मित्रता पर निबंध | Essay on Friendship in Hindi Language

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मित्रता पर निबंध Essay on Friendship in Hindi

मित्रता पर निबंध Essay on Friendship in Hindi

एक प्राचीन विद्वान् का वचन है, विश्वासपात्र मित्र से बड़ी भारी रक्षा रहती हैं. जिसे ऐसा मित्र मिल जाए उसे समझना चाहिए कि खजाना मिल गया. विश्वासपात्र मित्र जीवन की एक औषध हैं. हमें अपने मित्रों से यह आशा रखनी चाहिए कि वे उत्तम संकल्पों से हमें दृढ़ करेंगे, दोषों और त्रुटियों से हमें बचायेंगे, हमारे सत्य, पवित्रता और मर्यादा के प्रेम को पुष्ट करेंगे,

जब हम कुमार्ग पर पैर रखेंगे, तब वे हमें सचेत करेंगे, जब हम हतोत्साहित होंगे, तब हमें उत्साहित करेंगे सारांश यह है कि हमें उत्तमता पूर्वक जीवन निर्वाह करने में हर तरह से सहायता देंगे. सच्ची मित्रता में उत्तम वैद्य की सी निपुणता और परख होती है, अच्छी से अच्छी माता का सा धैर्य और कोमलता होती हैं. ऐसी ही मित्रता करने का प्रयत्न प्रत्येक व्यक्ति को करना चाहिए.

एक विद्वान् का मानना है कि विश्वसनीय मित्र प्राप्त हो जाय तो जाय तो हमारा जीवन सुरक्षित रहता हैं. विश्वसनीय मित्र का प्राप्त होना किसी मूल्यवान खजाने की प्राप्ति के समान है. विश्वासपात्र मित्र किसी श्रेष्ठ दवा के समान होता हैं. जैसे अच्छी दवा हमें रोगमुक्त करती हैं. उसी तरह एक सच्चा मित्र हमें बुराइयों से मुक्त करता हैं.

हमें आशा करनी चाहिए कि हमारा मित्र हमकों बुराइयों से बचाएगा. हम कोई अच्छा काम करने का निश्चय करेंगे  तो  उसमें हमारी मदद करेगा और हमें दृढ़ता प्रदान करेगा, हमारे मन में सत्य, पवित्रता और मर्यादा के प्रति जो प्रेम का भाव होगा, उसको मजबूत करने से सहयोग देगा. यदि हम बुरे काम करने में प्रवृत होंगे तो वह हमें रोकेगा और सावधान करेगा. यदि हमारा मन निराशा से भरा होगा तो वह उसे उत्साह से भरेगा.

वह हर दिशा में स्वयं को हमारा सच्चा मित्र सिद्ध करेगा. वह हमारी इस तरह सहायता करेगा कि हम अच्छा जीवन बिता सकें, जिस प्रकार एक चतुर वैद्य रोग की पहचान कर उसे दूर करता हैं, उसी प्रकार कुशल मित्र हमारे चरित्र को दोषमुक्त करता है. जिस प्रकार माता अपनी सन्तान के हित के प्रति सजग रहती रहती है और धीरज एवं कोमलता के साथ उसका मार्गदर्शन करती है, उसी प्रकार सच्चा मित्र भी हमारे हित संवर्धन के प्रति सजग रहता है. प्रत्येक व्यक्ति को ऐसा ही मित्र प्राप्त करने के लिए प्रयत्न शील रहना चाहिए.

साथ ही पढने वालों में मित्रता होना स्वाभाविक हैं. सहपाठी की मित्रता अर्थात विद्यार्थी जीवन की मित्रता के बारे में सोचते ही मन में उथल पुथल होने लगती हैं. युवावस्था की मित्रता छात्र जीवन की मित्रता से अलग प्रकार की होती हैं. उसमें दृढ़ता, शांति और गम्भीरता होती हैं. युवावस्था के मित्र बचपन के मित्रों से अनेक मामलों में अलग तरह के होते हैं.

