नम्रता पर निबंध | Essay On Humility In Hindi

नम्रता पर निबंध Essay On Humility In Hindi: नमस्कार दोस्तों आपका हार्दिक स्वागत हैं. आज हम विनम्रता पर भाषण, निबंध, अनुच्छेद लेख साझा कर रहे हैं. नम्रता क्या है जीवन में विनम्रता का महत्व क्या हैं. Humility Essay In Hindi में हम छोटा सा निबंध बता रहे हैं.

नम्रता पर निबंध | Essay On Humility In Hindi

नम्रता पर निबंध Essay On Humility In Hindi

विद्वान् नम्रता को स्वतंत्रता की जननी मानते हैं. साधारण लोग भ्रमवश अहंकार को उसकी माता मानते हैं, वास्तव में वह विमाता है. आत्म संस्कार हेतु स्वतंत्रता आवश्यक हैं. मर्यादापूर्वक जीवन व्यतीत करने के लिए आत्मनिर्भरता जरुरी हैं.

आत्म मर्यादा हेतु आवश्यक है कि हम बड़ो से सम्मानपूर्वक छोटों और बराबर वालों के साथ कोमलता का व्यवहार करें. युवाओं को याद करना चाहिए कि उनका ज्ञान कम है. वे अपने लक्ष्य से पीछे है तथा उनकी आकांक्षाएं उनकी योग्यता से अधिक है. हम और जो कुछ भी हमारा हैं, सब हमसे नम्र रहने की आशा करते हैं.

नम्रता या अर्थ निश्चय तथा दूसरों का मुहं ताकना नहीं है. इससे तो प्रज्ञा मंद पड़ जाती हैं. संकल्प क्षीण होता है, विकास रूक जाता हैं तथा निर्णय क्षमता नहीं आती. मनुष्य को अपना भाग्य विधाता स्वयं होना चाहिए. अपने फैसलें तुम्हे स्वयं ही करने होंगे.

विश्वासपात्र मित्र भी तुम्हारी जिम्मेदारी नहीं ले सकता. हमें अनुभवी लोगों के अनुभवों से लाभ उठाना चाहिए, लेकिन हमारे निर्णयों तथा हमारें विचारों से ही हमारी रक्षा व पतन होगा. हमें नजरे तो नीचे रखनी है, लेकिन रास्ता भी देखना हैं. हमारा व्यवहार कोमल तथा लक्ष्य उच्च होना चाहिए.

संसार में हरीशचंद्र और महाराणा प्रताप जैसे अनेक महापुरुष हुए है जिन्होंने आजीवन कष्ट उठाए लेकिन सत्य और मर्यादा नहीं छोड़ी.

चन्द्र टरे सूरज टरे, टरे जगत व्यवहार |.
पै दृढ़व्रत हरिश्चन्द्र को, टरे न सत्य विचार

महाराणा प्रताप की स्त्री और बच्चें भूख से तडपते आजीवन जंगलों में भटकते रहे लेकिन स्वतंत्रता नहीं छोड़ी. एक बार एक युवक राजनीतिज्ञ बलवाइयों के हाथ पड़ गया. बलवाइयों ने उससे व्यंग्यपूर्वक पूछा कि उसका किला कहाँ है तो उसने अपने ह्रदय पर हाथ रखकर कहा, यहा, ज्ञान का गढ़ भी यही हैं.

जो युवक सदा बातों में दूसरों का सहारा लेते हैं. उनके आत्म संस्कार उन्नति नहीं कर सकते. उन्हें स्वयं विचार करना चाहिए तथा अपने निश्चय पर दृढ रहना चाहिए. दूसरों की बातों को तो समझना चाहिए, उनका अंध भक्त नहीं बनना चाहिए.

तुलसीदास जी की सर्वप्रियता, कीर्ति तथा शांतिमय दीर्घ जीवन उनकी मानसिक स्वतंत्रता, निर्द्वन्द्वता और आत्मनिर्भरता के कारण ही था. उनके समकालीन कवि केशवदास जो विलासी राजाओं की कठपुतली बने रहे दुर्गति को प्राप्त हुए. मनुष्य और दास में यही अंतर हैं. इसे स्वतंत्रता, आत्मनिर्भरता अथवा स्वावलम्बन कुछ भी कह सकते हैंइसी भाव की प्रेरणा से राम लक्ष्मण बड़े पराक्रमी वीरो पर विजय पा सके.

इसी प्रेरणा से हनुमान सीता की खोज कर सके तथा कोलम्बस ने अमेरिका ढूढ़ निकाला. इसी वृत्ति के बल पर सूरदास ने अकबर के बुलाने पर फतेहपुर सीकरी जाने से मना कर दिया था.

कहा मोकों सीकरी सो काम

इसी वृत्ति के बल पर मनुष्य परिश्रम करता हैं, गरीबी को झेलता है ताकि उसे थोडा ज्ञान मिल सके. इसी चित वृत्ति के प्रभाव से हम प्रलोभनों व कुमंत्रनाओं पर विजय प्राप्त करते है तथा चरित्रवान लोगों से प्रेम करते हैं. इस वृत्ति के प्रभाव से युवा पुरुष शांत और सच्चे रह सकते हैं, मर्यादा नहीं खोते तथा बुराई में नहीं पड़ते.

इसी चित वृत्ति के कारण बड़े बड़े लोग महान कार्य करके यह सिद्ध कर सके कि कोई भी अडचन बस यही तक, और आगे न बढ़ना, उन्हें रोक नहीं सकती. इसी प्रभाव से दरिद्र तथा अनपढ़ लोगों ने उन्नति तथा सम्रद्धि प्राप्त की हैं. मैं राह देखता या राह निकालूँगा कि कहावत इसी का परिणाम हैं.

इसी वृत्ति की उत्तेजना से शिवाजी ने मुगलों को छका सके और एकलव्य एक बड़ा धनुर्धर बन सका. इसी वृत्ति से मनुष्य महान बनता है उसका जीवन सार्थक और उद्देश्य पूर्ण बनता हैं. तथा उसमें उत्तम संस्कार आते हैं. वहीँ मनुष्य कर्म क्षेत्र में श्रेष्ठ और उत्तम रहते है जिनमें वृद्धि चतुराई और दृढ निश्चय हैं वे ही दूसरों को भी श्रेष्ठ बनाते हैं.

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