मुंशी प्रेमचंद पर निबंध- Essay on Munshi Premchand in Hindi

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मुंशी प्रेमचंद पर निबंध- Essay on Munshi Premchand in Hindi

Essay on Munshi Premchand in Hindi

Munshi Premchand Essay in Hindi

सचेत नागरिक, संवेदनशील लेखक और सकुशल प्रवक्ता प्रेमचन्द जी हिंदी के महान कवि थे, इन्हें हम मुंशी प्रेमचंद के रूप में जाना जाता हैं. हिंदी साहित्य के विकास में प्रेमचंद का महत्वपूर्ण योगदान रहा. उपन्यास एवं कहानी विधा में इनकी जोड़ी का दूसरा कोई समकालीन लेखक नहीं था. हिंदी की यात्रा को अनवरत आगे बढ़ाने में अग्रणी भूमिका निभाने वाले प्रेमचंद जी मेरे प्रिय लेखक भी हैं.

हीरा मोती, ईदगाह इनकी कहानियाँ तो हमने हिंदी की पाठ्यपुस्तक में पढ़ी ही होगी. 31 जुलाई 1880 को यूपी के लमही नामक गाँव में प्रेमचंद का जन्म हुआ था. इनके पिताजी का नाम अजायबराय और माताजी का नाम आनंदी देवी था, पेशे से पिताजी अंग्रेजी सेवा में डाक विभाग के मुंशी हुआ करते थे.

वर्ष 1898 में प्रेमचंद जी ने दसवीं की परीक्षा पास की और शिक्षक के रूप में अध्यापन से अपने करियर की शुरुआत की, वे अपने पेशे के साथ साथ अपने अध्ययन को जारी रखा और वर्ष 1910 में जाकर इन्होने में बाहरवीं की परीक्षा उतीर्ण की. इसके बाद 1918 में इन्होने स्नातक की तथा दरोगा की नौकरी के लिए नियुक्त हुए.

पन्द्रह साल की आयु में ही प्रेमचंद जी का विवाह हो गया था. शादी के समय ही इनके पिताजी का देहांत हो गया था. जिसके चलते परिवार का पूरा भार उनके कंधों पर आ गया. गांधीजी के असहयोग आन्दोलन से प्रभावित होकर इन्होने दरोगा के पद से इस्तीफा दे दिया था.

कहानी उपन्यास विधा के सम्राट मुंशी जी ने राष्ट्रीय आन्दोलन को प्रेरणा देने के लिए साहित्य लेखन को चूना, इन्होने उर्दू भाषा में नवाबराय के नाम से लेखनी शुरू की. बचपन में प्रेमचंद का नाम धनपत राय था. हिंदी में लेखन की शुरुआत इन्होने प्रेमचंद के नाम से लिखना शुरू किया.

इन्होने कई हिंदी उपन्यास भी लिखे, सेवा सदन, निर्मला, गोदान, गबन, कर्मभूमि, रंगभूमि इनके द्वारा रचे गये. कर्बला, संग्राम और प्रेम की वेदी मुंशी जी के प्रसिद्ध नाटक थे. तीन सौ से अधिक कहानियों को मानसरोवर में संग्रहित किया गया. प्रेमचंद जी ने कई निबंध रचनाएं भी की. उनकी लेखनी का मूल केंद्र निर्बल व असहाय, कृषक, मजदूर व नारी शामिल थे.

प्रेमचंद जी भारतीय संस्कृति के सच्चे नायक थे. साम्यवाद, गाँव और मजदूर की पीड़ा के प्रतीक बनकर इन्होने अपनी लेखनी से सच्चा चित्र प्रस्तुत किया. उनमें देशभक्ति का जज्बा कहानियों में देखने को मिलता हैं. प्रेमचंद जी ने समाज में व्याप्त अंधविश्वासों को दूर करने के लिए जागृति फैलाई. इनकी भाषा सरल सौम्य एवं बोलचाल की भाषा थी, हिंदी उर्दू तथा देशी भाषाओं के मुहावरों व कहावतो का सुंदर प्रयोग किया.

उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद कलम के सच्चे सिपाही थे. उन्होंने आजीवन साहित्य लेखन में ही अपनी उम्रः गुजारी. उनका समूचा कथा साहित्य एवं उपन्यास साहित्य जीवन की सच्ची अनुभूतियों का वास्तविक दर्पण हैं. वे एक सामाजिक उपन्यास कार थे. उन्होंने सेवा सदन से लेकर गोदान तक अपनी सृजनात्मक यात्रा में अपने लेखन को सर्वथा बदला है, लेकिन स्वभाव न बदला. उनके उपन्यासों में आदर्शोंन्मुखी यथार्थवाद के दर्शन होते हैं. उनके उपन्यासों के सभी पुरुष एवं स्त्री पात्र हमारे आस पास के जन जीवन में देखे जा सकते हैं. उनका रचना संसार अत्यंत विशद् व्यापक एवं गहन है, संक्षेप में उनका परिचय निम्न लिखित हैं.

प्रेमचंद पर निबंध- Short Speech & Essay on Premchand in Hindi

मुंशी प्रेमचंद हिंदी उपन्यास के प्रमुख कीर्ति स्तम्भ माने जाते हैं. आपके पूर्व हिंदी उपन्यासों के विषय वस्तु रहस्य रोमांच और सामान्य सामाजिक बुराइयों पर लिखे जाते थे. किन्तु प्रेमचंद ने हिंदी उपन्यासों की दिशा ही बदल दी. उन्होंने नवीन औपन्या सिक कौशल का प्रयोग करते हुए कलात्मक उपन्यासों की एक विस्तृत श्रंखला हिंदी जगत को प्रदान की. उनके उपन्यासों में तत्कालीन युग का प्रतिबिम्ब देखा जा सकता हैं.

वे सही मायने में भविष्य दृष्टा थे. इसलिए सन 1920 से 1940 के बीच जो सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियाँ उभर कर सामने आई थी, मात्र उसी का चित्रण इन्होने नहीं किया बल्कि भारत में उदित महाजनी सभ्यता को उन्होंने पहचान लिया था, वे सर्वहारा वर्ग के सच्चे चिंतक थे. तभी तो उनके उपन्यासों में किसान, मजदूर व मध्यम वर्ग की समस्याएं उभर कर आई हैं.

उनके उपन्यासों में सामाजिक, राजनैतिक चेतना, मार्क्सवादी चिंतन और आर्थिक विषमता का खुलकर चित्रण हुआ हैं. वे प्रारम्भ में ही आदर्शवादी थे पर आगे चलकर उनके उपन्यासों में आदर्शोंमुखी यथार्थवाद के दर्शन होते हैं. उनकी वस्तु योजना पात्रों का चित्रांकन तथा वातावरण का चित्रण अनूठा हैं. इनकी कहानियों व उपन्यासों में विषयवस्तु का प्रतिपादन इतना जीवंत हुआ है कि पढ़ते समय हमारी आँखों के आगे वे दृश्य सजीव हो जाते हैं.

सेवा सदन से लेकर गोदान तक प्रेमचंद ने लगभग एक दर्जन उपन्यास लिखे तथा इन सभी उपन्यासों में कथानक की रोचकता तथा सामाजिक परिवेश का यथार्थ चित्रांकन हुआ हैं. जैसे सेवा सदन में उपेक्षित स्त्री समाज और वेश्यावृत्ति की समस्याओं का चित्रण हुआ हैं. इसमें सुमन व शान्ति की दोहरी कथा संचरित हुई हैं. और उनके माध्यम से सामाजिक दोषों का चित्रण हो गया हैं. निर्मला उपन्यास में अनमेल विवाह का चित्रण हुआ है. यह भी नारी प्रधान उपन्यास है, जिसमें निर्मला की मृत्यु नारी उत्पीड़न की ज्वलंत घटना को रेखांकित करती हैं.

