लाल बहादुर शास्त्री पर निबंध | Essay on Lal Bahadur Shastri

Essay on Lal Bahadur Shastri “मरो नहीं, मारो” एवं ”जय जवान जय किसान” जैसे उद्घोषक श्री लाल बहादुर शास्त्री जिनका जन्म 2 अक्टूबर (गांधी जयंती) के दिन उत्तरप्रदेश के मुगल सराय कस्बे के प्रारम्भिक शाला के प्राध्यापक मुंशी शारदा प्रसाद श्रीवास्तव के घर हुआ था. इनकी माता जी का नाम रामदुलारी देवी था जो मिर्जापुर के हजारीलाल की बेटी थी. माँ के साथ इन्होने अपना आरम्भिक जीवन मामा के घर ही बिताया यही के प्राथमिक शाला में इनकी पढाई हुई. (लाल बहादुर शास्त्री पर निबंध)

Essay on Lal Bahadur Shastri In Hindi || लाल बहादुर शास्त्री पर निबंध

Essay on Lal Bahadur Shastri
Essay on Lal Bahadur Shastri

आरम्भिक जीवन

लाल बहादुर शास्त्री जी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि ”वे एक सामान्य परिवार में पैदा हुए थे. सामन्य परिवार में ही उनकी परवरिश हुई तथा जब वे देश के सबसे महत्वपूर्ण पद प्रधानमन्त्री तक पहुचे. विनम्रता सादगी और सरलता उनके व्यक्तित्व में एक विशेष प्रकार का आकर्षण पैदा करती थी.

इस द्रष्टि से शास्त्री जी का व्यक्तित्व राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के बहुत करीब था. और कहना न होगा कि बापू (महात्मा गाँधी) से ही प्रभावित होकर ही उन्होंने सनः 1921 में अपनी पढाई छोड़ी थी. शास्त्री पर बहुत से भारतीय चिंतको भगवानदास और बापू का कुछ ऐसा प्रभाव रहा कि वह जीवन भर उनके आदर्शो पर चलते रहे और औरो को भी प्रेरित करते रहे. शास्त्री जी के सम्बन्ध में मुझे बाइबिल की वह पंक्ति बिलकुल सही जान पड़ती है. कि विनम्र ही पृथ्वी के वारिश होंगे.

स्वतंत्रता आंदोलन 

शास्त्री जी ने हमारे देश के स्वतंत्रता संग्राम में जब प्रवेश किया था. जब वे एक स्कुल में एक विद्यार्थी थे. उस समय उनकी उम्र 17 वर्ष की थी. गांधीजी के आवहान पर वे स्कुल छोड़कर बाहर आ गये थे. उसके बाद काशी विद्यापीठ में इन्होने अपनी शिक्षा पूरी की थी. उनका मन हमेशा देश की आजादी और सामजिक कार्यो की ओर लगा रहा. परिणाम ये हुआ कि ये सन 1926 में ”लोक सेवा मंडल” में शामिल हो गये. जिसके ये जीवनभर सदस्य रहे

इस संगठन में शामिल होने के बाद शास्त्री जी ने गांधीजी के विचारों के अनुरूप अछूतोद्धार के काम में अपने आप को लगाया. और यही से ही लाल बहादुर शास्त्री जी के जीवन का एक नया अध्याय शुरू हुआ. सन 1930 में नमक सत्याग्रह (नमक कानून तोड़ो आंदोलन) शुरू हुआ, तो शास्त्री जी ने उसमे भाग लिया जिसके परिणामस्वरूप उन्हें जेल भी जाना पड़ा. यहाँ से शास्त्री जी के जेल की जो यात्रा शुरू हुई तो सन 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन तक निरंतर रूप से चलती रही.

इन 12 वर्षो के दौरान वे 7 बार जेल गये इसी से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि शास्त्री जी के अंदर देश की आजादी को लेकर कितनी ललक थी. शास्त्री जी ने दूसरी जेल यात्रा 1932 के किसान आंदोलन में भाग लेने के लिए करनी पड़ी. सन 1942 की 3 साल की जेल यात्रा की थी. जो उनके जीवन की सबसे बड़ी जेल यात्रा थी.

राजनितिक जीवन

इस दौरान जहाँ एक ओर गांधी जी द्वारा बताएं गये रचनात्मक कार्यो में लगे हुए थे. दूसरी ओर पदाधिकारी के रूप में जनसेवा के कार्य में लगे रहे. इसके बाद छ वर्षो तक वे इलाहबाद की नगरपालिका से किसी न किसी रूप से जुड़े रहे. लोकतंत्र की इस आधारभूत इकाई में कार्य करने के कारण वे देश की छोटी छोटी समस्याओं और उनके निवारण की व्यावहारिक प्रक्रिया से अच्छी तरह परिचित हो गये थे. कार्य के प्रति निष्ठा और अदम्य क्षमता के कारण 1937 में लाल बहादुर शास्त्री सयुक्त प्रांतीय व्यवस्थापिका सभा के लिए निर्वाचित हुए.

सही मायनों में यही से उनके संसदीय जीवन की शुरुआत हुई, जिसका समापन देश के प्रधानमन्त्री पद तक पहुचने में समाप्त हुआ.

जब शास्त्री जी 1964-65 में भारत के राष्ट्रपति बने उस समय देश बड़े संकट के दौर से गुजर रहा था. कुछ ही समय पूर्व तत्कालीन प्रधानमन्त्री पंडित जवाहरलाल नेहरु के देहांत के बाद जहाँ एक तरफ अनुभवी नेता की कमी खल रही थी, जो देश को आगे की ओर ले जाए दूसरी तरह भारत में राजनितिक अस्थिरता के हालात समझकर पाकिस्तान ने 1965 में सैन्य आक्रमण कर दिया था. मगर एक आदर्श राजनेता और राष्ट्रनायक की भूमिका निभाते हुए शास्त्री जी ने सुझबुझ से पाकिस्तान को चारो खाने चित कर दिया.

1965 में ताशकंद नामक स्थान पर भारत पाकिस्तान के राष्ट्रनेता (अयूब खान और शास्त्री जी ) युद्ध विराम के लिया समझौता हुआ. इस समझौते के कुछ ही समय बात ताशकंद में ही उनका देहांत हो गया था. इस तरह एक सच्चे राष्ट्रभक्त और आज की युवा पीढ़ी के आदर्श लोकनायक की स्देहस्पद हालात में हुई मृत्यु के बारे में कई बार सवाल उठे मगर अभी तक यह दुर्घटना/साजिश एक राज ही बनी हुई है.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *