महाभारत पर निबंध – Essay On Mahabharat In Hindi

महाभारत पर निबंध – Essay On Mahabharat In Hindi: महाभारत ४ से ५ हजार वर्ष पुरानी हिन्दू काव्य रचना हैं जो इतिहास ग्रंथों के स्मृति वर्ग में गिनी जाती हैं. यह विश्व का सबसे बड़ा साहित्यिक महाकाव्य भी माना गया हैं जिसमें पवित्र गीता भी सन्निहित हैं. इसमें कुल एक लाख दस हजार संस्कृत श्लोक मूल रूप से माने गये हैं. महाभारत का आदि एवं मूल रचयिता वेदव्यास को माना गया हैं जिन्होंने ३१०० ईसा पूर्व इसकी रचना की थी, इसके बाद सूत द्वारा रचित महाभारत २००० ईसा पूर्व की है आधुनिक काल में लिखित महाभारत का रचनाकाल १२००-६०० ईसा पूर्व माना जाता हैं. आज के महाभारत निबंध में हम महाभारत की कथा कहानी, इतिहास, महत्व, रचनाकार, काल, महत्व आदि के बारे में Mahabharat Essay In Hindi में यहाँ जानेगे.

Essay On Mahabharat In Hindi – महाभारत पर निबंध 

Essay On Mahabharat In Hindi

साहित्यिक विरासत का अर्थ– भारतीय साहित्यिक परम्परा में ऐसे मनीषी हुए हैं. जिन्होंने अपनी रचनाओं को अपने परवर्ती साहित्य कारों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना दिया हैं. साहित्यिक विरासत का अर्थ साहित्यकार के द्वारा रचित ग्रंथ, उनकी भाषा शैली, उसका जीवन दर्शन, उसके द्वारा प्रतिपादन आदर्श आदि.

महाभारत का निर्माण– महाभारत नामक महाकाव्य के रचयिता वेदव्यास थे. वेदव्यास कृष्ण द्वैपायन के नाम से भी जाने जाते हैं, महाभारत के विकास के सम्बन्ध में तीन अवस्थाओं का उल्लेख मिलता हैं. ये तीन अवस्थाएं हैं जय, भारत, महाभारत. वर्तमान में महाभारत में एक लाख श्लोक हैं इसलिए इस ग्रंथ को शतसाहस्त्री संहिता के नाम से पुकारा जाता हैं.

महाभारत की साहित्यिक विरासत (Short Essay On Mahabharat In Hindi Language)

महाभारत महाकाव्य सांस्कृतिक एवं साहित्यिक दोनों दृष्टियों से अपना विशिष्ट महत्व रखता हैं. महाभारत में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का अत्यधिक सुंदर वर्णन होता हैं.

भारतीय ज्ञान का विश्वकोष महाभारत – वर्तमान रूप में महाभारत धार्मिक एवं लौकिक भारतीय ज्ञान का विश्वकोश हैं. इस ग्रन्थ की समग्रता के सम्बन्ध में कहा गया हैं- इस में जो कुछ हैं वह अन्यत्र भी हैं, परन्तु जो कुछ इसमें नहीं हैं वह अन्यत्र कही भी नहीं हैं. इसे पंचम वेद भी कहा जाता हैं.

आदि पर्व में महाभारत को केवल इतिहास का ही नहीं बल्कि धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, कामशास्त्र, नीतिशास्त्र तथा मोक्षशास्त्र भी कहा गया हैं. कौरवों और पांडवों के बीच के युद्ध के मूल कथानक के अतिरिक्त इस ग्रंथ में अनेक प्राचीन आख्यान जुड़े हुए हैं. इसमें शंकुतला उपाख्यान, सावित्री उपाख्यान व नलोपाख्यान, मत्स्योपाख्यान, रामोपाख्यान, शिव उपाख्यान आदि प्रमुख हैं.

महाभारत एक श्रेष्ठ धर्मशास्त्र भी हैं, जिसमें पारिवारिक तथा सामाजिक जीवन के नियमों तथा धर्म की विस्तृत व्याख्या दी गई हैं. शांति पर्व में राजधर्म, आपद धर्म तथा मोक्ष धर्म का विवेचन हैं. इसमें श्रीमद्भागवतगीता, सनत्सुजात, अनुगीता, पराशरगीता, मोक्ष धर्म आदि के महत्वपूर्ण अंश संकलित हैं. महाभारत नीतिशास्त्र का भी महत्वपूर्ण ग्रंथ हैं. संजयनीति, भीष्मनीति, विदुरनीति आदि का महाभारत में समावेश हैं.

महाभारत का नीतिबोध– महाभारत में जगह जगह नीति का उपदेश हैं. भीष्म का राजनीति तथा धर्म के विभिन्न पक्षों पर शान्ति पर्व में लम्बा प्रवचन हैं. सभापर्व में नारद का राजनीति विषय पर प्रवचन हैं. विदुर नीति महाभारत का महत्वपूर्ण अंग हैं.