रंगभूमि व प्रेमाश्रम सामाजिक चेतना के साथ साथ राजनैतिक चेतना को चित्रित करते हैं, इन पर गांधीवाद का प्रभाव हैं. इनमें सूरदास नामक पात्र को केंद्र में रखकर शोषित व्यक्तियों की पीड़ा को चित्रित किया हैं. भारत में बढ़ते पूंजीवाद और औद्योगिक व्यवस्था की त्रुटियों को दर्शाया गया हैं. इसी तरह प्रेमाश्रम में हमारे राष्ट्रीय आंदोलन की झलक देखने को मिलती हैं. इनका कर्म भूमि उपन्यास भी इसी तरह का हैं. कर्मभूमि में स्वाधीनता आंदोलन व क्रांतिकारियों की भूमिका को कुशलता से उतारा गया हैं.

प्रेमचंद रचित कायाकल्प व गबन सामाजिक उपन्यास हैं. कायाकल्प में सामन्ती जीवन की कमजोरियों को दर्शाया गया है, तो गबन में मध्यमवर्गीय लोगों की थोथी प्रदर्शन भावना को, कर्ज की समस्या और युवकों की आकांक्षाओं से उत्पन्न जीवन की जटिलताओं का चित्रण हुआ हैं. नारी के आभूषण प्रेम को बुरी परिणिति दिखलाई गई हैं.

प्रेमचंद का अंतिम उपन्यास गोदान है. जिसमें प्रेमचंद ने आदर्शों के खंडित हो जाने पर ग्रामीण व शहरी जीवन की समस्याओं को उजागर किया हैं, इसका प्रमुख पात्र होरी समूचे भारतीय किसानो का प्रतीक हैं. होरी के गाय खरीदने की इच्छा से उत्पन्न अनेक समस्याओं को इसमें निरुपित किया गया हैं. इस उपन्यास में जमीदारी अत्याचार, पंचायत का दुष्प्रभाव, छुआछूत की भावना, स्त्री पुरुष के अवैध सम्बन्धों का चित्रण, पूंजीपतियों की शोषण वृत्ति और इनकी विलासिता का बड़ा ही प्रभावशाली चित्रण किया गया हैं.

पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित भारतीय नारी की उच्छ्राखलता भी दर्शायी गई है, परन्तु साथ ही मेहता मालती के प्रसंग से नारी के त्याग का चित्रण भी हो गया हैं. इन उपन्यासों के अतिरिक्त एक दो रचनाएं और भी मिलती हैं जिनमें मंगलसूत्र उल्लेखनीय है, परन्तु इसे वे पूरा नहीं लिख पाए थे. अपने विशद उपन्यास साहित्य के कारण ही प्रेमचंद को उपन्यास सम्राट की संज्ञा दी गई हैं.

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कलम के धनी प्रेमचंद विशुद्ध ग्रामीण जीवन की मिट्टी के खाद थे. वे जाति से कायस्थ थे, किन्तु उनके पूर्वज खेती बाड़ी का ही काम करते थे. प्रेमचंद का जीवन लमही में बीता था वे किसानों के दुःख दर्द को पहचानते थे अपनी आँखों के आगे उन्होंने जमीदारों के जुल्म, साहूकारों के शोषण, पंचायत का आतंक और रूढ़ियों से ग्रस्त नारी समाज पर होने वाले अत्याचारों को घटित होते देखा था.

यही कारण है कि उनके उपन्यासों में उस युग का केनवास अपने व्यापक प्रभाव को प्रतिबिम्बित करता हैं. प्रेमचंद मात्र अपने परिवेश से ही नहीं जुड़े थे, बल्कि उनका युग बोध विस्तृत एवं विशाल था. उनकी रचनाओं में तत्कालीन राजनैतिक, सामाजिक व आर्थिक घटनाओं का सशक्त चित्रण हुआ हैं. सामाजिक रूढ़ियों नव जागृति की लहर को प्रकट करने में प्रेमचंद कुशल रहे हैं.

