जीवन में कार्य का महत्व पर निबंध Essay On Importance Of Work In Life In Hindi

जीवन में कार्य का महत्व पर निबंध Essay On Importance Of Work In Life In Hindi: हम जो कुछ प्राप्त करते है अथवा पाने की कामना करते हैं उनका आधार कार्य ही होता हैं. जीवन का दूसरा नाम ही कर्मशीलता हैं निष्कर्मन्यता को जीवन का सर्वाधिक न्यून स्तर माना गया हैं. आज के निबंध में हम पढेगे कि जीवन में कर्म अर्थात कार्य का महत्व क्या हैं.

Essay On Importance Of Work In Life In Hindi

Essay On Importance Of Work In Life In Hindi

जीवन में कर्म अर्थात कार्य करने का अर्थ है सच्ची लग्न निष्ठा मेहनत तथा ईमानदारी से अपने दायित्वों को पूर्ण करना, कार्य का बड़ा महत्व हैं, इसके बिना जीवन का कोई सार नहीं हैं.

भगवान श्रीकृष्ण गीता के कर्मयोग में कार्य का महत्व बताते हुए कहते हैं मनुष्य को निरंतर कर्मशील बने रहना चाहिए, उसे फल की चिंता करने की बजाय अपने कार्य पर ध्यान देना चाहिए. मनुष्य एक पल भी बिना कार्य के नहीं रह सकता, बाहरी तौर पर भले ही वह कोई कर्म न करे, मगर उसका मन लगातार चिंतन करता रहता हैं. मनुष्य कार्य के बिना शरीर का निर्वाह नहीं कर सकता हैं. जो इन्सान संसार से बंधन से मुक्त हो चूका है उसे भी निरंतर कार्य करके कर्मयोगी बनना चाहिए.

निरंतर कार्य में लगा रहना ही सच्ची सफलता का सूत्र हैं. कार्य रुपी वृक्ष पर सही समय पर कामयाबी के पुष्प पल्लवित होते हैं, जीवन में कार्य ही सच्ची पूजा एवं साधना हैं. अन्नदाता कृषक निरंतर अपने कर्म में रत रहकर वह सभी का भरण पोषण करता हैं. मजदूर अपने निरंतर कार्यों से उद्योगों को संचालित करते हैं. ड्राईवर कर्तव्यों का निर्वहन कर राष्ट्र को गतिशील बनाते हैं. माल व लोगों को अपने गन्तव्य तक पहुंचाते हैं.

चिकित्सालय के डॉक्टर और नर्स का कार्य रोगियों को व्याधि मुक्त कर नया जीवन प्रदान करता हैं. एक छात्र निरंतर कार्य एवं अभ्यास के बल पर उच्च योग्यता का अर्जन करते हैं. विज्ञान तथा तकनीकी के क्षेत्र के लोग निरंतर नये नये अनुसंधानों में लगे रहकर मानव कल्याण के लिए नयें साधनों को इजाद करते हैं. ईश्वर की इस प्रकृति की गतिशीलता का सिद्धांत कार्य पर टिका हैं. मानव ने लगातार कर्मशील बनकर चन्द्रमा तक अपनी पहुँच को बनाया हैं.

कार्य न करने वाले प्राणी को पशु के समान समझा जाता हैं. हर अवसर पर काम से जी चुराने वाले तथा आलसी किस्म के प्राणी बिन सिंग पूंछ के जानवर के समक्ष ही हैं. अकर्मण्य व्यक्ति को पृथ्वी पर बोझ माना गया हैं. भले ही वह कितना भी आकर्षक और अच्छे संदेश प्रसारित करने वाला हो. परिवार, समाज तथा राष्ट्र की उन्नति में उसका कोई योगदान नहीं होता हैं. अक्सर देखा गया हैं, अपने कर्तव्यों से जी चुराने वाले, बहाने बनाने वाले लोग आगे जाकर अपराधी प्रवृत्ति के बन जाते हैं, जो किसी भी समाज के दुश्मन तुल्य होते हैं.

बहुत से लोग कार्य एवं परिश्रम करने वालों को हीन भावना से देखते हैं. कोई भी कार्य छोटा बड़ा हीन या उत्तम नहीं होता हैं कार्य करना मानव होने की निशानी हैं. प्रकृति की रचना इस तरह की हैं कि आज बाबू समझता है उस पर ऊपरी अधिकारी का बोझ है अधिकारी कलक्टर को बोझ मानता हैं कलक्टर सरकार को, सरकार विपक्ष को आदि आदि ये केवल मानसिक विकार तथा सोच का ओछापन हैं.

