राजनीति का अपराधीकरण पर निबंध | Essay on Criminalization of Politics in Hindi

Essay on Criminalization of Politics in Hindi: राजनीति का अपराधीकरण- अब्राहम लिंकन के अनुसार लोकतंत्र जनता का , जनता के लिए, जनता द्वारा चलाई जाने वाली शासन की पद्दति का नाम है. मगर यदि आज के परिपेक्ष्य में भारतीय राजनीती पर नजर डाली जाए तो यहाँ जनहित को बजाय अपराधियों के समूह नजर आते है. आजादी के बाद से ही हमारी राजनीति का अपराधीकरण आम बात है.Essay on Criminalization of Politics in Hindi

    राजनीति का अपराधीकरण पर निबंध | Essay on Criminalization of Politics in Hindi

भारतीय राजनीति में बढ़ता अपराधीकरण- कहने को भले ही भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, मगर इनके राजनितिक चरित्र में अभी तक अपराधियों का दबदबा कायम है. मुख्यतः चुनावों के समय देश के कई इलाकों में नेताओं द्वारा माफियाओं का सहारा लेना, व ऐसे लोगों को टिकट देना जो अपने अतीत में जुर्म की दुनिया से तालुकात रखते थे, कई द्रष्टान्त देखने को मिले है.

सभी बड़ी भारतीय राजनितिक पार्टियों में ऐसे सासंदों व विधायकों की बहुत बड़ी संख्या है. जिन पर विभिन्न धाराओं के तहत संगीन आरोप है. कुछ तो इसकी सजा भी भुगत चुके है. देश के कई संवेदनशील इलाकों में चुनाव के दिन धन का अनियंत्रित उपयोग व हिंसा की घटनाएं इस समस्या का जीता जागता उदहारण है.

जब इस तरह के चरित्र के लोग चुनकर हमारी लोकसभा व विधानसभाओं में जाएगे तो निश्चित तौर पर भ्रष्टाचार व अपराधीकरण को राजनीती में प्रश्रय ही मिलेगा.

भारतीय राजनीति का अपराधीकरण (Criminalization of Indian politics)

यदि गौर किया जाए आखिर राजनीति का अपराधीकरण का मुख्य जिम्मेदार कौन है, चुनाव लड़ने वाले नेता या मतदाता. जिस तरह लोकतंत्र को जनता का जनता के द्वारा परिभाषित किया जाता है, हमें भी अपने सवाल का जवाब मिल जाता है. क्योंकि लोकतंत्र में सर्वोच्च सता जनता है वही राजनेताओं को संसद तक पहुचने की शक्ति देती है,

अर्थात राजनीती की शक्ति जनता में निहित है. अपराधीकरण का इतिहास रहा है, कि इन्होने स्वयं को जिम्मेदार बताने की बजाय आरोपण का सहारा लिया है. राजनेता इसका जिम्मेदार जनता को मानते है, जनता ऐसे राजनेताओं व उनकी पार्टियों को.

धन व अपराध के बल पर चुनाव जितने वाले नेताओं को जनता ही सरकार में पहुचने का अवसर देती है. राजनीती के खेल में माहिर ये खिलाड़ी स्वयं पर आस न आने देते हुए सफेदपोश का सहारा लेकर अपने असली रूप को छिपा देते है, बाहर से जनता के सेवक व इनका दुष्ट चरित्र भीतर ही भीतर राजनीती में अपराध को जन्म देता है.

राजनीति का अपराधीकरण रोकने के प्रयास (Efforts to stop criminalization of politics)

इस तरह यह अपराध का खेल चलता रहता है. हालाँकि भारतीय संविधान द्वारा राजनीति का अपराधीकरण को समाप्त करने के लिए वर्ष 1951 में जनप्रतिनिधित्व कानून पारित किया गया था.

इसकी आठवी धारा के मुताबिक़ दो वर्ष तक की सजा भुगत चुका व्यक्ति किसी भी निकाय का चुनाव नही लड़ सकेगा. मगर चतुर लोगों द्वारा विविध हथकंडे अपनाकर इस कानून को पुर्णतः निष्प्रभावी सा बना दिया है.

अपराधी को अपने अपराध की सजा न सुनाए जाने अर्थात उस पर आरोप सिद्ध न हो जाने तक वह निर्दोष ही रहता है, इस अनुबन्धं के जरिये ये लोग राजनीती में अपनी पकड़ बना लेते है तथा अपनी राजनितिक शक्ति का दुरूपयोग करते हुए उन गुनाह के सबूतों को समाप्त करते हुए एक दिन बेगुनाह साबित करने में भी सफल हो जाते है.

जनप्रतिनिधि अधिनियम 1951 (Public representatives act)

वर्ष 2002 में माननीय सुप्रीम कोर्ट ऑफ इण्डिया द्वारा एशोसिएशन ऑफ डेमोक्रेसी रिफोर्म मामले की सुनाई करते हुए यह आदेश जारी किया था. कि प्रत्येक प्रत्याशी को अपना इलेक्शन एफिडेविट भरने के साथ ही यह स्पष्ट रूप से जानकारी देनी होगी, कि उनके खिलाफ किसी न्यायालय मंच में ऐसे किसी गुनाह के लिए केस नही है, जिसमे दो वर्ष या इससे अधिक की सजा हो सकती है.