उनके उपन्यासों में व्यष्टिगत सत्य के साथ साथ समष्टिगत तथ्य की भी अभिव्यंजना हुई हैं जैसे प्रेमाश्रम उपन्यास में ज्ञान शंकर व प्रेमशंकर के माध्यम से समाज के दो वर्गों के नायक व प्रतिनायक के रूप में एक दूजे के विरुद्ध खड़ा किया है, किन्तु वहाँ व्यक्ति की तुलना में समाज को अधिक महत्व दिया हैं. इसी तरह गोदान में ग्राम्य जीवन में फैली उलझनों व जीवन की जटिलताओं का वैयक्तिक स्तर से सामाजिक स्तर तक सफल चित्रांकन हुआ हैं.

प्रेमचंद के उपन्यासों में नारी पात्रों का प्रभावी वर्णन मिलता हैं. हमारे समाज में नारी को पुरुष के अहम और उसके तिरस्कार का शिकार होना पड़ा, उन्होंने नारी को अनावश्यक रूप से दबाना अन्यायपूर्ण हैं. उनकी अशिक्षा, विधवापन और उनके शोषण का खुलकर चित्रण किया हैं. पर गबन की जालपा और गोदान की धनिया व मालती के माध्यम से नारी की संघर्षशीलता को दर्शाया गया हैं.

यदि वह दृढ निश्चय कर ले तो अपना जीवन सुधारने के साथ साथ अन्य की वैतरिणी भी लगा सकती हैं. इसी तरह समाज में वेश्याओं की समस्या और अनमेल विवाह की व्यथा को उभारने की भी कोशिश की हैं. गबन की जोहरा और रतन स्त्री पात्रों दारा हमारा ध्यान इस ओर आक्रष्ट किया है. प्रेमचंद ने सभी पात्रों के चरित्रांकन में मनोविज्ञान का सहारा लिया हैं.

प्रेमचंद जी सत्य व शिव के उपासक थे. उन्होंने सुंदर की उपेक्षा नहीं की पर सत्य व शिव की तुलना में उसे कम ही महत्व दिया हैं. जैसे कृषक, जमीदारों, मजदूर, पूंजीपतियों का संघर्ष दिखाकर सत्य को चित्रित किया हैं. तो प्रेमाश्रम के मायाशंकर व गोदान के रायबहादुर अमरपालसिंह द्वारा स्वेच्छा से अधिकार त्याग और जमीनों को किसानो में वितरित कर देने शिवम की ही प्रतिष्ठा करते है.

अतः प्रेमचंद का समूचा उपन्यास साहित्य कलात्मक एवं सुरुचिपूर्ण हैं. उसमें कथ्य, शिल्प का सत्य व शिव का, व्यक्ति व समाज का, सामानुपातिक चित्रण किया गया हैं. उनके प्रत्येक उपन्यास में मानवीय संवेदना प्रमुख रूप से उभरकर सामने आई हैं. इस तरह प्रेमचंद की उपन्यास कला का गहन व गभीर है और आज भी वह निरंतर विकासोंन्मुखी हैं.

मुंशी प्रेमचंद पर लघु निबंध 500 शब्दों में, short essay on munshi premchand in 500 words in hindi

उपन्यास सम्राट के नाम से विख्यात मुंशी प्रेमचंद हिंदी के कलात्मक उपन्यासों के जनक माने जाते हैं. उन्होंने ही हिंदी उपन्यास साहित्य को तिलस्मी, जासूसी, रोमांच, प्रेम, रोमांच तथा उपदेशात्मक के क्षेत्र से बाहर निकालकर सामाजिक उपन्यासों की नीव रखी.

