जैविक खेती पर निबंध | Essay On Organic Farming In Hindi

Essay On Organic Farming In Hindi: नमस्कार दोस्तों आपका स्वागत है आज हम जैविक खेती पर निबंध लेकर आए हैं. जैविक कृषि पर इस निबंध, भाषण, अनुच्छेद, लेख के माध्यम से हम जानेंगे कि ऑर्गेनिक फार्मिंग क्या होती है इसका अर्थ, इतिहास, लाभ व महत्व की चर्चा यहाँ हम इस निबंध में करेंगे.

जैविक खेती पर निबंध | Essay On Organic Farming In Hindi

जैविक खेती पर निबंध Essay On Organic Farming In Hindi

हमारा भारत कृषि प्रधान देश है जिसकी अधिकतर जनसंख्या खेती को अपना आजीविका निर्वहन के साधन के रूप में प्रयोग में लाती हैं. आज से कुछ दशक पूर्व तक के समय में की जाने वाली और आज की खेती में बड़ा बदलाव आया हैं. यह बदलाव कृषि की तकनीक, साधनों एवं रासायनिक उर्वरकों के रूप में समझा जा सकता हैं. हरित क्रांति के नाम पर शुरू किया गया कृषि अभियान इसी का एक हिस्सा था. पारम्परिक तरीके की कृषि जो आज भी भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में की जाती है उसे जैविक खेती कहा जाता हैं.

जैविक खेती (Organic farming) का अर्थ खेती करने की उस विधि से है जिसमें किसी प्रकार के रासायनिक उर्वरक एवं कृत्रिम खाद या कीटनाशक छिडकाव का उपयोग न के बराबर किया जाता हैं. जैविक खेती में भूमि की उर्वरता को बनाएं रखने के लिए रासायनिक उर्वरकों के उपयोग की बजाय फसल चक्र, हरी खाद और कम्पोस्ट या जीव जन्तुओं की जैविक खाद का ही प्रयोग किया जाता हैं.

जिस तरह से जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है कृषि पर बढ़ती निर्भरता व अधिकाधिक उत्पादन के लिए किसानों ने रासायनिक खेती के स्वरूप को अपनाया. इससे पैदावार में बढ़ोतरी तो हुई मगर यह पर्यावरण एवं मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं. यही वजह है कि 1990 के बाद से जैविक खेती की मांग उत्तरोतर बढ़ती गई.

जैविक खेती की जानकारी Organic farming information in hindi

आपने विद्यार्थी जीवन में आर्गेनिक केमेस्ट्री तो पढ़ी होगी, लेकिन क्या कभी ऑर्गेनिक फ़ूड खाया है. सवाल उलझन भरा हो सकता हैं. हरी भरी सब्जी, स्वादिष्ट अनाज कैसे कैसे रासायनिक कीटनाशकों की मदद से उगाया पकाया होगा. यह कोई नहीं जानता. लेकिन लोगों का रुझान धीरे धीरे जैविक आहार की तरफ बढने लगा हैं.

देश के कई किसान खुद की दवाई खाद और विषरहित जैविक अनाज की मानसिकता के साथ प्राकृतिक संसाधनों का इस्त्मोल कर कृषि उत्पादन कर रहे हैं. खाद्य पदार्थों में मौजूद रासायनिक तत्व मानव शरीर के लिए घातक होते हैं. शोध बताते है कि इन तत्वों से मनुष्य में किडनी रोग, ह्रदय रोग, दमा, कैंसर, सिरदर्द जैसे रोग हो सकते है, महंगे होते रासायनिक कीटनाशकों को खरीदना किसानो को भारी पड़ने लगा हैं. इस कारण अब उनका रुझान भी रासायनिक खेती से जैविक खेती की ओर बढ़ा हैं.

इस पद्धति में खेती में बोई जाने वाली फसलों पर कृत्रिम रासायनिक दवाइयों का उपयोग नहीं किया जाता हैं. जैविक खाद, गोमूत्र, पुरानी छाछ, नीम व अन्य पत्तियों से तैयार किये गये प्राकृतिक कीटनाशक फसलों पर छिडके जाते हैं इससे जैविक उत्पाद भी पौष्टिक व ज्यादा स्वादिष्ट होता हैं.

जैविक खेती के उद्देश्य (Organic farming information):

कृषकों को जैविक खेती के लिए प्रोत्साहित करने का मूल उद्देश्य भूमि की उर्वरा शक्ति को नष्ट होने से बचाने तथा दूसरा सबसे महत्वपूर्ण मानव स्वास्थ्य पर रासायनिक पदार्थों के दुष्प्रभाव को कम करना. ऐसे कीटनाशक तैयार किये जाए जो मृदा में अघुलनशील हो तथा खरपतवार व हानिकारक जीवाणुओं को मिटाने में कारगर हो. इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए नाइट्रोजन से जैविक खाद तथा कार्बनिक पदार्थों को पुनः उपयोगी बनाया जाता हैं.

