लोकसभा पर निबंध | Essay on Lok Sabha in Hindi

लोकसभा पर निबंध | Essay on Lok Sabha in Hindi: भारत की संसद के दो सदनों में लोकसभा को लोकप्रिय सदन के रूप में भी जाना जाता हैं. Essay on Lok Sabha in Hindi में हम भारतीय लोक सभा निबंध जानेगे. 545 सदस्यों वाले इस सदन की अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष द्वारा की जाती हैं. सदन के सदस्यों का कार्यकाल 5 वर्ष का होता हैं. चलिए आज हम Essay on Lok Sabha in Hindi को जानेगे.

लोकसभा पर निबंध | Essay on Lok Sabha in Hindi

लोकसभा क्या है हिंदी निबंध | Essays on Lok Sabha in Hindi Language: लोकसभा का गठन (Composition Of Lok Sabha): लोकसभा भारतीय संसद का निम्न सदन अथवा लोकप्रिय सदन कहलाता हैं. जिसका गठन संविधान के अनुच्छेद 81 के अनुसार होता हैं. प्रारम्भ में लोकसभा की कुल सदस्य संख्या 500 निर्धारित की गई थी.

1956 में राज्यों के पुनर्गठन के पश्चात इसके सदस्यों की संख्या 520 एवं बाद में 525 निर्धारित की गई. 31 वें संविधान संशोधन 1974 द्वारा लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या 552 हो सकती हैं. जिनमें से

  1. 530 सदस्य विभिन्न राज्यों से निर्वाचित होंगे.
  2. 20 सदस्य संघ राज्य क्षेत्रों से निर्वाचित होंगे. इसके अतिरिक्त संविधान के अनुच्छेद 331 के अनुसार यदि राष्ट्रपति की यह राय है कि लोकसभा में आंग्ल भारतीय समुदाय का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं हैं. तब वह लोकसभा में उस समुदाय में उस समुदाय के दो सदस्य नाम निर्देशित कर सकेगा.

Short Essay on Lok Sabha in Hindi

वास्तव में वर्तमान में लोकसभा की कुल सदस्य संख्या 545 हैं, जिनमें से 530 विभिन्न राज्यों से एवं 13 सदस्य संघ राज्य क्षेत्रों से निर्वाचित हैं, जबकि दो सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत होता हैं. विभिन्न राज्यों को लोकसभा में स्थानों का आवंटन जनसंख्या के आधार पर होता हैं.

यही कारण है कि अकेले उत्तरप्रदेश से लोकसभा के 80 सदस्य व महाराष्ट्र से 48 सदस्य निर्वाचित होते हैं. जबकि राजस्थान से लोकसभा के 25 सदस्य चुने जाते हैं. संविधान के अनुच्छेद 82 में परिसीमन आयोग के गठन का प्रावधान है जिसके प्रत्येक जनगणना की समाप्ति पर राज्यों को लोकसभा में स्थानों के आवंटन एवं प्रत्येक राज्य के प्रादेशिक निर्वाचक क्षेत्रों का पुनः निर्धारण किया जाएगा.

जनसंख्या नियंत्रण के उद्देश्य को पूरा करने के लिए 84 वें संविधान संशोधन अधिनियम 2001 द्वारा यह प्रावधान किया गया कि लोकसभा की कुल सदस्य संख्या 2026 तक यथावत बनी रहेगी.

लोकसभा सदस्यों का निर्वाचन (Election Of Members Of Lok Sabha)

औपनिवेशिक शासन के दौरान व्यवस्थापिका के गठन में अनेक दोष विद्यमान थे. उन्होंने भारतीय शासन प्रणाली में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के नाम पर पृथक साम्प्रदायिक निर्वाचन प्रणाली आदि के रूप में ऐसे तत्व शामिल कर दिए गये.

जिन्होंने हमारे राजनीतिक जीवन को छिन्न भिन्न कर दिया था. संविधान सभा को इन समस्याओं के अंत के लिए काफी झुकना पड़ा था. अधिकांश अल्पसंख्यक नेता अपने समुदायों के लिए स्वतंत्र भारत में भी पृथक निर्वाचन प्रणाली को बनाए रखना चाहते थे.

सरदार पटेल ने कठिन परिश्रम कर अल्पसंख्यक प्रतिनिधियों को साम्प्रदायिक निर्वाचन प्रणाली को समाप्त करने के लिए राजी किया. अतः स्वतंत्र भारत में लोकसभा के सदस्यों का निर्वाचन प्रत्यक्ष रूप से वयस्क मताधिकार द्वारा होता हैं. अनुच्छेद 326 के अनुसार 18 वर्ष या अधिक उम्रः के वयस्क नागरिक जिनका मतदाता सूची में पंजीकरण हैं. वे मतदान द्वारा लोकसभा सदस्यों का निर्वाचन करेगे.