उन्होंने कथा साहित्य को कल्पनालोक से निकालकर उसे जन जीवन से जोड़ने का प्रयास किया. उन्होंने कथा साहित्य में समाज का यथार्थ चित्रण कर साहित्य समाज का दर्पण है कि उक्ति को चरितार्थ किया है. उन्ही की प्रेरणा से तत्कालीन कहानी उपन्यासकारों ने समकालीन जीवन की समस्याओं एवं नई क्रांतिकारी भावनाओं का चित्रण करना प्रारम्भ किया था.

प्रेमचंद का जन्म बनारस के निकट लमही नामक गाँव में हुआ था. उनके बचपन का नाम धनपतराय था. घर में उन्हें नवाब कहकर पुकारते थे, बचपन आर्थिक संकट में बीता. कायस्थ परिवार में इनका जन्म 1880 ई में हुआ था. बचपन में माता का देहांत हो गया. पिता ने दूसरी शादी कर ली.

सौतेली माँ का व्यवहार ठीक न था. पांचवी कक्षा तक गाँव में और हाईस्कूल की पढ़ाई बनारस में की. ट्यूशन करके गुजारा चलाते थे. इंटर पास करके अध्यापक बन गये और बाद में बी ए पास किया. तत्पश्चात शिक्षा विभाग में डिप्टी इंस्पेक्टर बन गये.

गाँधीजी ने सत्याग्रह आंदोलन छेड़ा तो नौकरी छोड़कर लेखन कार्य में जुट गये. इन्होने लगभग 300 कहानियाँ और दर्जन भर उपन्यास लिखे. मर्यादा और माधुरी नामक पत्रिकाओं का सम्पादन किया. फिल्म लेखक भी बने पर फ़िल्मी दुनिया रास नहीं आई. इसके बाद हंस और जागरण नामक पत्रिकाओं का स्वयं सम्पादन किया.

प्रेमचंद का व्यक्तित्व जीवट का था. इनकी पहली शादी टूट गई और शिवानी से दूसरा विवाह किया. जिनमें अमृतराय नामक पुत्र पैदा हुआ. जीवन संघर्षपूर्ण रहा. सादगी और ईमानदारी इनके जीवन के मूल मंत्र थे. निर्भीक व साहसी थे. अंग्रेजी सरकार के के जुल्म अत्याचारों का वर्णन इन्होने अपनी रचनाओं में बखूबी किया. वे सत्साहित्य आंदोलनकर्ता थे. उनमें मार्क्सवादी विचारों की प्रधानता भी रही. 1936 में स्वास्थ्य बिगड़ने से लमही में इनकी मृत्यु हो गई.

प्रेमचंद की रचनाएं

प्रेमचंद एक सफल कहानीकार, उपन्यासकार, निबंधकार, संपादक एवं प्रबल समाज सुधारक थे. बहुमुखी प्रतिभा के धनी प्रेमचंद ने अनेक अन्य भाषाओं की रचनाओं का हिंदी में अनुवाद भी किया. उनका समग्र लेखन इस प्रकार हैं.

  • उर्दू कहानियाँ- सोजे वतन. जिसे उन्होंने धनपतराय के नाम से लिखा, इसमें अंग्रेज विरोधी क्रांतिकारी विचार प्रस्तुत किये थे. जिससे उक्त पुस्तक को अंग्रेज सरकार ने जब्त कर लिया और प्रकाशित प्रतियों की होली जला दी. उन पर मुकदमा भी चला, जिसे एक अंग्रेज अफसर ने मुक्त करवाया.
  • कहानी संग्रह- प्रेमचंद ने 300 कहानियाँ लिखी, जो मानसरोवर 8 भागों में प्रकाशित हुई. उनकी प्रसिद्ध कहानियों में पंच परमेश्वर, बूढी काकी, ईदगाह, नमक का दरोगा, सज्जनता का दंड एवं कफन सर्वाधिक लोकप्रिय हैं.
  • उपन्यास- प्रेमा, वरदान, प्रतिज्ञा, सेवा सदन, प्रेमाश्रम, निर्मला, रंगभूमि, कर्मभूमि. कायाकल्प, गबन, गोदान व अंतिम उपन्यास मंगलसूत्र जो अधुरा रह गया था. हाल ही में ज्ञानपीठ प्रकाशन से इनकी एक अज्ञात कृति वीर दुर्गादास भी प्रकाशित हुई हैं.
  • नाटक – प्रेम की वेदी, कर्बला, संग्राम
  • निबंध संग्रह – कुछ विचार, साहित्य का स्वरूप
  • अनुवाद ग्रंथ- सृष्टि का आरम्भ, आजाद कथा, अहंकार, हड़ताल और चांदी की डिबिया.
  • बाल साहित्य– मनमोहन, कुत्ते की कहानी, जंगल की कहानियाँ, दुर्गादास, रामचर्चा. इनके अतिरिक्त पत्र पत्रिकाओं के लेख एवं सम्पादित प्रकाशित पत्रिकाएँ भी हैं.

