न्यायिक पुनरावलोकन पर निबंध | Essay On Judicial Review In Hindi

प्रिय साथियो आपका स्वागत है Essay On Judicial Review In Hindi में  हम आपके साथ न्यायिक पुनरावलोकन पर निबंध साझा कर रहे हैं. कक्षा 1,2,3,4,5, 6,7,8,9,10 तक के बच्चों को न्यायिक पुनरावलोकन अर्थ परिभाषा महत्व पर सरल भाषा में लिखे गये  हिन्दी निबंध (पुस्तकालय एस्से)  को परीक्षा के लिहाज से याद कर लिख सकते हैं.

Essay On Judicial Review In Hindi

Essay On Judicial Review In Hindi

न्यायिक पुनरावलोकन पर निबंध Essay On Judicial Review In Hindi

न्यायिक पुनरवलोकन का अर्थ हैं कि सर्वोच्च न्यायालय किसी भी कानून की संवैधानिकता की जांच कर सकता हैं और यदि वह संविधान के प्रावधानों के विपरीत हो तो न्यायालय उसे गैर सांविधानिक घोषित कर सकता हैं. संविधान में कहीं भी न्यायिक पुनरवलोकन शब्द का प्रयोग नहीं किया गया हैं लेकिन संविधान मुख्यतः ऐसी दो विधियों का उल्लेख करता हैं. जहाँ सर्वोच्च न्यायालय इस शक्ति का प्रयोग कर सकता हैं.

मूल अधिकारों की रक्षा करना– मूल अधिकारों के विपरीत होने पर सर्वोच्च न्यायालय किसी भी कानून को निरस्त कर सकता हैं.
केंद्र राज्य या राज्यों के परस्पर विवाद के निपटारे के लिए- संघीय सम्बधों के मामले में भी सर्वोच्च न्यायालय अपनी न्यायिक पुनरवलोकन की शक्ति का प्रयोग कर सकता हैं.

इसके अतिरिक्त संविधान यदि किसी बात पर मौन है या किसी शब्द या अनुच्छेद के विषय में अस्पष्टता है तो वह संविधान का अर्थों को स्पष्टीकरण हेतु इस शक्ति का प्रयोग कर सकता हैं.

संविधान के अनुच्छेद 13 के तहत सर्वोच्च न्यायालय किसी कानून को गैर संवैधानिक घोषित कर उसे लागू होने से रोक सकता हैं. न्यायिक पुनरवलोकन की शक्ति राज्यों की विधायिका द्वारा बनाए कानूनों पर भी लागू होती हैं. न्यायिक पुनरवलोकन की शक्ति द्वारा न्यायपालिका विधायिका द्वारा पारित कानूनों की और संविधान की व्याख्या कर सकती हैं. इसके द्वारा न्यायपालिका प्रभावी ढंग से संविधान और नागरिकों के मूल अधिकारों की रक्षा करती हैं.

न्यायिक पुनरवलोकन की शक्ति का प्रयोग– जनहित याचिकाओं और न्यायिक सक्रियता से न्यायपालिका की न्यायिक पुनरवलोकन की शक्ति में विस्तार हुआ हैं.

मूल अधिकार के क्षेत्र में न्यायिक पुनरवलोकन की शक्ति का विस्तार– उदहारण के लिए बंधुआ मजदूर, बाल श्रमिक अपने शोषण के अधिकार के उल्लंघन की याचिका स्वयं न्यायपालिका में दायर करने में सक्षम नहीं थे. परिणामतः न्यायालय द्वारा पहले इन अधिकारों की रक्षा करना सम्भव नहीं हो पा रहा था.

लेकिन न्यायिक सक्रियता व जनहित याचिकाओं के माध्यम से न्यायालय में ऐसे केस दूसरे लोगों स्वयंसेवी संस्थाओं ने उठाए या स्वयं न्यायालय ने अखबार में छपी घटनाओं के आधार पर स्वयं प्रसंज्ञान लेते हुए ऐसे मुद्दों पर विचार किया. इस प्रवृत्ति ने गरीब और पिछड़े वर्ग के लोगों के अधिकारों को अर्थपूर्ण बना दिया.

कार्यपालिका के क्रत्यों के विरुद्ध जांच करना– न्यायपालिका ने कार्यपालिका की राजनैतिक व्यवहार बर्ताव के प्रति संविधान के उल्लंघन की प्रवृत्ति पर न्यायिक पुनरवलोकन की शक्ति द्वारा अंकुश लगाया हैं. इसी कारण जो विषय पहले न्यायिक पुनरावलोकन के दायरे में ले लिया गया हैं जैसे राष्ट्रपति और राज्यपाल की शक्तियाँ.