विभिन्न राजनीतिक दल प्रत्येक लोकसभा क्षेत्र से अपने प्रत्याशियों को खड़ा करते हैं. साथ ही निर्दलीय प्रत्याशी भी चुनाव में उम्मीदवार हो सकते हैं. भारत के निर्वाचन आयोग द्वारा निर्धारित तिथि को उस लोकसभा क्षेत्र में पंजीकृत मतदाता अपने मत का प्रयोग करते हैं. तथा जिस प्रत्याशी को सबसे अधिक मत प्राप्त होते हैं. वह निर्वाचित घोषित कर किया जाता हैं.

इस प्रकार इसमें कोई निश्चित मत प्राप्त करना आवश्यक नहीं हैं. उदाहरणार्थ यदि किसी चुनाव क्षेत्र में 5 या अधिक प्रत्याशी है एवं सर्वाधिक मत प्राप्त करने वाले को 25 प्रतिशत मत प्राप्त हुए है, तब वह विजयी घोषित किया जाएगा. भले ही उसके विरोध में कुल 75 प्रतिशत मत डाले गये हो.

यही कारण है कि विभिन्न राजनीतिक दलों को प्राप्त मत एवं स्थानों में कोई संगति नहीं होती हैं. 1984 में 553 स्थानों पर हुए लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को 400 से अधिक स्थान अर्थात 75 प्रतिशत से अधिक स्थान प्राप्त हुए जबकि उसे कुल मत 50 प्रतिशत भी प्राप्त नहीं हुए थे.

लोकसभा में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लिए स्थानों के आरक्षण का प्रावधान किया गया हैं. वर्तमान में अनुसूचित जाति के लिए कुल 84 एवं अनुसूचित जनजाति के लिए 47 स्थान आरक्षित हैं.

लोकसभा का कार्यकाल (Tenure Of Lok Sabha)

संविधान के अनुच्छेद 83 के अनुसार लोकसभा का कार्यकाल अपनी प्रथम बैठक से पांच वर्ष होगा. पांच वर्ष की समाप्ति पर लोकसभा स्वतः ही भंग हो जाती हैं. लेकिन अनुच्छेद 85 के अनुसार राष्ट्रपति कभी भी लोकसभा को भंग कर सकते हैं. राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की सलाह पर ही लोकसभा को भंग करता हैं.

राष्ट्रीय आपातकाल की स्थिति में लोकसभा की अवधि को एक बार में एक वर्ष तक बढाया जा सकता हैं. 1976-77 में लोकसभा का कार्यकाल बढाया गया था. भारत में पहली लोकसभा का गठन अप्रैल 1952 में हुआ था. जबकि वर्तमान में 16 वीं लोकसभा कार्यरत है, जिसका गठन मई 2014 में हुआ हैं.

लोकसभा का अध्यक्ष व उपाध्यक्ष (Loksabha Speaker & Deputy Speaker)

संविधान के अनुच्छेद 93 के अनुसार लोकसभा यथाशीघ्र अपने दो सदस्यों को अध्यक्ष या उपाध्यक्ष के रूप में चुनेगी. राजनि-तिक रूप से यह निश्चित हैं. कि अध्यक्ष उसी दल का कोई सदस्य निर्वाचित होता हैं, जिस दल को लोकसभा में बहुमत प्राप्त होता हैं.

उपाध्यक्ष के रूप में यह परम्परा स्थापित हुई हैं. कि वह विपक्षी पार्टी का होगा. यदपि ऐसी कोई संवैधानिक अथवा राजनीतिक बाध्यता नहीं हैं. अध्यक्ष अपना त्यागपत्र उपाध्यक्ष को तथा उपाध्यक्ष अपना त्याग पत्र अध्यक्ष को सौप सकता हैं. लोकसभा के तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत से पारित संकल्प द्वारा अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष को अपने पद से हटा सकते हैं, लेकिन ऐसा प्रस्ताव लाने से कम से कम 14 दिन पूर्व सम्बन्धित को सूचित करना आवश्यक हैं.

अध्यक्ष सदन की कार्यवाही का संचालन करता हैं. वह सदस्यों को बोलने का समय देता हैं. कोई भी विषय जिसे सदन में मतदान के लिए रखा गया हैं, उस पर मतदान करवाता हैं. प्रथमतः वह अपने मत का प्रयोग नहीं करता लेकिन पक्ष एवं विपक्ष में बराबर मत आने पर वह अपना निर्णायक मत देता हैं.

वह सत्र को स्थगित करने का अधिकार रखता है अर्थात स्पीकर सदन की बैठक को कुछ समय अथवा कुछ दिनों के लिए स्थगित कर सकता हैं, हालांकि उसके सत्रावसान का अधिकार राष्ट्रपति को प्राप्त होता हैं. अध्यक्ष सदन में दल बदल के आधार पर किसी सदस्य की निर्योग्यता के बारे में भी फैसला करता हैं.

संविधान के अनुच्छेद 110 के तहत अध्यक्ष को यह भी अधिकार प्राप्त है कि यदि यह प्रश्न उठाता है कि कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं तो उस पर लोकसभा अध्यक्ष का फैसला अंतिम माना जाएगा. स्वतंत्र भारत की पहली लोकसभा के अध्यक्ष गणेश वासुदेव मावलंकर एवं उपाध्यक्ष अनन्त शयनम अयंगर थे.

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