Essay on Jainism in Hindi | जैन धर्म पर निबंध

Essay on Jainism in Hindi जैन धर्म पर निबंध: विश्व के प्रमुख धर्मों में जैन धर्म को भी गिना जाता हैं, जिनका जन्म भारत में हुआ तथा अधिकतर अनुयायी भी भारत में ही रहते हैं. सत्य, अहिंसा, मानवता की बुनियाद पर खड़े जैन धर्म का यह निबंध (Essay on Jainism in Hindi) बच्चों  के लिए यहाँ प्रस्तुत किया गया हैं महावीर स्वामी द्वारा स्थापित धर्म के मुख्य सिद्धांत शिक्षाएं क्या हैं विस्तार से जानेगे.

Essay on Jainism in Hindi जैन धर्म पर निबंध

Essay on Jainism in Hindi जैन धर्म पर निबंध

jain dharma & jain religion history in hindi language जैन धर्म के संस्थापक एवं कैवल्य ज्ञान प्राप्त महात्मा ओं को तीर्थकर माना गया हैं. जैन धर्म में २४ तीर्थकर हैं, जिनमें ऋषभदेव (प्रथम तीर्थकर व जैन धर्म के संस्थापक) पार्श्वनाथ व महावीर स्वामी मुख्य हैं.
पार्श्वनाथ: जैन धर्म के 23 वें तीर्थकर, जन्म 8 वीं सदी ई पू में, पिता अश्वसेन (काशी नरेश), माता- वामा, पत्नी प्रभावती (कुश स्थल देश की राजकुमारी) 30 वर्ष की आयु में गृह स्थान,सम्मेद शिखर पर्वत पर ज्ञान प्राप्ति,पार्श्वनाथ का प्रतीक चिह्न सर्प हैं.

चार उपदेश: अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह. पार्श्वनाथ के  अनुयायियों को निग्रंथ कहा जाता था, इन्होने नारियों को अपने धर्म में प्रवेश दिया. पिता: सिद्धार्थ व माता त्रिशला थी. बचपन   का नाम- वर्द्धमान, पत्नी-यशोदा, पुत्री-अनोज्जा तथा   दामाद-जामालि.

वर्द्धमान ने माता-पिता की मृत्यु के पश्चात 30 वर्ष की आयु में अपने बड़े भाई नन्दीवर्धन से अनुमति लेकर सन्यास लिया. 12 वर्षों की कठोर तपस्या तथा साधना के पश्चात जम्भिक ग्राम के समीप ऋजुपालिका नदी के तट पर साल वृक्ष के नीचे कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई, तब वे केवलिन जिन और निग्रंथ कहलाये और जैन धर्म कहलाया.

जैन धर्म के प्रचार हेतु महावीर स्वामी ने पावापुरी में जैन संघ की स्थापना की. महावीर के प्रथम शिष्य उनके दामाद जामालि बने, प्रथम जैन भिक्षुणी नरेश दधिवाहन की पुत्री चम्पावती थी. 30 वर्षों तक धर्म का प्रचार करने के बाद 72 वर्ष की आयु में राज गृह के समीप पावापुरी में राजा हस्तिपाल के सानिध्य में शरीर त्याग दिया, उनकी मृत्यु को जैन मत में निर्वाण कहा गया हैं. महावीर की मृत्यु के बाद केवल एक गणधर सुधर्मन जीवित बचा जो जैन संघ का उनके बाद प्रथम अध्यक्ष बना.

जैन धर्म के सिद्धांत व शिक्षाएँ (jainism major beliefs)

  • अनीश्वरवादी– जैन अनुयायी ईश्वर को नहीं मानते, उनके अनुसार सृष्टि अनादी और अनन्त हैं.
  • महावीर का आत्मा के पुनर्जन्म सिद्धांत तथा कर्म के सिद्धांत में विश्वास था.
  • त्रिरत्न- आत्मा को कर्म के बंधन से मुक्त करने के लिए त्रिरत्न आवश्यक हैं जो निम्न हैं. सम्यक ज्ञान, सम्यक दर्शन और सम्यक चरित्र.

