बालिका शिक्षा और नारी सशक्तिकरण पर निबंध | Essay on Girl Education and Women’s Empowerment

importance of girl education बेटी घर का चिराग है, वे भी एक इंसान हैं. जननी हैं जो हमारे अस्तित्व का प्रमाण हैं. काश गर्भस्थ शिशु बोल सकता हैं. यदि वह बोलता तो शरीर को चीरते औजारों को रोक सकता हैं. और कहता माँ मुझे भी जीने दो, इस दुनिया में जन्म लेने दो. मगर यह भी हो सकता हैं उस समय भी बेटे की चाह रखने वाले ये कसाई सोच के निर्दयी माता-पिता नही सुनते, जो दोनों की इच्छा से इस तरह के कृत्य को अंजाम दे जाते हैं.  ये सवाल हमेशा उन लोगों पर उठता रहेगा जो कन्या हत्या के लिए पूर्ण रूप से जिम्मेदार हैं.

नारी सशक्तिकरण पर निबंध (Essay on Women’s Empowerment)

यदि हम अपने देश की ही बात करे तो आए दिन प्रति हजार लोगों पर स्त्रियों की संख्या निरंतर कम ही होती जा रही हैं. इसका दूसरा पहलु सरकार की ओर से कथित दलीले हैं. सरकार के कथनानुसार गाँव के लोगों तक 100 फीसदी शिक्षा पहुच चुकी हैं. जिससे कारण बालिका शिक्षा और महिला सशक्तिकरण के विषय में लोगों में जागरूकता बढ़ रही हैं.

मगर आज की स्थति बया करती है, आज भी कई जातिया ऐसी हैं जहाँ लडको की संख्या अधिक और लड़कियों की संख्या में कमी हैं. मजबूरन अब लोगों को अपनी जाति की परिधि से बाहर निकलकर शादी ब्याह करना पड़ता हैं. सभव हैं अभी भी स्थति नियंत्रित की जा सकती हैं. फिर भी हम नही जगे, तो जिस तरह जीवो की प्रजातियाँ लुप्त हो रही हैं. जिनमे कल बेटियों का नाम भी आ सकता हैं.

बेटी हम सभी के घर में उजाले का दीपक हैं, भला वो भी तो इंसान हैं. वह इस संसार की जगत जननी हैं. जिनकी रक्षा करना हम सभी का कर्तव्य भी हैं. इसलिए आज हम सभी यह सकल्प करे कि कन्या भ्रूण हत्या पर रोक लगाते हुए, इन्हे भी बेटों की तरह जीने का अधिकार देगे.

नारी महिमा पर कविता

जब माँ ही जग में नही होगी
तो तुम जन्म किस्से पाओगे.
जब बहन न होगी घर आगन में
तो किससे रुठोगे किसे मनाओगे.
जब दादी नानी न होगी,
तो तुम्हे कौन कहानी सुनाएगा?
जब कोई स्वप्न सुन्दरी ही नही होगी
तो तुम किससे ब्याह रचाओगे?
जब घर में बेटी ही न होगी
तो तुम किस पर लाड लुटाओगे?
जिस दुनिया में स्त्री न होगी,
उस दुनियाँ में कैसे रह पाओगे?
जिस घर में बहु न होगी,
तो वंश कैसे बढाओगे?
नारी के बिन जग सुना हैं,
तुम यह बात कब समझ पाओगे?
रचनाकार- सरिता चौधरी