अनेक मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने न्याय की स्थापना के लिए कार्यपालिका की संस्थाओं को निर्देश दिए हैं. जैसे हवाला मामले, पेट्रोल पम्पों के अवैध आवंटन जैसे अनेक मामलों में न्यायालय ने सीबीआई को निर्देश दिया कि वह राजनेताओं और नौकरशाहों के विरुद्ध जांच करे.

संविधान के मूल ढाँचे के सिद्धांत का प्रतिपादन– संविधान लागू होने के तुरंत बाद सम्पति के अधिकार पर रोक लगाने की संसद की शक्ति पर संसद और न्यायपालिका में विवाद खड़ा हो गया. संसद सम्पति रखने के अधिकार पर कुछ प्रतिबन्ध लगाना चाहती थी जिससे भूमि सुधारों को लागू किया जा सके.

लेकिन न्यायालय ने न्यायिक पुनरवलोकन की शक्ति के तहत यह निर्णय दिया कि संसद मौलिक अधिकारों को सिमित नहीं कर सकती. संसद ने तब संविधान संशोधन कर ऐसा करने का प्रयास किया. लेकिन न्यायालय ने 1967 में गोलकनाथ विवाद में यह निर्णय दिया कि संविधान के संशोधन के द्वारा भी मौलिक अधिकारों को सिमित नहीं किया जा सकता.

फलतः संसद और न्यायपालिका के बीच यह मुद्दा केंद्र में आया कि संसद द्वारा संविधान की शक्ति का दायरा क्या हैं. इस मुद्दे का निपटारा सन 1973 में केशवानंद भारती के विवाद में सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय से हुआ कि संविधान का एक मूल ढांचा हैं और संसद उस मूल ढाँचे में संशोधन नहीं कर सकती.

संविधान संशोधन द्वारा भी इस मूल ढाँचे को बदला नहीं जा सकता तथा संविधान का मूल ढांचा क्या हैं, यह निर्णय करने का अधिकार न्यायालय ने अपने पास रखा हैं. इस प्रकार संविधान के मूल ढाँचे के सिद्धांत का प्रतिपादन कर न्यायपालिका ने अपनी न्यायिक पुनरवलोकन की शक्ति को व्यापक कर दिया हैं.

साथ ही इस निर्णय में न्यायपालिका ने सम्पति के अधिकार को संविधान का मूल ढांचा नहीं माना है तथा संसद को उसमें संशोधन के अधिकार को स्वीकार कर लिया हैं.

न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति का महत्व

न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति के महत्व को निम्न प्रकार स्पष्ट किया गया हैं.

  • लिखित संविधान की व्याख्या के लिए आवश्यक– भारत का संविधान एक लिखित संविधान हैं, लिखित संविधान की शब्दावली कहीं कहीं अस्पष्ट और उलझी हो सकती हैं. उसकी व्याख्या के लिए न्यायालय के पास उसकी व्याख्या की शक्ति आवश्यक हैं.
  • संघात्मक संविधान– भारत का संविधान एक संघीय संविधान हैं जिसमें केंद्र और राज्यों को संविधान द्वारा विभाजित किया गया हैं. लेकिन यदि केंद्र और राज्य अपने क्षेत्रों विषयों की सीमाओं का उल्लंघन करें तो कार्य संचालन मुश्किल हो जाएगा,
  • इसलिए केंद्र और राज्यों तथा राज्यों के बीच समय समय पर उठने वाले विवादों का समाधान न्यायपालिका ही कर सकती हैं. इसलिए ऐसे विवादों के समाधान की दृष्टि से न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति अत्यंत उपयोगी हैं.
  • संविधान व मूल अधिकारों की रक्षा– न्यायिक पुनरवलोकन की शक्ति के द्वारा सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान की रक्षा का महत्वपूर्ण कार्य किया हैं. इसी कार्य के तहत उसने संविधान के मूल ढांचे के सिद्धांत का प्रतिपादन किया हैं. 
  • साथ ही समय समय पर नागरिकों के मूल अधिकारों की रक्षा की हैं तथा ऐसे कानूनों को असंवैधानिक घोषित किया है जो मूल अधिकारों के विरुद्ध हैं यही नहीं, न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति के अंतर्गत ही उसने नागरिकों के मूल अधिकारों को अर्थपूर्ण भी बनाया हैं.

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट हैं कि भारत में न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हैं.  

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