पंच महाव्रत

  • अहिंसा– मन, कर्म तथा वचन से किसी के प्रति ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए, जिससे उसे दुःख व कष्ट हो.
  • सत्य– मनुष्य को सदैव मधुरता के साथ सत्य बोलना चाहिए.
  • अस्तेय– चोरी नहीं करना
  • ब्रह्मचर्य– भोग वासना से दूर रहकर संयमपूर्ण जीवन व्यतीत करना
  • अपरिग्रह– संग्रह नहीं करना

नोट: प्रथम चार महाव्रतों  का प्रतिपादन 23  वें तिर्थकर पार्श्वनाथ  व अंतिम महाव्रत  का प्रतिपादन महावीर  भगवान ने किया. महावीर वेदों  के प्रभुत्व  को स्वीकार नहीं  करते वे व्रत उपवास व तपस्या   पर अत्यधिक बल देते थे.

स्यादवाद का सिद्धांत:   स्यादवाद ज्ञान की सापेक्षता का  सिद्धांत हैं. इस मत के अनुसार किसी वस्तु के अनेक पहलू होते हैं तथा व्यक्ति अपनी  सिमित बुद्धि द्वारा केवल कुछ  ही पहलुओं को जान सकता हैं. अतः सभी विचार अशतः सत्य होते हैं. पूर्ण ज्ञान तो कैव्लिन के द्वारा ही संभव हैं. भगवान महावीर का प्रतीक चिह्न सिंह हैं, उन्होंने अपने उपदेश प्राकृत भाषा में दिए जो जन सामान्य की भाषा थी.

सम्प्रदाय का विभाजन: महावीर स्वामी की मृत्यु के पश्चात लगभग दो शताब्दियों तक जैन अनुयायी संगठित रहे किन्तु मौर्य काल में जैन धर्म दो सम्प्रदायों में विभक्त हो गया. दिगम्बर संप्रदाय- इस संप्रदाय के साधुओं के लिए सम्पति के पूर्ण बहिष्कार का प्रावधान हैं. इस संप्रदाय के साधु दिशाओं को ही वस्त्र समझकर नंगे रहते हैं. भद्रबाहु ने इनका नेतृत्व किया. श्वेताम्बर संप्रदाय- इस संप्रदाय के साधू साध्वियां सफ़ेद वस्त्र धारण करते हैं जिन्हें वे अहिंसा एवं शांति का प्रतीक समझते हैं. स्थूलबाहु ने इनका नेतृत्व किया.

जैन सभाएं: प्रथम जैन सभा चन्द्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में पाटलीपुत्र में भद्रबाहु एवं स्म्मुति विजय के निरिक्षण में हुई. इसमें जैन धर्म के महत्वपूर्ण 12 अंगों का प्रणयन व धर्म का श्वेताम्बर व दिगम्बर में विभाजन.

द्वितीय जैन सभा– यह सभा छठी शताब्दी में गुजरात के वल्लभी नामक स्थान पर देवधगणी की अध्यक्षता में हुई. इनमें जैन धर्मग्रंथों को अंतिम रूप में संकलित कर लिपिबद्ध किया गया. बीच में एक जैन सभा चौथी शताब्दी में निम्न स्थानों पर हुई थी. मथुरा अध्यक्ष एवं अध्यक्ष वल्लभी. महावीर स्वामी के 11 शिष्य थे जो गणधर या गंधर्व कहलाये थे. जैन धार्मिक ग्रंथ आगम कहलाते हैं. मौर्य सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य आचार्य भद्रबाहु से जैन धर्म की दीक्षा ग्रहण कर उनके साथ दक्षिण भारत में चले गये थे.

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