बेटी पर कविता

कहती बेटी बाह पसार
मुझे चाहिए प्यार दुलार
बेटी को अनदेखा क्यों करता हैं
निष्ठुर संसार
यदि अन्धकार से उजाले में आना हैं
तो बेटियों को पढाना, बेटियों को बचाना हैं.
महिलाओ का सशक्तिकरण कर स्रष्टि के
सुन्दरतम निर्माण का
एक नया अध्याय लिख जाना हैं
कई जोर जुल्म से बचाना हैं
महिलओं का सशक्तिकरण कर
स्रष्टि के सुन्दरतम निर्माण का
एक नया अध्याय लिख जाना हैं
कई ओर जुल्म से बचाना हैं
कई कानूनों को परखना हैं
मुझे नये धर्मो को परखना हैं.
मुझे नये धर्मो को रचना हैं
/मुझे ही तो कुछ बदलना हैं
क्युकि मै लड़की हु मुझे पढना और बढना हैं
अगर बेटा वारिस हैं तो बेटी पारस हैं
अगर, बेटा वंश हैं तो बेटी अंश हैं
बेटा आन हैं, तो बेटी गुमान हैं
अगर बेटा संस्कार हैं तो बेटी संस्कृति हैं
अगर बेटा दवा हैं तो बेटी दुआ हैं
बेटा भाग्य हैं तो बेटी विधाता हैं
बेटा शब्द हैं तो बेटी अर्थ हैं
पापा की लाडली माँ की दुलारी
ओस की बूंद सी होती हैं बेटियाँ
मिटटी की खुशबु सी होती हैं बेटियाँ
घर की राजदार होती हैं बेटियाँ
सत्यम शिवम सुन्दरम सी होती हैं बेटियाँ
फिर दहेज के लिए क्यों मार दी जाती हैं बेटियाँ
दो वंशो को चलाने वाली होती हैं बेटियाँ
फिर क्यों गर्भ में ही मार दी जाती हैं बेटियाँ
बिजली चमकती हैं तो आकाश बदल जाता हैं
आंधी उठती हैं तो दिन रात बदल जाती हैं
और नारी शक्ति गरजती हैं तो इतिहास बदल देती हैं.
रचनाकार-नक्षत्री चौधरी

importance of women education

बेटी किसी के परिवार के आंगन का नन्हा सा फूल होता हैं, बेटी के जन्म से ही उनकी जंग की शुरुआत हो जाती हैं. बचपन से ही उन्हें बेड़ियों में जकड़ दिया जाता हैं. हर स्थति में उन्हें यह याद दिलाया जाता हैं, कि वो एक लड़की हैं और उन्हें एक लड़की की तरह लज्जा का आवरण ओढ़े रहना चाहिए.

इसी कारण आज हमारा देश कन्या भ्रूण हत्या, बाल विवाह, दहेज मृत्यु के रूप में समाज में आज भी वो दंश झेल रही हैं. परोक्ष रूप से आज भी हम ऐसे लोगों और चिकित्सकों को देखते हैं, जो सार्वजनिक रूप से बेटी का गुणगान करते हैं. बेटी भारत का भविष्य हैं. जैसे वाक्यांश अकसर सुनने को मिलते हैं. मगर जब हम अपनी हकीकत की मुआयना करे तो यकीनी तौर पर आज भी हम उन लोगों के साथ खड़े नजर आते हैं. बेटी किसी न किसी रूप में कन्या भ्रूण हत्या के भागी हैं.

हमे नित्य महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा, दहेज के लिए प्रताड़ना और भेदभाव जैसी खबरे सुनने देखने को मिलती हैं. इस तरह के वातावरण को समाप्त करने के लिए सरकार द्वारा कई कानूनों को भी पारित किया गया. मगर जन समर्थन के अभाव में अपेक्षित परिणाम नजर नही आ रहे हैं.

बेटी बचाओं बेटी पढ़ाओ की दिशा में माननीय प्रधानमन्त्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू किया गया. बेटी बचाओं बेटी बचाओं एक सकारात्मक कदम हैं.

advantages of female education

आजादी के बाद से हमारा देश विभिन्न क्षेत्रों में प्रगति कर रहा हैं. मगर 70 सालों बाद भी स्त्री को समाज में वह स्थान नही मिल पाया हैं. जिसकी वह असली हकदार हैं. यही वजह हैं कि भले ही कठोर नियम और कानून कायदे बना दिए गये हो मगर उनका कठोरता से पालन नही किया जाता हैं.

भारत में भ्रूण का लिंग परीक्षण पूर्णतया निषेध और गैर क़ानूनी होने के उपरांत भी खुले आम इसकी धज्जियां उड़ाई जाती हैं. आज भी लोगों की यह गलत सोच हैं कि बेटा हमारे अधिक काम का होगा. बेहतर यही हैं बेटा जन्मे या बेटी इन्हें भगवान् की कृपा समझकर हमे स्वीकार कर लेना चाहिए.

यदि हम अपनी सन्तान में बेटा बेटी का अंतर न करते हुए उन्हें अच्छी शिक्षा और बेहतर मार्ग दर्शन दे तो वह बेटी भी कभी भी बेटे की कमी का अहसास नही होने देगी. भले ही बहुत से लोग उच्च  शिक्षा हासिल कर सभ्य समाज के अंग बन गये हैं, मगर उनकी सोच और मानसिकता अभी भी वही हैं जो मध्ययुग में लोगों की हुआ करती थी. लड़के-लड़की में भेद कर हम भी उन लोगों का अप्रत्यक्ष समर्थन करते है जो बेटी के विरोधी हैं.

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