असहयोग आंदोलन पर निबंध – Essay On Non-Cooperation Movement in Hindi

Essay On Non-Cooperation Movement in Hindi: महात्मा गांधी ने भारत की स्वतन्त्रता के लिए कई आंदोलनों का नेतृत्व किया था, जिनमें खेड़ा, चम्पारण, सविनय अवज्ञा, असहयोग, भारत छोड़ो आंदोलन मुख्य थे. आज के लेख में गांधीजी के असहयोग आंदोलन पर निबंध को विस्तार से जानेगे तथा असहयोग आंदोलन की शुरुआत, महत्व, कारण, परिणाम, विभिन्न पहलुओं पर लेख बता रहे हैं.

Essay On Non-Cooperation Movement in Hindi

असहयोग आंदोलन पर निबंध - Essay On Non-Cooperation Movement in Hindi

असहयोग आंदोलन निबंध (non cooperation movement in hindi )

रौलट एक्ट, जलियांवाला बाग़ हत्याकांड, अंग्रेजों की दमनकारी नीति आदि के विरुद्ध 1929 में गांधीजी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया. इसके अंतर्गत सरकारी स्कूलों कोलेजों का बहिष्कार, न्यायालयों का बहिष्कार, सरकारी दरबारों तथा उत्सवों, उपाधियों का बहिष्कार, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करने पर बल दिया गया.

गांधीजी के आव्हान पर लाखों देशभक्त आंदोलन में कूद पड़े. विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया गया, तथा विदेशी वस्त्रों की होली जलाई गई. इस आंदोलन में हजारों मुसलमानों तथा हिन्दुओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया. अनेक वकीलों ने वकालत छोड़ कर आंदोलन में भाग लिया.

ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन को कुचलने के लिए दमनकारी नीति अपनाई अनेक प्रमुख नेताओं को बंदी बना लिया गया. 1921 के अंत तक लगभग 60 हजार व्यक्तियों को जेलों में बंद कर दिया गया. सरकार की दमनकारी नीति के बावजूद लोगों ने आंदोलन जारी रखा.

जब असहयोग आंदोलन अपनी चरम सीमा पर था, 5 फरवरी 1922 को चौरी चौरा नामक स्थान पर सत्याग्रहियों और पुलिस में मुठभेड़ हो गई. कुछ भीड़ ने पुलिस थाने के आग लगा दी. जिससे एक थानेदार तथा 21 सिपाही जीवित जल कर मर गये. इस पर गांधीजी ने असहयोग आंदोलन को स्थगित कर दिया.

इस असहयोग आंदोलन ने राष्ट्रीय आंदोलन को जन आंदोलन को जन आंदोलन का रूप प्रदान किया. इसने राष्ट्रीयता का प्रसार किया, स्वदेशी को प्रोत्साहन मिला और देशवासियों में साहस, निर्भीकता, निडरता की भावनाओं का प्रसार किया. असहयोग आंदोलन के कारण देशवासियों में राजनीतिक अधिकारों के लिए जागरूकता उत्पन्न हुई तथा स्वराज्य की मांग प्रबल हुई. अब स्वराज्य का संदेश घर घर पहुँचने लगा तथा बच्चे बच्चे के मुहं में स्वराज्य का शब्द सुनाई देने लगा.

असहयोग आंदोलन पर निबंध, Essay On Non-Cooperation Movement in Hindi

सितम्बर 1920 में कलकत्ता कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन सम्बन्धी प्रस्ताव रखा जो भारी मतों से स्वीकृत हो गया. दिसम्बर 1920 में नागपुर अधिवेशन में गांधीजी का प्रस्ताव पुनः भारी बहुमत से स्वीकृत हो गया. अधिवेशन में एक प्रस्ताव पास कर गांधीजी को शांतिमय और अहिंसक आंदोलन के समस्त अधिकार दे दिए गये. असहयोग आंदोलन के कार्यक्रमों को दो भागों में विभाजित किया जा सकता हैं.

निषेधात्मक कार्यक्रम या साधन– असहयोग आंदोलन के प्रमुख निषेधात्मक कार्यक्रम इस प्रकार थे.

