राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 पर निबंध | Essay On Ncf 2005 In Hindi

Essay On Ncf 2005 In Hindi: नमस्कार दोस्तों राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 पर आज हम निबंध लेकर आए हैं आज हम NCF 2005 in Hindi में यह समझने की कोशिश करेगे कि ncf 2005 क्या है कब बनाया गया तथा इसे बनाने की आवश्यकता एवं उद्देश्य क्या था आज के लेख, निबंध, भाषण, अनुच्छेद में हम इसी विषय को गहनता से समझने का प्रयास करेंगे.

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 पर निबंध | Essay On Ncf 2005 In Hindi

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा पर निबंध Essay On Ncf 2005 In Hindi

एन सी एफ 2005 परिचय (NCF: National curriculum framework 2005)

  • यह विद्यालय शिक्षा पर अब तक का नवीनतम राष्ट्रीय दस्तावेज है जिसे राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षाविदो, वैज्ञानिकों, विषय विशेष्यज्ञो व अध्यापकों ने मिलकर तैयार किया हैं.
  • भारत सरकार के एमएचआरडी की पहल पर प्रो यशपाल की अध्यक्षता में देश के चुने हुए 23 विद्वानों ने विद्यालयी शिक्षा पर हुए पिछले सभी विचार विमर्शों का अध्ययन किया और उन्हें नई राष्ट्रीय चुनौतियों की रोशनी में देखा. इस राष्ट्रीय मशवरे से निकले तीन क्षेत्रों पर बाहर से 13 सदस्यों वाले 21 फोकस समूहों ने विचार किया और एन सी एफ 2005 को आकार दिया.

ncf in hindi राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 के मार्गदर्शक सिद्धांत

  • ज्ञान को स्कूल के बाहरी जीवन से जोड़ना
  • पढ़ने की रटंत प्रणाली से मुक्त करना
  • पाठ्यचर्या को इस तरह आगे बढ़ाना कि वह बच्चों के चहुंमुखी विकास के अवसर दे, न कि पाठ्यपुस्तक केन्द्रित बनकर रह जाए
  • परीक्षा को पहले की तुलना में अधिक लचीला बनाना और उसे कक्षाकक्ष की गतिविधि से जोड़ना
  • बच्चों को ऐसे नागरिकों के रूप में विकास जिनमें प्रजातंत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत राष्ट्रीय मूल्यों लोकतंत्र धर्मनिरपेक्षता व समानता में आस्था हो

प्रमुख विशेषताएं (major features)

  • NCF 2005 का प्रारम्भ रविन्द्रनाथ टैगोर के निबंध सभ्यता व प्रगति के कथन से होता हैं. सृजनातत्मकता और उदार आनंद बचपन की कुंजी हैं और नासमझ वयस्क संसार द्वारा उसकी विकृति का खतरा हैं.
  • विशेष: सामाजिक न्याय व समानता के संवैधानिक मूल्यों पर आधारित एक धर्मनिरपेक्ष, समतामूलक व बहुलतावादी समाज के आदर्शों को इसमें शामिल किया गया हैं. यह विचार व कर्म की स्वतंत्रता, दूसरों के प्रति संवेदनशीलता, लचीलापन, रचनात्मकता, लोकतांत्रिकता, सभी वंचित व असमर्थ बच्चों के लिए समावेशी शिक्षा की अवधारणा पर बल देता हैं.
  • फ्रेमवर्क में कक्षा 1 से 12 तक कब क्या, क्यों और कैसे पढ़ाना इसकी पूरी रूपरेखा प्रस्तुत की गई हैं.

NCF 2005 की अन्य प्रमुख विशेषताएं

सीखना अपने आप में एक सक्रिय व सामाजिक गतिविधि है. सीखने सिखाने में निम्नलिखित सिद्धांतों पर बल देने की जरूरत हैं. ज्ञात से अज्ञात, मूर्त से अमूर्त, स्थानिक से वैश्विक की ओर. सीखने की एक उचित गति होनी चाहिए इसमें बच्चों के दिल दिमाग को रौदने वाली तेजी नहीं होनी चाहिए. ऐसा नहीं होना चाहिए कि बच्चें अवधारणाओं को रटकर परीक्षा पास करे और फिर उन्हें भूल जाए. सीखने में विविधता और चुनौतियाँ होनी चाहिए. ताकि वे बच्चों को रोचक लगे और उन्हें व्यस्त रखे.