प्रेमचंद का उपन्यास साहित्य (Essay On Premchand’s novel literature)

सेवा सदन

यह उपन्यास प्रेमचंदजी की प्रारम्भिक कृतियों में से एक हैं. इसका प्रकाशन वर्ष 1918 में हुआ था, इस उपन्यास के प्रमुख पात्र सुमन एवं शांता है. जिनके चरित्र का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया हैं. इस उपन्यास में सामाजिक दोषों का चित्रण हुआ हैं. उसे देखने से ज्ञात होता है कि उसमें दो कहानियाँ निहित हैं. इस सम्बन्ध में आचार्य नंददुलारे का कथन द्रष्टव्य है. उपन्यास का पिछला भाग एक दूसरी की कहानी की सृष्टि करता हैं, जो शांता की कहानी हैं. उपन्यास का पुर्वान्द्ध में सुमन की कहानी को प्रमुखता देने के बाद उसके उत्तरार्द्ध में शांता की कहानी को प्रमुखता दे दी गई हैं. इस प्रकार हम देखते है कि उपन्यास में सुमन की कहानी म्युनिसिपल्टी के कारनामें और शांता का आख्यान बिखरे बिखरे से चलते गये हैं. इस कथन से स्पष्ट है कि इस प्रारम्भिक रचना में प्रेमचंद जी ने दोहरी कथा का संतुलन ठीक से नहीं रखा, फिर भी वह समाज के दोषों को प्रकट करता हैं.

निर्मला

इस उपन्यास का प्रकाशन वर्ष 1923 में हुआ था. इसमें अनमेल विवाह की समस्या का चित्रण किया गया हैं. इसका कथानक सुगठित हैं. इसे हिंदी का प्रथम मनोवैज्ञानिक उपन्यास कह सकते हैं. यह एक नायिका प्रधान उपन्यास हैं. जिसमें निर्मला के जीवन की त्रासदी चित्रित की गई हैं. यह एक यथार्थवादी उपन्यास हैं, जिसमें निर्मला की कठोर जिन्दगी का चित्रण किया गया हैं.

इसमें पात्रों की मृत्यु बड़ी स्वाभाविक लगती है जैसे उदय भानु, डॉ भुवन, मोहन सिन्हा की मृत्यु कहानी की उद्देश्य की पूर्ति के लिए कराई गई हैं. कथा के पात्र मध्यम वर्ग से सम्बन्धित हैं. इसमें विमाता के चरित्र को बहुत ही सहानुभूति से चित्रित किया गया हैं. जो रचनाकार की कुशलता का प्रमाण हैं. चरित्र चित्रण में नाटकीय शैली का चित्रण किया गया हैं, जिसमें रोचकता का समावेश किया गया हैं. पुरुष पात्रों के अतिरिक्त कल्याणी सुधा और रंगीली बाई जैसे स्त्री पात्र समाज के विभिन्न वर्गों का प्रति निधित्व करते हैं.

