इस्लाम की शिक्षाएं पर निबंध | Essay on islam teachings In Hindi

इस्लाम की शिक्षाएं पर निबंध Essay on islam teachings In Hindi: इस्लाम 1400 वर्ष प्राचीन एक मजहब हैं जिसकी नींव मक्का मदीना में रखी गई, जिनके संस्थापक हजरत मोहम्मद को माना गया था. आज इस्लाम के अनुयायियों की अन्य मत, मजहब और धर्म की तुलना में अधिक हैं. कुरान की शिक्षाओं पर आधारित इस्लाम की प्रमुख शिक्षाओं पर यहाँ निबंध दिया गया हैं.

इस्लाम की शिक्षाएं पर निबंध | Essay on islam teachings In Hindi

इस्लाम की शिक्षाएं पर निबंध Essay on islam teachings In Hindi

इस्लाम धर्म की शिक्षाएँ मुसलमानों के धर्मग्रंथ कुरान शरीफ में संकलित हैं. हदीस में मुहम्मद साहब द्वारा दिए गये उपदेशों और आदेशों का संग्रह हैं. इन दोनों ग्रंथों के आधार पर इस्लाम धर्म की प्रमुख शिक्षाएँ निम्नलिखित हैं.

इस्लाम धर्म की प्रमुख शिक्षाएं (Major teachings of Islam)

एकेश्वरवाद (Monotheism)

हजरत मुहम्मद साहब एकेश्वरवाद में विश्वास करते थे. उनका कहना था कि अल्लाह एक है जो सर्वशक्तिशाली तथा सर्व व्यापक है तथा मैं उसका पैगम्बर हूँ. इस प्रकार हजरत मुहम्मद साहब की बहुदेववाद का विरोध किया तथा एकेश्वरवाद का प्रचार किया.

मूर्तिपूजा का विरोध (Resist idolatry)

इस्लाम मूर्तिपूजा का विरोध करता हैं. हजरत मुहम्मद साहब का कहना था कि अल्लाह निराकार एवं सर्वव्यापक हैं अतः उन्होंने मूर्तिपूजा का घोर विरोध किया. इस्लाम धर्म में मूर्तिपूजा का निषेध हैं.

पांच धार्मिक कर्तव्य (Five religious duties)

कुरान के अनुसार प्रत्येक मुसलमान को निम्नलिखित पांच कर्तव्यों का पालन करना चाहिए.

  1. कलमा पढ़ना– इस्लाम धर्म के अनुसार प्रत्येक मुसलमान को कलमा पढ़ना चाहिए. कलमा का अर्थ है अल्लाह एक है और मुहम्मद साहब उसके रसूल या पैगम्बर हैं. अतः मुसलमानों को केवल एक अल्लाह की ही उपासना करनी चाहिए.
  2. नमाज पढ़ना– प्रत्येक मुसलमान को दिन में पांच बार नमाज पढ़नी चाहिए तथा शुक्रवार को दोपहर में सामूहिक रूप से एक साथ सभी मुसलमानों को नमाज पढ़नी चाहिए. इस्लाम धर्म में नमाज का अत्यधिक महत्व हैं. यह इस्लाम का स्तम्भ हैं. नमाज से वासनाएं नष्ट होती हैं.
  3. रोजा रखना– कुरान के अनुसार प्रत्येक मुसलमान को रमजान के महीने में रोजा रखना चाहिए. इस माह में मुसलमानों को पूरे दिन भोजन, पानी आदि बंद रखना पड़ता हैं तथा सूर्य के छिपने पर ही रात्रि में ही भोजन करना पड़ता हैं.
  4. हज– प्रत्येक मुसलमान को अपने जीवन काल में एक बार हज के लिए मक्का की यात्रा करनी चाहिए.
  5. जकात– प्रत्येक मुसलमान को अपनी आय का 1/40 भाग गरीबों को दान में देना चाहिए.

सामाजिक समानता पर बल देना (Emphasizing social equality)

इस्लाम धर्म के अनुसार अल्लाह ही सब प्राणियों का रचना करने वाला हैं. अतः सब मुसलमान समान है और भाई भाई हैं. इस्लाम धर्म ऊंच नीच के भेद भाव में विश्वास नहीं करता तथा सामाजिक समानता पर बल देता हैं.