शिक्षा सार्थक तभी है जब व्यक्ति को इतना समर्थ बना सके कि वह शाति को जीवन शैली के रूप में चुन सके. लेकिन वह सामाजिक संघर्षों का एक मूक दर्शक न बन कर रह जाए. सूचना को ज्ञान मानने से बचना चाहिए. स्कूलों में पढ़ाई तब तक आनन्ददायक नहीं हो सकती जब तक बच्चों के प्रति हम अपना यह नजरिया न बदले कि वे मात्र ज्ञान लेने वाले हैं.

मोटे पाठ्यक्रम और मोटी किताबे शिक्षा प्रणाली की असफलता के प्रतीक है इन्हें बनाने और लिखने वाले इस धारणा से प्रेरित है कि दुनिया में ज्ञान का विस्फोट हुआ हैं. लोकतंत्र, समानता, न्याय, स्वतन्त्रता, परोपकार, धर्मनिरपेक्षता, मानवीय गरिमा और मानव अधिकार हमारे सामाजिक मूल्य है इन्हें उपदेश देकर नहीं बल्कि वातावरण देकर बच्चों के मन में बोने की जरूरत हैं.

बाल केन्द्रित शिक्षा का अर्थ बच्चों के अनुभवों, उनके स्वरों और उनकी सहभागिता को प्राथमिकता देना हैं. बच्चें उसी वातावरण में सीख सकते है जहाँ उन्हें लगे कि वे महत्वपूर्ण है हमारे स्कूल आज भी बच्चों को ऐसा महसूस नहीं करा पाते हैं. यदि सीखने का आनन्द व संतोष के साथ रिश्ता होने के बजाय भय, अनुशासन व तनाव से सम्बन्ध हो तो वह सीखने में बाधा डालता हैं.

बच्चों के लिए तनाव प्रबन्धन कोर्स चलाने की जगह प्रधानाध्यापकों एवं प्रबंधकों को पाठ्यचर्या को तनावमुक्त करने एवं अभिभावकों को यह सुझाव देने की आवश्यकता है कि बच्चों के स्कूल के बाहर जो जीवन है उसे तनावमुक्त करें. स्कूलों में सभी प्रकार के शारीरिक दंडों को रोकने की सख्त जरूरत हैं.

कक्षा में शान्ति बनाए रखने से सम्बन्धित जो नियम होते है कि एक बार में एक बच्चा बोले या तभी बोलो जब सही उत्तर पता हो, इस तरह के नियम समानता एवं बराबर अवसर देने के मूल्यों को निर्बल बनाते है और उन्हें पहुंचाते है. ऐसे नियम उन प्रक्रियाओं को भी हतोत्साहित करते है जो बच्चों की सीखने की प्रक्रिया में अंतर्निहित होते हैं और यह सहपाठियों में समुदाय की भावना को विकसित होने से भी रोकते हैं.

अनुशासन ऐसा होना चाहिए कि जो कार्य सम्पन्न करने में मदद करे और बच्चों की क्षमता बढाएं. अनुशासन बच्चों और शिक्षकों के लिए आजादी, विकल्प एवं स्वायत्तता बढ़ाने वाला होना चाहिए. गृहकार्य में स्कूल के कार्य के अतिरिक्त अलग तरह की गतिविधियाँ बच्चों के करने के लिए होनी चाहिए. जो कि वे स्वयं कर पाए या अपने अभिभावकों की मदद से कर पाए. उनसे अभिभावकों को यह बेहतर रूप से समझने का मौका मिलेगा कि उनका बच्चा विद्यालय में क्या सीख रहा हैं. इससे बच्चों में खोजबीन करने में और स्कूल के बाहर की दुनिया को अधिगम का स्रोत मानने में शुरूआती प्रोत्साहन मिलेगा.

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 शिक्षण विधि Ncf 2005 teaching methods in hindi

  • करके सीखना
  • निरिक्षण करके सीखना
  • परीक्षण करके सीखना
  • सामूहिक विधि से सीखना
  • मिश्रित विधि द्वारा सीखना

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 के अनुसार स्कूली शिक्षा का स्वरूप According to Ncf 2005 type of schooling

बाल अधिकारों की सुरक्षा एवं सुलभता की व्यवस्था होनी चाहिए. बच्चों के सभी प्रकार के विकास की पहली शर्त यह है उनका स्वस्थ शारीरिक विकास के लिए उनका पौष्टिक आहार, व्यायाम तथा दूसरी सामाजिक, मनोवैज्ञानिक जरूरते पूरी की जानी चाहिए. बच्चों की मातृभाषा को रोकने या उनको मिटाने का प्रयास उनके व्यक्तित्व में हस्तक्षेप करना हैं. प्राथमिक स्तर पर बच्चों की भाषाओं को बिना सुधारे ही उसी रूप में स्वीकार करना चाहिए जिस रूप में वे होते हैं. कक्षा 4 के बाद अगर सम्रद्ध और रुचिकर मौके दिए जाए तो बच्चें स्वयं भाषा के मानक रूप ग्रहण कर लेते हैं. इस प्रक्रिया में गलतियाँ सीखने का हिस्सा बन जाती हैं.