इनमें निर्मला का चरित्र नारी जाति की यन्त्रणाओं का प्रतीक हैं. मध्यम वर्ग में व्याप्त अनेक रुढियों एवं कुपरम्पराओं को चित्रित किया गया हैं. जिसका आज के युग में कोई महत्व नहीं हैं. डॉ सुरेश सिन्हा के शब्दों में निर्मला की मृत्यु मध्यवर्गीय समाज की ध्वन्सोमुखता दूषित विवाह व्यवस्था तथा आर्थिक समाज की प्रेरणा देता हैं. नई पीढ़ी में संकल्प और दृढता का आव्हान करती हैं. यह सामाजिक विषमता का एक भयंकर विस्फोट ही हैं. वह एक क्रांति का संदेश है. प्रेमचंद का यह उपन्यास अत्यंत लोकप्रिय हुआ था.

रंग भूमि

यह उपन्यास घटना प्रधान है इसका प्रकाशन 1924 में हुआ था. इसे प्रेमचंद की श्रेष्ठ कृतियों में माना जाता हैं. इस उपन्यास की कथावस्तु का केंद्र बिंदु ग्रामीण जीवन है जिसमें अनेक प्रासंगिक कथाएँ आ जाती हैं. इस उपन्यास का केन्द्रीय पात्र सूरदास हैं. सोफिया विनय भी प्रमुख पात्रों की श्रेणी में आते है, किन्तु ताहिर अली का कथन थोड़ा कृत्रिम एवं अस्वाभाविक लगता है, इसमें पूंजीवाद और औद्योगिक व्यवस्था की त्रुटियों को दर्शाया गया हैं. इसमें शोषक एवं शोषित की स्थितियों का बखूबी चित्रण मिलता हैं. वर्ग संघर्ष का चित्रण करना उपन्यास की मूल संवेदना हैं.

कायाकल्प

यह भी एक सामाजिक उपन्यास है, यह सन 1928 में प्रकाशित हुआ था, इसके प्रधान पात्र चक्रधर एवं मनोरमा हैं. इसके अतिरिक्त दर्जनों पात्र है जो सिमित कथा वस्तु में बोझिल प्रतीत हैं. इसमें सामन्ती जीवन की अनेक कमजोरियों को दर्शाया गया हैं. इसमें सम सामयिक घटनाएं इतनी तेजी से घटित होती है कि पाठक के ह्रदय में रोमांच पैदा करती हैं. लेखक ने इसमें यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाया है और उपन्यासकार को अपने लेखन में पूर्ण सफलता मिली हैं.

गबन

इसका रचनाकाल सन 1930 है यह यथार्थवादी उपन्यास हैं. जिसमें एक ओर तो मध्यमवर्गीय लोगों की थोथी प्रदर्शन भावना, कर्ज की समस्या, युवकों की आशंकाएं और सत्य से पलायन करने की प्रवृत्ति को चित्रित किया गया हैं. इस उपन्यास के प्रमुख पात्र रमानाथ एवं जालपा हैं. जालपा की आभूषण प्रियता उसके पति रमानाथ को गबन करके पलायन की ओर उन्मुख करती हैं,

वह भागकर कलकत्ता चला जाता है और ब्रिटिश पुलिस के चंगुल में फंस जाता हैं. तथा क्रांतिकारियों के विरुद्ध झूठी गवाही देकर एश मोज की जिन्दगी व्यतीत करने के सपने देखता है किन्तु अंत में किसी तरह जालपा वहां पहुँचती है और उसे कुमार्ग पर जाने से रोकती हैं. इस उपन्यास में मध्यमवर्गीय पिटा दयानाथ , भाई गोपीनाथ तथा रतन एव इन्द्रभूषण जैसे पात्र हैं. इसमें अनमेल विवाह के भीषण परिणामो का चित्रण भी मिल जाता हैं. किन्तु अंत में जालपा के प्रयास से रमानाथ का ह्रदय परिवर्तन हो जाता है, देवीदीन, जग्गो, जोहरा आदि आदर्श जीवन व्यतीत करने की ओर अग्रसर किया जाता हैं. इसमें नियति और ईश्वर की शक्ति को प्रबल सिद्ध किया गया हैं. उपन्यास कला की दृष्टि से यह एक सफल रचना हैं.