कर्म के फल तथा परलोक में विश्वास (Belief in the fruits of karma and the hereafter)

इस्लाम धर्म के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्मों का फल भोगना पड़ता हैं. हजरत मुहम्मद साहब का कहना था कि मृत्यु के बाद व्यक्ति को खुदा के सामने उपस्थित होना पड़ता हैं. जहाँ उसके कार्यों के अनुसार न्याय होता हैं. जो व्यक्ति अपने जीवन काल में इस्लाम के सिद्धांतों का पालन करता हैं, उसे स्वर्ग प्राप्त होता है तथा जो इस्लाम के सिद्धांतों की अवहेलना करता हैं उसे नरक प्राप्त होता हैं.

नैतिक गुणों पर बल देना (Emphasize moral qualities)

इस्लाम धर्म नैतिक गुणों पर बल देता हैं. इस्लाम धर्म के अनुसार मनुष्य को चोरी, डकैती, हत्या, छल कपट, दुराचार, जुआ, मद्यपान आदि पापों से दूर रहना चाहिए. इस्लाम धर्म के अनुसार इस प्रकार के पाप करने वाले मुसलमानों को नरक मिलता हैं. जहाँ उन्हें भयंकर यातनाएँ सहन करनी पड़ती हैं,

मुहम्मद साहब ने यह भी उपदेश दिया कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने माता पिता तथा बड़ों का आदर करना चाहिए तथा दीन दुखियों की सहायता करनी चाहिए. प्रत्येकमुसलमान  को न्यायप्रियता, भलाई, उदारता, गरीबों की सहायता जैसे गुणों को ग्रहण करना चाहिए.

आत्मा की अमरता में विश्वास (Believe in the immortality of the soul)

इस्लाम धर्म के अनुसार आत्मा अजर और अमर हैं. शरीर नश्वर है, परन्तु आत्मा अमर हैं.

स्वर्ग तथा नरक की कल्पना (Imagine heaven and hell)

इस्लाम धर्म ने भी स्वर्ग तथा नरक की कल्पना की हैं. स्वर्ग में अल्लाह शासन करता हैं जहाँ परम शान्ति रहती है वहां सभी प्रकार के सुख उपलब्ध होते हैं तथा नरक में सदा आग के वस्त्रों में लिपटे रहना पड़ता हैं. वहां अनेक प्रकार के कष्ट तथा यातनाएँ भोगनी पड़ती हैं. प्रत्येक मनुष्य उसके कार्यों के अनुसार स्वर्ग अथवा नरक मिलता हैं.

देवदूत और शैतान (Angel and devil)

कुरान में देवदूतों को मलक या फरिश्ते के नाम से पुकारा गया हैं. मनुष्य इन फरिश्तों को देख नहीं सकते और न ही वे प्रकट होकर मनुष्यों से बात कर सकते हैं. इस्लाम धर्म में शैतान में विश्वास रखने का निषेध हैं.

कयामत (kayaamat)

इस्लाम धर्म के अनुसार मृत्यु के पश्चात मनुष्य की रूह कयामत के दिन की प्रतीक्षा करती हैं. कयामत के दिन सभी रूहें ईश्वर के सामने प्रस्तुत होगी और उनके अच्छे एवं बुरे कर्मों के अनुसार उन्हें जन्नत अथवा दोजख मिलेगा. अच्छे कर्म करने वालों को स्वर्ग तथा बुरे कर्म करने वालों को नरक मिलेगा.

ईमान और कुफ्र (Iman and Kufr)

विद्वानों के अनुसार ईमान का अर्थ है उसूल. उसूल वे धार्मिक सिद्धांत है जिन्हें नबी ने जताया हैं. इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात यह हैं कि अल्लाह को छोड़कर और किसी की उपासना नहीं करनी चाहिए. इस्लाम धर्म को न मानना कुफ्र कहलाता हैं. कुफ्र का सबसे बुरा रूप शिर्क हैं जिसमें ईश्वर के अतिरिक्त अन्य किसी देवता को ईश्वर मानकर उसकी पूजा की जाती हैं. शिर्क में विश्वास करने वाले को काफिर कहा जाता हैं. शिर्क का सबसे बुरा रूप है मूर्ति पूजा. इस्ल्मम मूर्ति पूजा का घोर विरोधी हैं.

जिहाद (Jihad)

इस्लाम में जिहाद के दो स्तर बताए गये हैं. जिहाद ए अकबर तथा जिहाद ए असगर. जिहाद ए अकबर का अर्थ है अल्लाह के लिए युद्ध करना. इस्लाम को नष्ट करने वालों, इस्लाम के प्रचार में बाधा उत्पन्न करने वालों के प्रति जिहाद करना चाहिए. अत्याचार और पाप के विरुद्ध बल प्रयोग करना ही जिहाद हैं. जिहाद ए असगर वह युद्ध हैं जो मनुष्य स्वयं के विचारों से लड़ता हैं.

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