अलग अलग कानूनी परिभाषाओं के कारण यदि कोई प्रत्याशी चुनाव जीत जाता है, तो जनप्रतिनिधित्व कानून की यही 8 वीं धारा निष्प्रभावी हो जाती है, अपराधी नेता को दो वर्ष से अधिक की सजा हो जाने पर भी वह चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित नही किया जाएगा.

इस तरह के ढुलमुल कानून ही भारतीय राजनीति का अपराधीकरण को रोकने की बजाय यथावत बनाए रखने में अप्रत्यक्ष रूप से मदद करते आए है.

भारतीय राजनीति का बदलता स्वरूप (Changing form of Indian politics)

भारत के विभिन्न राज्यों की विधानसभाओं, लोकसभा व राज्यसभा में ऐसे अपराधी नेताओं की सूची पर गौर किया जाए तो कई सैकड़ो ऐसे जनसेवक निकल कर आएगे, जो किसी न किसी अपराध की सजा भुगत चुके है अथवा न्यायालय के किसी प्रकरण में सुनवाई लम्बित है.

हाईकोर्ट ने हाल ही में यह निर्देश जारी किया था कि राज्यों की विधानसभा व लोकसभा के चुनावों का चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार को अपने चुनावी शपथ पत्र में उनके खिलाफ किये गये सभी अपराधिक मामलों की संख्या व ब्यौरा प्रस्तुत करना होगा. कोर्ट की इस गाइडलाइन से यह मंशा थी, की जनता अपने अमुक जनसेवक के असली चरित्र से वाकिफ हो सके.

तथा अपने हित में सही फैसला करते हुए योग्य उम्मीदवार का चयन कर सके. इतना कुछ होने के उपरांत भी बड़ी संख्या में अपराधी नेता हमारी शासन व्यवस्था को चला रहे है और निरंतर चुनाव जीतते ही जा रहे है.

राजनीति का अपराधीकरण पर बने कानून (Laws on Criminalization of Politics)

हमारे देश की राजनीती को अपराध मुक्त करने के लिए जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम लाया गया था. मगर इसके लागू हुए 75 से अधिक वर्ष का समय हो चूका है, आज के समय एवं उस समय की परिस्थतियों में बहुत बदलाव आ चूका है.

अतः अब संसद द्वारा इस विषय को अति आवश्यक समझते हुए जनप्रतिनिधित्व कानून में संशोधन करना चाहिए एवं ऐसे कठोर प्रावधान किये जाने चाहिए,

जिससे भारतीय राजनीती से अपराधीकरण की प्रवृति हमेशा के लिए समाप्त हो जाए. हाल ही वोटिंग मशीनों पर उठे सवाल व राजनीतिक दलों द्वारा चुनाव प्रक्रिया में खर्च किये जाने वाले धन को लेकर भी समय समय पर कानून बनाए जाने चाहिए.

इस दिशा में 1996 में भी कुछ कानून बनाए गये थे जिनमे हर राजनितिक दल को अपने प्रत्याशी पर खर्च होने वाले धन का ब्यौरा सार्वजनिक करना होगा, ऐसा न करने की स्थति वह खर्च उसका व्यक्तिगत ही माना जाएगा,

साथ ही दो चुनावी स्थानों से अधिक व राष्ट्र ध्वज व राष्ट्र गान का अपमान करने पर न्यायालय द्वारा दोषी ठहराया गया व्यक्ति भी लोकसभा व विधानसभा के लिए चुनाव नही लड़ सकेगा.

वर्ष 2003 में भारतीय संसद द्वारा उम्मीदवारों के चुनावी खर्च को नियंत्रित करने हेतु एक अधिनियम भी लाया गया जिसके अनुसार लोकसभा चुनाव में 25 लाख व विधानसभा चुनाव प्रचार के लिए अधिकतम 10 लाख रुपयें राशि का प्रावधान किया गया था.

अब वक्त आ चूका है, हमारी राजनीती में पनप रहे अपराधी लोगों को के काले चिट्टों को मिडिया के सामने लाया जाए, उनके झूठे चुनावी घोषणा पत्र को सभी के सामने लाए जावे.

तथा इस तरह के मक्कार लोगों का सामाजिक बहिष्कार कर भारतीय राजनीति का अपराधीकरण की जड़ को समाप्त करने में हमारा मिडिया व समुदाय महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकते है.

लेकिन इन सबमें जनता की सबसे अहम भूमिका है, उन्हें गहन जांच पड़ताल के बाद ही अपने मत का समुचित उपयोग करते हुए एकजुटता दिखानी होगी.

देश भर में इस तरह के एंटी पोलिटिकल क्राइम आन्दोलन करना होगा. स्वस्थ भारतीय राजनीती के लिए ऐसा कदम अब अपरिहार्य है.

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