सविनय अवज्ञा आंदोलन पर निबंध | Essay on Civil Disobedience Movement | Savinay Avagya Aandolan essay in hindi

सविनय अवज्ञा आंदोलन पर निबंध | Essay on Civil Disobedience Movement | Savinay Avagya Aandolan essay in hindi

पूर्ण स्वराज्य के लक्ष्य को कांग्रेस द्वारा अपना लिए जाने के पश्चात गांधीजी पुनः सक्रिय राजनीति में लौट आए, अब गांधीजी के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा आंदोलन की तैयारियाँ शुरू की गई, जिसके निम्नलिखित कारण थे.

सविनय अवज्ञा आंदोलन पर निबंध | Essay on Civil Disobedience Movement | Savinay Avagya Aandolan essay in hindi

साइमन कमीशन– नवम्बर 1927 में ब्रिटिश सरकार ने सर जॉन साइमन की अध्यक्षता में एक कमिशन नियुक्त किया गया. जिसे साइमन कमीशन कहा गया. यह कमीशन उपनिवेश की स्थितियों की जाँच पड़ताल के लिए इंग्लैंड भेजा गया था. इस कमीशन के सात सदस्य थे तथा सभी अंग्रेज थे. इनमें कोई भी भारतीय नहीं था.

इससे यह धारणा बनी कि अंग्रेजी सरकार इस कमीशन के माध्यम से भारतीयों के आत्मसम्मान को जानबूझकर चोट पहुचाना चाहती हैं. फलतः कांग्रेस हिन्दू महासभा, मुस्लिम लीग सभी ने इसका विरोध करने का निश्चय किया. 3 फरवरी 1928 को साइमन कमीशन जब बम्बई पंहुचा तो उसका प्रबल विरोध हुआ.

इसके विरुद्ध अखिल भारतीय अभियान चलाया गया. लाहौर में लाला लाजपत राय के नेतृत्व में साइमन कमीशन के विरोध में एक जुलुस निकाला गया. पुलिस द्वारा लालाजी पर लाठियां बरसाई गई जिससे वे बुरी तरह घायल हो गये और 17 नवम्बर को उनका देहांत हो गया. यदपि गांधीजी ने स्वयं इस आंदोलन में स्वयं भाग नहीं लिया था पर उन्होंने इस आंदोलन को  आशीर्वाद दिया था. सरकार की दमनकारी नीति के कारण जनता में तीव्र आक्रोश व्याप्त था.

भारतीयों के विरोध के बावजूद मई 1930 में साइमन कमिशन की रिपोर्ट प्रकाशित हुई जिसमें कही भी औपनिवेशिक स्वराज्य की बात नहीं कही गई इसलिए भारतीयों ने इसे अस्वीकार कर दिया.

पूर्ण स्वराज्य की मांग– दिसम्बर 1929 में पं जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में लाहौर में कांग्रेस अधिवेशन हुआ, 31 दिसम्बर 1929 को अधिवेशन में पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पास किया गया. गांधीजी के आदेशानुसार 26 जनवरी 1930 को सम्पूर्ण देश में प्रथम स्वतंत्रता दिवस मनाया गया. विभिन्न स्थानों पर सभाएं हुई और राष्ट्रीय ध्वज फहराकर तथा देशभक्ति पूर्ण गीत गाकर स्वतंत्रता दिवस मनाया. लाहौर अधिवेशन ने कांग्रेस को उचित अवसर पर सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारम्भ करने का अधिकार दे दिया.

सविनय अवज्ञा आंदोलन / दांडी यात्रा का प्रारम्भ

स्वतंत्रता दिवस मनाए जाने के तुरंत बाद गांधीजी ने घोषणा की कि वे ब्रिटिश भारत के सर्वाधिक घ्रणित नमक कानून को तोड़ने के लिए एक यात्रा का नेतृत्व करेगे. नमक पर राज्य का आधिपत्य बहुत अलोकप्रिय था. इसी को निशाना बनाते हुए गांधीजी अंग्रेजी शासन के खिलाफ असंतोष को संघटित करने की सोच रहे थे. हालांकि गांधीजी ने अपनी नमक यात्रा की पूर्व सूचना वायसराय लार्ड इरविन को दी थी लेकिन वे इस यात्रा के महत्व को नहीं समझ सके.

12 मार्च 1930 को गांधीजी ने अपने 78 आश्रमवासियों को साथ लेकर साबरमती आश्रम से दांडी नामक स्थान की ओर प्रस्थान किया. उन्होंने लगभग 200 मील की यात्रा पैदल चलकर 24 दिन में तय की. 6 अप्रैल 1930 को वे दांडी पहुचे व प्रार्थना के बाद गांधीजी ने वहां पड़े नमक को उठाकर स्वयं समुद्र के पानी से नमक तैयार करके नमक कानून तोडा व सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया. इसी बीच देश के अन्य भागों में समांतर नमक यात्राएं आयोजित की गई.