  1. सरकारी उपाधियाँ और अवैतनिक पद छोड़ दिए जाएगे.
  2. स्थानीय संस्थाओं के नामजद सदस्य त्याग पत्र दे दे.
  3. सरकारी दरबारों, उत्सवो तथा भोजों में शामिल न हुआ जाए
  4. सरकारी स्कूल तथा कॉलेजों का बहिष्कार किया जाए तथा जनता की पंचायतों की स्थापना की जाए.
  5. सरकारी न्यायालयों का धीरे धीरे बहिष्कार किया जाए तथा जनता की पंचायत बनाई जाए.
  6. सरकारी कार्य के लिए तथा सैनिक व असैनिक भर्ती के लिए कोई भारतीय अपनी सेवाएं अर्पित न करें.
  7. विधानसभाओं का बहिष्कार किया जाए.
  8. विदेशी माल तथा कपड़े का बहिष्कार किया जाए तथा स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग किया जाए.

सकारात्मक कार्यक्रम या साधन– असहयोग आंदोलन के निषेधात्मक कार्यक्रम के अतिरिक्त उसका एक सकारात्मक पक्ष भी था, जिसमें निम्नलिखित बातें थी.

  1. राष्ट्रीय स्कूलों और कॉलेजों की स्थापना
  2. पारस्परिक विवाद तय करने के लिए जनता की पंचायतों का उपयोग
  3. बड़े पैमाने पर स्वदेशी प्रचार
  4. हथकरघा और बुनाई उद्योग का जीर्णोद्धार करना
  5. अस्प्रश्यता का अंत करना
  6. हिन्दू मुस्लिम एकता को बढ़ावा देना.

असहयोग आंदोलन का महत्व (Importance of non-cooperation movement)

असहयोग आंदोलन के महत्व को निम्न बिन्दुओं में समझा जा सकता हैं.

  • गांधी के असहयोग आंदोलन ने देश की जनता में एकता की भावना का संचार किया. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सदस्यता व्यापक हो गई. पूरे देश में एक भी स्थान ऐसा नहीं था जहाँ इस आंदोलन का प्रभाव न पड़ा हो. हर वर्ग का व्यक्ति इस आंदोलन से जुड़ गया था. यह आंदोलन असफल होने के बाद भी भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में महत्वपूर्ण स्थान रखता हैं.
  • असहयोग आंदोलन ने राष्ट्रीय आंदोलन को एक जन आंदोलन का रूप प्रदान किया. अब राष्ट्रीयता कुछ गिने चुने व्यक्तियों की विरासत समझी जाती थी, लेकिन असहयोग आंदोलन के प्रभाव से यह सर्वसाधारण की सम्पति बन गई. इस आंदोलन ने भारतीय जनता को अपने पैरों पर खड़ा होना सिखाया.
  • इस आंदोलन ने कांग्रेस को मध्यवर्गीय संस्था के स्थान पर साधारण नागरिकों की संस्था बना दिया. सरकार की सत्ता को मानने से इनकार करना, अत्याचारी कानून का विरोध करना और सीधी कार्यवाही का सहारा लेना साधारण सी बात बन गई.
  • असहयोग आंदोलन ने राष्ट्रीय भावनाओं का विकास किया. भारतीय एक झंडे के अधीन आ गये. स्वदेशी वस्तुओं से प्रेम भारतीयों के लिए एक राष्ट्रीयता का प्रतीक बन गया. चरखा और खद्दर राष्ट्रीय चिह्न बन गये.
  • इस आंदोलन ने साधारण जनता को निर्भीक बनाया. पहले जनता सरकार का विरोध करने में बहुत घबराती थी, जेलों से डरती थी. लेकिन इस आंदोलन से जनता निर्भीक हो गई. अब सार्वजनिक सभाओं में सरकार की आलोचना एक साधारण बात हो गई. इससे राष्ट्रीय चेतना का तेजी से प्रसार हुआ.
  • असहयोग आंदोलन से खादी स्वतन्त्रता सेनानियों के सिपाहियों की पोशाक बन गई. इससे खादी का प्रचार हुआ जिससे हजारों जुलाहों को जीविका कमाने का साधन प्राप्त हुआ. इससे स्वदेशी के प्रति लोगों में भावनाएं विकसित हुई. इन सबने मिलकर ब्रिटिश शासन की नींव हिला दी.
  • इस आंदोलन का एक अन्य लाभ यह हुआ कि जब तक आंदोलन चलता रहा, सरकार ने सहयोगी रुख अपनाए रखा तथा 1919 के सुधारों को उदारतापूर्वक क्रियान्वित किया.

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