कर्मभूमि

इस उपन्यास की रचना स्वतंत्रता संग्राम की प्रष्टभूमि पर हुई हैं. प्रेमचंद का यह एक राजनैतिक उपन्यास हैं, जिसकी रचना 1932 में हुई थी. इसका कथानक काशी एवं उसके आस पास के गाँवों से हैं. इसमें हमारे स्वाधीनता आंदोलन तथा क्रांतिकारियों की भूमिका को अत्यंत कुशलता से उभारा हैं. स्वाधीनता आंदोलन में गांधीवाद की छाप स्पष्ट देखी जा सकती हैं. लेखक ने बड़ी कुशलता के साथ हमारी अन्य सामाजिक समस्याओं को भी उभारा हैं. इसमें वातावरण का बहुत सजीव चित्रण हुआ हैं. घटनाओं की अधिकता होते हुए भी उसमें निराशात नहीं हैं. सजीवता और कथानक का प्रवाह इस उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता हैं. इसमें आदर्श और यथार्थ का उचित समन्वय हो गया हैं. प्रेमचंद के इस उपन्यास का मुख्य उद्देश्य सामाजिक न्याय दिलाना था.

गोदान

यह मुंशी प्रेमचंद जी की अंतिम रचना है जो 1936 में प्रकाशित हुई थी. ऐसा कहा जाता है कि अंतिम कहानी कफन लिखकर प्रेमचंद ने अपने कफन का इंतजाम किया था, तो अंतिम उपन्यास गोदान लिखकर मरणोपरांत गौ दान की इच्छा व्यक्त कर दी थी. इसमें कृषक जीवन की सूक्ष्म झांकी चित्रित की गई हैं. इसकी मूल समस्या ग्रामीणों के आर्थिक एवं सामाजिक जीवन का चित्रण कर देती हैं. साथ ही शहरी जीवनं की समस्याओं को समेटने का भी यत्न किया हैं.

उपन्यास का प्रमुख पात्र होरी है, जिसकी गाय खरीदने की इच्छा ने अनेक समस्याओं को जन्म दिया. होरी का भाई हीरा इर्श्यावश गाय को जहर दे देता हैं. उसे पुलिस के चक्कर से बचाने के लिए रिश्वत देने हेतु कर्जा लेना होता हैं. होरी रायबहादुर अमरपालसिंह के यहाँ बंधुआ मजदूर था. इस उपन्यास में जमींदारी अत्याचार, उनकी विलासिला, पंचायत के दुष्प्रभाव, छुआ छूत की भावना तथा स्त्री पुरुष के अवैध सम्बन्धों का चित्रण भी इसमें कर दिया हैं.

इसमें दातादीन, मातादीन, सिलियाँ, गोबर, झुनियाँ जैसे पात्रों के माध्यम से ग्रामीण जीवन की सहज घटनाओं को चित्रित कर दिया गया हैं. दूसरी तरफ शहरी पात्रों मेहता मालती और खन्ना गोविंदी के माध्यम से शहरी जीवन की विसंगतियों का चित्रण भी कर दिया हैं. इसमें औद्योगिक अशांति, नारी स्वतंत्रता के नाम पर व्याप्त उच्छ्राखलता के साथ ही नारी त्याग का चित्रण भी कर दिया हैं. अंत में होरी व्यवस्था दोष का शिकार होता है. वह मृत्यु करते करते अंत में मृत्यु का ग्रास बनता है., इस तरह उपन्यास प्रेमचंद के आदर्शवाद का खात्मा करके जीवन की कटु यथार्थताओं का बोध करा देता हैं.

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