जीवन के मूल्यों के सम्बन्ध में महाभारत का संदेश– महाभारत में संसारिक सुख तथा मोक्ष के आदर्शों के बिच समन्वय किया गया. फल स्वरूप धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष चार पुरुषार्थों की मानव जीवन के ध्येय के रूप में प्रतिष्ठा हुई. महाभारत का रचयिता अर्थ तथा काम की स्वाभाविक इच्छाओं को तब तक बुरा नहीं मानता जब तक वे धर्म की मर्यादा का उल्लंघन न करें. इस प्रकार वह धर्म की सर्वोच्चता का आदर्श प्रस्तुत करता हैं.

महाभारत में जीवन विवेक का संदेश– महाभारत में धर्म सम्बन्धी चेतना बड़ी तीव्र हैं. शांति पर्व में मोक्ष, धर्म, पर्व तथा वन पर्व में जगह जगह धर्म तत्व का विवेचन मिलता हैं. प्रवृत्ति, निवृत्ति, कर्म और सन्यास के विचारों का सुंदर ढंग से प्रतिपादन किया हैं. महाभारत में शांति पर्व तथा गीता में जीवन विवेक का प्रतिपादन हैं.

महाभारत में वर्णित समाज– महाभारत में वर्णित समाज अत्यंत जटिल एवं संघर्षपूर्ण हैं. इसमें दो जीवन आदर्शों का संघर्ष दिखाया गया हैं. युधिष्ठर तथा दुर्योधन इन दो भिन्न आदर्शों का प्रतिनिधित्व करते हैं.

महाभारत का साहित्यिक महत्व- महाभारत का पर्याय साहित्यिक महत्व हैं. इस ग्रंथ में वीररस की प्रधानता हैं, परन्तु कहीं कहीं श्रंगार रस और शांत रस भी मिलते हैं. प्रकृति चित्रण गौण हैं. केवल द्रोणाचार्य पर्व में चन्द्रोदय का वर्णन हुआ हैं. उपमा आदि अलंकारों का प्रयोग भी किया गया हैं. भारत में अनेक विद्वानों एवं साहित्यकारों ने महाभारत की कथा को आधार बनाकर अपनी रचनाएं रची हैं.

आदि महाभारत के साहित्यिक महत्व के विषय में स्वयं वेदव्यास ने लिखा हैं कि महाभारत शुभ ललित और मंगलमय शब्द विन्यास से विभूषित हैं. यह अनेक प्रकार के छन्दों से युक्त हैं. अतः यह ग्रंथ विद्वानों को प्रिय रहेगा. महाभारत में सर्वाधिक प्रिय अलंकार उपमा रहा हैं. अतिश्योक्ति, मालोपमा आदि अलंकारों का भी कहीं कहीं प्रयोग हुआ हैं.

महाभारत का ऐतिहासिक महत्व– ऐतिहासिक दृष्टि से महाभारत का काफी महत्व हैं. इसमें कौरवों और पांडवों के युद्ध का वर्णन किया गया हैं. इसमें तात्कालीन, धार्मिक, नैतिक, सामाजिक, राजनीतिक और ऐतिहासिक घटनाओं का वर्णन हैं.

दार्शनिक महत्व- महाभारत का दार्शनिक पक्ष भी काफी महत्वपूर्ण हैं. गीता का दर्शन भी महाभारत का एक अंग हैं. इसमें ज्ञान, भक्ति और कर्म का सुंदर समन्वय स्थापित किया गया हैं. गीता के अनुसार निष्काम कर्म ही सर्वोत्तम हैं. इस प्रकार गीता में भारतीय जीवन दर्शन का विशद विवेचन किया गया हैं.

धर्मों की विविधता में समन्वय– महाभारत में लोक धर्म के अनेक रूप और पक्ष दिखाई देते हैं. श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हैं कि जो व्यक्ति अपनी इच्छा और रूचि के अनुकूल जिस रूप में श्रद्धापूर्वक भगवान की पूजा अर्चना करता हैं, भगवान उसे उसी रूप में स्वीकार करते हैं.

नियतिवाद, प्रज्ञावाद और आध्यात्मवाद का विशलेषण– महाभारत के रचनाकार वेदव्यास ने महाभारत में जीवन के तीन पहलुओं- नियतिवाद, प्रज्ञावाद और आध्यात्मवाद का विश्लेषण किया हैं. धृतराष्ट्र का चरित्र नियतिवादी हैं, दूसरी ओर विदुर प्र्ग्यावादी है, संत्सु जात आध्यात्मवाद के पोषक हैं.

महाभारत में आदर्श– महाभारत में श्रीकृष्ण को नारायण का अवतार मानकर उनका वर्णन किया गया हैं. विदुर एक उच्च कोटि का विद्वान् और नीतिशास्त्र तथा धर्मशास्त्र का ज्ञाता था. भीष्म धर्म और न्याय के प्रतीक होते हुए भी अपनी प्रतिज्ञा के कारण हस्तिनापुर के राजसिंहासन से बंधे हुए हैं. युधिष्ठर में धर्म और बुद्धिमता, भीम में शक्ति, अर्जुन में वीरता और कुशलता, नकुल और सहदेव में आज्ञाकारिता का आदर्श बहुत ही सुंदर ढंग से चित्रित किया गया हैं. महाभारत की द्रौपदी एक आदर्श नारी हैं.

महाभारत का सामाजिक मूल्य– महाभारत की सामाजिक व्यवस्था में कर्म को अधिक महत्व दिया गया हैं. महाभारत में वर्ण व्यवस्था का आदर्श गुण कर्म पर आधारित हैं.

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