हमारी राष्ट्रभाषा हिंदी पर निबंध | Essay On Hindi Our National Language In Hindi Language

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Essay On Hindi Our National Language In Hindi Language

Essay On Hindi Our National Language In Hindi Language

प्रस्तावना– भाषा मनुष्य को इश्वर द्वारा दिया गया महान वरदान हैं. पहले मनुष्य संकेतों से,  कुछ ध्वनियों से अपना मन्तव्य प्रकट करता था. धीरे धीरे ध्वनि चित्र बने व लिपि का निर्माण होने से बोली को भाषा होने का गौरव प्राप्त हुआ,  भाषा के कारण ही साहित्य, कला, धर्म, संस्कृति और विज्ञान आदि क्षेत्रों की मानवीय उपलब्धियाँ आज सुरक्षित रह सकी हैं.

भारत की भाषायें– भारत एक विशाल देश हैं. उसमें अनेक भाषाएँ प्रयोग की जाती हैं. भारत में बोली जाने वाली अनेक भाषाओं में से पन्द्रह मुख्य भाषाओं को भारतीय संविधान में मान्यता दी गयी हैं. ये भाषाए तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, उड़िया, बंग्ला, असमिया, मराठी, गुजराती, पंजाबी, सिन्धी, कश्मीरी, उर्दू, संस्कृत तथा हिंदी हैं. इनमें हिन्दी को संविधान द्वारा भारत की राष्ट्रभाषा के रूप में माना गया हैं.

राष्ट्रभाषा के लिए उपयोगी हिन्दी– राष्ट्रभाषा बनने के लिए किसी भी भाषा में कुछ विशेषताओं का होना आवश्यक हैं. वह सरल हो, जिससे अन्य भाषा भाषी उन्हें सरलता से सीख सके. वह देश की सभ्यता और संस्कृति को व्यंजित करने वाली हो. उसका विस्तार देश के दूरस्थ विभिन्न प्रदेशों तक हो. उसका साहित्य सम्रद्ध हो. देश के राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक वैज्ञानिक तथा शैक्षिक कार्यों के संचालन में उसका उपयोग सफलता के साथ हो सके. निसंदेह हिन्दी इन सभी विशेषताओं से युक्त हैं. और भारत की राष्ट्रभाषा होने के लिए सर्वाधिक उपयोगी हैं.

राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी का विकास– राष्ट्रभाषा की मान्यता प्राप्त होने पर केंद्र तथा राज्य सरकारों हिन्दी सेवी संस्थाओं तथा हिन्दी प्रेमीजनों ने उसके विकास का पूरा प्रयास किया हैं. केंद्र में हिन्दी निदेशालय खोला गया हैं. विभिन्न प्रकार शब्दावलियों का निर्माण हुआ हैं. वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दकोष तैयार हुआ हैं. उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश आदि में हिन्दी को राजभाषा का दर्जा प्राप्त हुआ हैं. सरकार ने अहिन्दी भाषी कर्मचारियों को हिन्दी सीखने के लिए प्रोत्साहित किया हैं. हिन्दी में टंकण तथा आशुलिपि का विकास भी हुआ हैं.

हिन्दी के विकास में गैर सरकारी संस्थाओं का योगदान– किसी भी भाषा का विकास अपनी स्वाभाविक गति से होता हैं. सरकारी प्रयास उसे कृत्रिम रूप से बढ़ावा देते हैं किन्तु उससे विशेष लाभ नहीं होता. हिन्दी की प्रगति में सरकारी प्रयासों की अपेक्षा अन्य व्यक्तियों तथा संस्थाओं का योगदान महत्वपूर्ण हैं. विभिन्न संस्थाएं अहिन्दी भाषी क्षेत्रों में हिन्दी के विकास का कार्य सफलता के साथ कर रही हैं. सिनेमा तथा दूरदर्शन का योगदान हिन्दी के प्रसार प्रचार में बहुत महत्वपूर्ण हैं. हिन्दी फिल्मों तथा दूर दर्शन के कार्यक्रमों ने देश विदेश में हिन्दी को लोकप्रिय बनाया हैं.

हिन्दी विरोध की राजनीति– राष्ट्रभाषा घोषित होने पर हिन्दी का विरोध होने लगा. चक्रवर्ती राजगोपालाचारी तथा सुनीति कूमार चटर्जी ने यह कहकर हिन्दी का विरोध किया कि उसमें अंग्रेजी का स्थान लेने की क्षमता नहीं हैं. देश की एकता के लिए अंग्रेजी का होना जरुरी हैं. हिन्दी में वैज्ञानिक तथा तकनीकी शिक्षा देने के लिए शब्दावली ही नहीं हैं. इसी आधार पर अहिन्दी भाषी क्षेत्रों में हिन्दी विरोध के आंदोलन चले. लेकिन इन सबके पीछे राजनीति ही कारण रही अन्यथा उपर्युक्त समस्त तर्क निराधार तथा महत्वहीन ही हैं. हिन्दी तो अहिन्दी भाषी जनों में अपना स्थान निरंतर बनाती जा रही हैं.

विकास के लिए सुझाव– हिन्दी के विकास के लिए सबसे महत्वपूर्ण सुझाव हैं कि उसको अपने नैसर्गिक प्रवाह के साथ बढने दिया जाए. आवश्यकता यह हैं कि हिन्दी को नवीन ज्ञान विज्ञान के अनुरूप विकसित किया जाये. राजकीय कार्यों में हिन्दी के प्रयोग को प्रोत्साहित किया जावे. हिन्दी में उच्च कोटि के वैज्ञानिक, तकनीकी तथा शास्त्रीय ज्ञान से सम्बन्धित साहित्य की रचना हो. विश्वविद्यालयों तथा प्रतियोगी परीक्षाओं में हिन्दी माध्यम के प्रयोग को बढ़ावा दिया जाए.

उपसंहार– अपनी भाषा की उन्नति से ही देश की सच्ची उन्नति होगी. भारतेंदु हरिश्चन्द्र ने लिखा हैं.

निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल
बिन निज भाषा ज्ञान के मिटै न हिय को शूल

अतः हमारा कर्तव्य है कि हम राष्ट्रभाषा हिन्दी की उन्नति में अपना योगदान सुनिश्चित करें.

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