कहानी, कविता, गीत और नाटक हमारे संस्कृतिक धरोहर तो हैं ही उनके माध्यम से बच्चे व्याकरण भी आसानी से सीख सकते हैं. उबाऊ ढंग से व्याकरण सीखने के नियम बताने की बजाय. हमें कक्षाओं में बहुभाषी वातावरण बनाना होगा, और माध्यमिक कक्षाओं में किसी विदेशी भाषा का.

सभी भाषाओं के शिक्षण में उपयुक्त रोचक तरीके और सामग्री इस्तेमाल होनी चाहिए. ऐसी पुस्तक महत्वपूर्ण होती है जो केवल तथ्यात्मक जानकारी न देकर अन्तः क्रिया के मौके दे. सामग्री के साथ बच्चों को खुद एवं सहपाठियों के साथ कार्य करने के मौके दिए जाने चाहिए. सम्पूर्ण समूह आधारित योजना बनाने के मौके देने चाहिए. जैसे कहानी सुनना, नाटक आदि जिसके आधार पर बच्चें विविध गतिविधियाँ कर सके.

शिक्षक एवं विद्यार्थी दोनों ही पुस्तकालय को अधिगम आनन्द एवं तन्मयता के साधन के रूप में इस्तेमाल करे. किताबों एवं पत्रिकाओं के अलावा पुस्तकालय में सूचना तकनीक के नयें आयामों की स्थापना होनी चाहिए. ताकि विद्यार्थी विश्व से जुड़ पाए. विद्यालय में सप्ताह में एक घंटा पुस्तकालय अध्ययन को दिया जाना चाहिए. बच्चें स्वयं पुस्तक चुने न कि शिक्षक पुस्तक बांटे.

माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक स्तर पर सुन, समझ और पढकर नोट्स तैयार करने का अभ्यास कराया जाना चाहिए उसमें पाठ्यपुस्तकों और कुंजी से नकल करने की प्रवृत्ति हतोत्साहित होगी. पत्र लेखन और निबंध लेखन की घिसी पिटी गतिविधियों पर रोक लगाकर शिक्षा में कल्पना और मौलिकता को जगह दी जानी चाहिए. भाषा शिक्षण के द्वारा बच्चों के अपने सोच विचार और आलोचनात्मक दृष्टि को भी विकसित किया जा सकता हैं. गणित शिक्षा बच्चों की गणितीय करण की क्षमताओं का विकास जैसे संख्या, संक्रिया, मापन, दशमलव, प्रतिशत इसमें अगला कदम हैं. बच्चों के गणितीय साधनों को विकसित करना ताकि ये गणितीय मान्यताओं से तार्किक परिणाम निकाल सके.

भारत में कला संस्कृति विविधता का जीता जागता उदाहरण हैं इसमें उनके लोक व शास्त्रीय गायन, नृत्य, संगीत, पुतले बनाना व मिट्टी का काम आदि हैं. इसमें किसी भी कला का अध्ययन विद्यार्थियों के ज्ञान को सम्रद्ध करेगा. जीवन भर उनके काम आएगा. कला शिक्षा के माध्यम से बच्चों को अपने आप विकसित होने का मौका देना चाहिए. उस पर अधिक जोर नहीं डाला जाना चाहिए. मीड डे मील कार्यक्रम और स्वास्थ्य जांच को पाठ्यचर्या का अनिवार्य भाग बनाया जाना चाहिए.

काम मानव जीवन को समृद्ध बनाता है यह ज्ञान, अनुशासन और आनन्द के नये क्षितिज खोजता हैं. आवास की समस्या को अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को अपने जीवन जोड़ा जाए क्योंकि वे अपनी जीविका के लिए प्राकृतिक जैव विविधता का आश्रय लेते हैं. विद्यार्थी उनके जीवन का अवलोकन व अभिलेखन करें.

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