जीवन में हमें कभी काम करने से जी नहीं चुराना चाहिए बल्कि कम समय में अधिक से अधिक कार्य करने का यत्न करना चाहिए, क्योंकि परिश्रम अथवा कार्य ही सफलता के मूल तंत्र हैं. निरंतर अपने कार्य में लगने वाले के पास सफलता तो उलटे पाँव भागी आती हैं. व्यक्ति यदि अपने कार्यों को शुद्ध अंतकरण से करना शुरू कर दे तो उनकी विफलताएं भी कामयाबी बनकर आती हैं. हमनें ऐसे हजारों लोगों के उदाहरण पढ़े व सुने है जो सामान्य से विशेष केवल अपने कर्मों के दम पर ही बने हैं. गांधी, लिंकन, लेनिन, न्यूटन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस तरह के उदाहरण हैं जो हमें निरंतर कर्म में लगे रहने की प्रेरणा देते हैं.

कर्म ही धर्म है निबंध Work is Worship Essay in Hindi – कार्य ही पूजा है

मनुष्य जब जब अपने कर्म को सम्मान देता है तथा पूरी श्रद्धा के साथ उसे सम्पन्न करने में लग जाता हैं तो निश्चय ही उसे सफलता मिलती हैं. हमारे धर्म ग्रंथों में इसी बात को कहा गया हैं कि कर्म ही पूजा हैं, अर्थात जिस तरह श्रद्धा भक्ति व तन्मयता के साथ पूजा होती हैं वही निष्ठा कार्य के प्रति रखी जानी चाहिए. प्रत्येक मानव हाथ, पैर मस्तिष्क लेकर पृथ्वी पर उतरा हैं,

हमें ईश्वर ने इसलिए ये ज्ञानेन्द्रिय व कर्मेंद्रिय दी क्योंकि वह हमसे कार्य करवाना चाहता हैं. इस लोक की सरंचना इस तरह से की हैं कि हमें अपनी जरुरतो को पूर्ण करने के लिए कर्म करने की आवश्यकता पडती ही हैं. हम किस तरह के कर्म करे अथवा हमें कहाँ तक सफलता मिलेगी. यह उस काम के प्रति हमारी ईमानदारी और समर्पण भाव पर निर्भर करता हैं.

कार्य के बिना हमारी थाली में सजा खाना हमारे मुहं तक नहीं आ सकता, जीवन कर्म के बिन अकर्मण्य बन जाता हैं, इसे उपयोगी बनाने में कर्म की बड़ी भूमिका हैं. जीवन में निरंतर कार्य करते रहना ही मानव का प्रथम कर्तव्य माना गया हैं, आलस्य, निद्रा, सुस्ती को कर्म का शत्रु व जीवन का अभिशाप माना गया हैं. ये मानव के व्यक्तित्व विकास के बाधक हैं.

अपने जीवन में सफलता की बुलंदियां स्पर्श करने वाले व्यक्तियों ने कार्य के महत्व को समझा है तथा कार्य के लिए स्वयं को पूर्ण रूप से समर्पित करने पर ही उन्होंने वह मुकाम अर्जित किया हैं. भाग्य, किस्मत अथवा ईश्वर भी उनके के साथ चलते हैं जो कर्म करने में संकोच नहीं करता हैं.

सरल शब्दों में समझे तो कार्य अथवा कर्म को हम अपने जीवन में प्रयास के रूप में अमल में लाते हैं. यदि आप भी निरंतर प्रयासरत है अपने लक्ष्य की ओर तो आप सफलता रुपी प्याले में निरंतर अमृत रस जमा कर रहे हैं जो एक दिन आपके लिए फल के रूप में छलकेगा. हम अपने जीवन में जो कुछ प्रगति या विकास के कारनामे देखते अथवा सुनते हैं उनके पीछे कार्य और सिर्फ कार्य जुड़ा होता हैं.

कर्म कैसे पूजा है इसे उदाहरण के जरिये समझे तो जापान का उदाहरण सही प्रतीत होता हैं. दूसरे विश्व युद्ध में जब इसने अपने दो सर्वाधिक विकसित महानगरों को परमाणु की विभीषिका से ख़ाक होते देखा, यूँ समझ ले जापान की रीढ़ की हड्डी 1945 में तोड़ दी गई.

आज वो छोटा सा देश जहाँ हर दिन ज्वालामुखी के ज्वार निकलते हैं अपने इतिहास के काले अध्याय को भुलाकर किस तरह केवल कर्म के दम पर आज वह विश्व का सर्वाधिक शक्तिशाली राष्ट्रों में गिना जाता हैं. जापानियों ने अपनी तबाही को भाग्य का लिखा मानने की बजाय, फिर से उठ खड़े हुए और कर्म के महत्व को अपने जीवन के सिद्ध कर दिखाया कि कुछ ही असम्भव नहीं होता हैं यदि मानव कुछ करने की ठान ले तो एक दिन वह सब कुछ पा सकता हैं.

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