व है कि इनकी दशा परिवर्तन हेतु मनोयोगपूर्वक सार्थक प्रयास करे, जिससे राष्ट्र के भावी नागरिकों के बालपन की स्वाभाविकता बनी रह सके.

आज हम २१ वी सदी में विकास और सभ्यता की ऐसी अवस्था में जी रहे हैं जहाँ समानता धर्मनिरपेक्षता मानवीयता आदि की चर्चा बहुत जोर शोर से की जा रही हैं. लेकिन हमारी प्रगति शिक्षा संवेदना एवं मानवता पर बाल श्रम की समस्या कई गम्भीर सवाल खड़े कर रही हैं.

बालश्रम पर निबंध-Essay On Child Labour In Hindi

बाल श्रमिक कौन– बाल श्रमिक कौन? इस बिंदु पर विचार करने से पहले बाल श्रमिक समस्या पर दृष्टि डालना ज्यादा उचित रहेगा. भारत विकासशील देश हैं. आजादी प्राप्त करने के बाद देश के आमवासियों में व्याप्त गरीबी को मिटाने के लिए अनेक वृहद और सिमित योजनाए सरकार द्वारा समय समय पर बनाई गई और अब भी बनाई जा रही हैं.

फिर भी गरीबी की निर्धारित रेखा से नीचे जीवन जीने को विवश लोगों की संख्या यहाँ कम नहीं हो सकी. बाल श्रमिक समस्या का समाधान का सम्बन्ध मुख्यतया गरीबी अर्थात दो जून की रोटी जुटाने के साथ ही हैं. किन्तु दुःख और निराशा की बात यह हैं कि जिन नन्हे मुन्हे के खेलने खाने या पढ़ लिखकर भविष्य बनाने के दिन होते हैं.

उन्हें विषम एवं दयनीय परिस्थतियों के कारण भूखा रहकर जीवन जीने के लिए मजबूर होना पड़ता हैं. अपने और अपने परिवार की भूख शांत करने के लिए दो जून की रोटियों का प्रबंध करने हेतु बचपन से ही मजदूरी करनी पड़ती हैं. यही बाल श्रम हैं. और इसे करने वाला बाल श्रमिक हैं.

अब प्रश्न उठता हैं कि बाल श्रमिक कौन. इस बात पर विचार करने से स्पष्ट होता हैं कि प्रायः निम्नलिखित कोटि के बच्चे बाल श्रमिक बनने को मजबूर हुआ करते हैं. 

  • एक तो वे बच्चे जो घोर गरीबी से घिरे होते है, उन्हें अपने हाथ की स्लेट छोड़कर, हथोड़ा पकड़ना रहता हैं या फिर अन्य काम करने पड़ते हैं.
  • दूसरे वे जो माता पिता के कठोर व्यवहार या शिक्षक की पिटाई से तंग आ जाते हैं.
  • तीसरे वे जिनका उचित वातावरण के अभाव में पढ़ने खेलने में मन नहीं लगता हैं. 
  • चौथे वे जो विमाता के दुर्व्यवहार से पीड़ित होकर या कुसंगति में पड़कर घर से भाग जाते हैं और अपना पेट भरने के लिए ढाबा, होटलों, चाय की दुकानों, बड़े घरों या फैक्ट्रियों में काम करते हैं और वहीँ रहने लगते हैं.

बाल श्रमिक की दिनचर्या– किसी कारण से घर से भागने वाले या गरीबी के घेरे में घिरकर विवश जीवन जीने वाले इन बाल श्रमिकों की दिनचर्या इनके जीवन की भांति कठोर होती हैं. इन्हें गृहस्वामियों या उद्यमियों के पास बंधुआ मजदूरों की तरह 12-14 घंटों तक एक दिवस में कठोर श्रम करना पड़ता हैं. न ये आराम से रोटी खा पाते हैं और न आराम से सो पाते हैं.

पहनने के लिए फटे पुराने कपड़े या उतरन ही इनके तन की शोभा बढ़ाते हैं. ये बेबशीपूर्ण कठोर श्रम से पूरित जीवन जीते हैं. इनके गृहस्वामियों या उद्यमी वर्ग भद्दी गालियों, लात घूसों से स्वागत करने में भी पीछे नहीं रहते हैं.

गृहस्वामियों व उद्यमियों द्वारा शोषण-बाल श्रमिकों का गृहस्वामियों और उद्यमियों का खुलकर शोषण किया जाता हैं. इनको बंधुआ मजदूर समझकर काम कराया जाता हैं. और पगार के नाम पर इन्हें बहुत कम वेतन दिया जाता हैं. कम वेतन पर अधिक से अधिक काम लेना इन शोषकों की नियति बनी हुई हैं. ये बाल श्रमिक अपनी मजबूरी को अपना दुर्भाग्य मानकर शोषण करवा ने को मजबूर होते रहते हैं.

सुधार हेतु सामाजिक व कानूनी प्रयास-बाल श्रमिक समस्या हमारे देश मेंफैली एक अछूत बिमारी है. स्वतंत्रता के इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी सामाजिक एवं कानूनी प्रयासों के बावजूद यह घटने की बजाय बढ़ी हैं. इसका प्रमुख कारण बढ़ती हुई जनसंख्या के बीच बढ़ती हुई गरीबी ही हैं.

यों तो भारत में और अंतर्राष्ट्रीयता के स्तर पर चौदह वर्ष से कम अवस्था के बच्चे से काम न लेने का कानून बना हुआ हैं. केंद्रीय सरकार और राज्य सरकारें बने कानूनों में समय समय पर सुधार कर उन्हें लागू करवाने के लिए कार्यवाही करती हैं.

साथ ही सामाजिक संस्थाएं बाल श्रमिकों को मुक्त करवाने में सतत प्रयत्नशील हैं. फिर भी इस समस्या की स्थिति ढाक के तीन पात वाली बनी हुई हैं. मानवाधिकार, सामाजिक संस्थाएं, अन्त्योदय योजना  इस समस्या के निदान के लिए प्रशंसनीय कार्य कर रही हैं. परन्तु गरीबी के कारण पेट की भूख शांत नहीं हो रही हैं. इस पर सरकार और सामाजिक संस्थाओं को प्रभावी रूप से पुनर्विचार करना पड़ेगा तब कहीं इस समस्या का सुफल दिखलाई पड़ सकता हैं.

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