सविनय अवज्ञा आंदोलन के अन्य कार्यक्रम

नमक बनाकर नमक कानून तोड़ने के अधिकृत रूप से स्वीकृत राष्ट्रीय अभियान के अलावा सविनय अवज्ञा आंदोलन में विरोध की अन्य धाराएं भी सम्मिलित थीं यथा-

  1. देश के विशाल भाग में किसानों ने दमनकारी औपनिवेशिक वन कानूनों का उल्लंघन किया.
  2. कुछ कस्बों में फैक्ट्री कामगार हड़ताल पर चले गये.
  3. वकीलों ने ब्रिटिश अदालतों का बहिष्कार किया.
  4. विद्यार्थियों ने सरकारी शिक्षा संस्थाओं में पढ़ने से इनकार कर दिया.
  5. विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करना, विदेशी वस्त्रों की होली जलाना तथा स्वदेशी का प्रयोग करना, सविनय अवज्ञा आंदोलन का एक अन्य कार्यक्रम था.
  6. महिलाओं द्वारा शराब तथा विदेशी वस्त्रों की दुकानों पर धरना दिया गया.

सविनय अवज्ञा आंदोलन की प्रगति

शीघ्र ही सविनय अवज्ञा आंदोलन सम्पूर्ण देश में फ़ैल गया. लाखों लोगों ने अवैध रूप से नमक बनाकर नमक कानून को तोड़ा तथा विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार किया गया तथा उनकी होली जलाई गई, किसानो ने कर देने से इंकार कर दिया.

ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीति– इसके जवाब में सरकार असंतुष्टों को हिरासत में लेने लगी. नमक सत्याग्रह के सिलसिले में गांधीजी समेत लगभग 60 हजार लोगों को गिरफ्तार किया गया. प्रदर्शनकारियों पर गोलिया चलाई,सत्याग्रहियों पर लाठियाँ चलाई, महिलाओं के साथ अमानवीय बर्ताव किया गया. कांग्रेस को अवैध घोषित कर दिया गया तथा समाचारपत्रों पर कठोर प्रतिबंध लगा दिया गया.

गांधी इरविन समझौता– 5 मार्च 1931 को गांधीजी और वायसराय लार्ड इरविन के बीच समझौता हो गया जो गांधी इरविन समझौता के नाम से प्रसिद्ध हैं. इस समझौते की मुख्य शर्ते निम्नलिखित थीं.

  1. राजनीतिक बंदियों को रिहा कर दिया जाएगा.
  2. आंदोलन के दौरान जब्त की गई सम्पति उनके स्वामियों को लौटा दी जाएगी.
  3. कांग्रेस अपने सविनय अवज्ञा आंदोलन को स्थिगत कर देगी तथा द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेगी.

द्वितीय गोलमेज सम्मेलन की असफलता और सविनय अवज्ञा आंदोलन पुनः प्रारम्भ– 7 सितम्बर 1931 को लंदन में द्वितीय गोलमेज सम्मेलन आयोजित किया गया. इससें गांधीजी कांग्रेस के प्रतिनिधि थे, लेकिन साम्प्रदायिकता के प्रश्न और पूर्ण स्वतंत्रता की मांग पर कोई समझौता न हो सका और 1 दिसम्बर 1931 को यह सम्मेलन समाप्त हो गया. गांधीजी खाली हाथ लौट आए.

भारत लौटकर गांधीजी ने पुनः सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारम्भ कर दिया. ब्रिटिश सरकार ने दमनकारी नीति अपनाते हुए कांग्रेसी नेताओं को जेल में डाल दिया. 1932 के अंत तक लगभग 1,20,000 लोगों को गिरफ्तार किया गया.

सविनय अवज्ञा आंदोलन का अंत– यह आंदोलन धीरे धीरे शिथिल पड़ गया. सरकार ने बंदियों को जेल से मुक्त कर दिया गया. अंत में मई 1934 में गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन समाप्त कर दिया.

सविनय अवज्ञा आंदोलन का महत्व– इस आंदोलन की प्रमुख उपलब्धियां इस प्रकार रहीं.

  1. इसने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को व्यापक बनाया.
  2. इसने देशवासियों ने निर्भीकता, साहस, देशभक्ति, त्याग और बलिदान की भावनाओं का प्रसार किया.
  3. इस आंदोलन ने स्त्रियों में जागृति उत्पन्न की.
  4. इस आंदोलन ने स्वदेशी को प्रोत्साहन दिया.
  5. इसके परिणामस्वरूप 1935 में भारत शासन अधिनियम पारित किया गया.

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