लेखक का विचार हैं कि जो मनुष्य मित्रता करना चाहता है, उसके मन में आदर्श मित्र की बात अवश्य उठती हैं. वह अपनी कल्पना के अनुसार मित्र बनाना चाहता हैं. परन्तु ऐसा मित्र यथार्थ जीवन की समस्याओं के अनुरूप नहीं होता. जीवन के अनेक संकटों में उससे कोई सहायता नहीं मिलती.

एक अच्छे मित्र के कुछ कर्तव्य होते हैं. वह ऊँचे और श्रेष्ठ कामों में सहायता देता हैं. वह काम करने के समय अपने मित्र को प्रोत्साहित करता है और उसकी हिम्मत बढ़ाता हैं. उसके इन प्रयत्नों के कारण उसका मित्र अपनी शक्ति और क्षमता से भी अधिक काम कर लेता हैं. इस कर्तव्य को पूरा करना तभी सम्भव होगा जब मित्र में उत्कृष्ट गुण हों. वह मजबूत विचारों और सत्य में निष्ठा रखने वाला होना चाहिए.

इस कारण अपने से अधिक मानसिक दृढ़ता वाले मित्र की तलाश करना ही ठीक हैं. जिस प्रकार सुग्रीव ने राम को अपना मित्र और साथी बनाया था, उसी प्रकार प्रबल मानसिक शक्ति वाले पुरुष को अपना मित्र बनाना चाहिए. मित्र सम्मानित, पवित्र ह्रदय वाला, कोमल और पराक्रमी होना चाहिए. उसका व्यवहार शालीनता से पूर्ण तथा उसके विश्वास सत्य में अटल होना चाहिए. ऐसे गुणवान मित्र की खोज इसलिए जरुरी है कि उन पर विश्वास करके निर्भर रहा जा सकता है तथा किसी भी प्रकार के धोखे से बचा जा सकता हैं.

मित्र बनाने के समान ही जान पहचान के लोगों से सम्बन्ध बनाने में भी सजग रहना चाहिए. जान पहचान वाले वही व्यक्ति सम्पर्क बनाए रखने योग्य होते हैं. जो हमें किसी प्रकार का लाभ पहुंचा सकें. जान पहचान वाले भी हमारे जीवन को आनन्द दायक और श्रेष्ठ बनाने में सहायक हो सकते हैं. उनकी स्थिति इस विषय में मित्र से भिन्न होती हैं. वे मित्र के जितनी सहायता नहीं कर सकते, मनुष्य का जीवन बहुत छोटा हैं.

उसमें इतना समय नहीं होता कि हम उसको नष्ट करें. जीवन के समय के प्रत्येक क्षण का उपयोग करना चाहिए, हमारे परिचित जनों को हमारे साथ बुद्धिमानी और विनोद की बातें करनी चाहिए. हमें अच्छी बातें बतानी चाहिए. हमें संकट में धीरज प्रदान करना चाहिए. हमें कर्तव्य के प्रति सजग रहना चाहिए. हमारी ख़ुशी में शामिल होना चाहिए. यदि वे इनमें से कोई भी हमारे लिए नहीं कर सकते, तो उनका हमारे जीवन में कोई स्थान नहीं हैं. उनसे दूर ही रहना ठीक हैं.

बुरे लोगों का साथ बुखार की बीमारी के समान भयानक होता हैं. ऐसे लोगों के साथ रहने से बड़ी हानि होती हैं. बुखार आने पर मनुष्य का शरीर दुर्बल हो जाता हैं. ठीक इसी तरह बुरे लोगों का साथ करने नीति और सदाचरण को हानि पहुँचती हैं. बुद्धि नष्ट होती हैं. मनुष्य की अच्छे बुरे काम में अंतर समझने की शक्ति नष्ट हो जाती हैं. बुरे लोगों का साथ पैर में  बंधे  हुए  पत्थर  की चक्की के पाट के समान होता हैं. उससे वह उन्नति के मार्ग पर आगे बढ़ नहीं पाता उसका पतन हो जाता हैं. सच्चरित्र लोगों का साथ किसी की बांह के समान होता हैं. उनका सहारा पाकर मनुष्य लगातार उन्नति करता हैं.

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