जैविक कृषि किसान के लिए सबसे उपयुक्त मानी गयी है जिसके चलते वह पालतू जानवरों की देखभाल कर सकेगा, उनके जीवन स्तर तथा रखरखाव में मदद मिलेगी. जैविक कृषि का एक अहम लक्ष्य पर्यावरण पर रासायनिक प्रभावों को कम करना तथा प्रकृति के साथ बिना छेड़छाड़ किये सहजीवी बनकर इसकी सुरक्षा करना हैं.

जैविक खेती से होने वाले लाभ (Organic farming Benefits)

यदि हम जैविक खेती के फायदे की बात करे तो यह बहुआयामी हैं. इसका प्रत्यक्ष एवं तत्कालीन लाभ कृषक को दो तरह से मिलता हैं. पहला उनके स्वास्थ्य तथा पर्यावरण को तथा दूसरा किसान की भूमि को. जैविक खेती के लिए प्राकृतिक खाद का उपयोग करने से भूमि का उपजाऊपन तो बढ़ता ही है साथ ही सिंचाई चक्र की अवधि भी बढ़ जाती हैं.

जैविक खेती करने से किसान को आर्थिक लाभ भी होगा. आज जहाँ रासायनिक उर्वरकों तथा कीटनाशको की कीमतें इतनी बढ़ चुकी है कि किसान ऋणग्रस्त होकर खेत में बुवाई करता हैं. ऐसे में यदि वह इस रासायनिक खाद के साथ पर पशुओं, पेड़ों पौधों के अवशेषों से निर्मित जैविक ख़ाद का उपयोग करे तो कृषि की लागत भी कम आएगी और किसान का जीवन भी खुशहाल हो सकेगा.

निरंतर केमिकल फर्टिलाइजर के उपयोग से भूमि की उत्पादन क्षमता कम हो जाती है साथ ही भूमि के जल स्तर में भी कटौती होती जाती हैं. जैविक खाद के प्रयोग से बम्फर उत्पादन भी होगा, भूमि की जलधारण क्षमता बढ़ेगी तथा हमारे पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाया जा सकता हैं. जैविक खेती पूरी तरह पर्यावरण मित्र होती हैं.

जैविक खेती (ऑर्गेनिक फार्मिंग) की आवश्यकता व महत्व

भारत ही नहीं समूचे संसार में आज तेजी से बढ़ती जनसंख्या एक गम्भीर समस्या बन चुकी हैं. अधिक जनआबादी के भोजन के लिए अधिक अन्न, फल, सब्जियां उत्पादन के लिए किसान अपने खेतों में नाना प्रकार के रसायन, कृत्रिम खाद और जहरीले कीट नाशकों का उपयोग करते हैं. इससे प्रकृति के संतुलित सघटन जैविक व अजैविक पदार्थों के पारिस्थितिकी तंत्र को बुरी तरह प्रभावित करता हैं. तय सीमा से अधिक मात्रा में रसायनों के उपयोग से भूमि की उर्वरा क्षमता समाप्त होकर बंजर का रूप ले लेती हैं. खेतों में प्रयुक्त रसायनों से पर्यावरण भी प्रदूषित होता है इसका सीधा सम्बन्ध मानव स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ हैं.

आजादी के समय तक भारत में अन्न की व्यापक कमी का दौर था. उस समय तक प्राचीन परम्परागत कृषि का स्वरूप चलन था, सरकारी नीतियों के चलते न तो किसान को कोई मदद मिलती थी न हि उनका कोई मददगार था. ऐसे में जब ६० के दशक में हरित क्रांति का प्रादुर्भाव हुआ तो किसान उत्तरोतर लाभ के लिए अपनी उपजाऊ जमीन में भी रसायनों के प्रयोग से अधिक पैदावार करने लगे. जहाँ एक बीघा में किसान एक किव्टल उर्वरक डालता था अब वह तीन किव्टल डालकर अधिक पैदावार तो करने लगा मगर यह लाभ तात्कालिक ही था, कालान्तर में उसकी भूमि बंजर में बदलने लगी.

पुराने जमाने में खेती का जो स्वरूप प्रचलन में था उसमें मनुष्य के स्वास्थ्य तथा प्रकृति के वातावरण का पूरा पूरा ख्याल रखा जाता था. परम्परागत जैविक खेती से जैविक व अजैविक घटकों का सामजस्य बना रहा, यही कारण है उस समय जल, वायु या मृदा प्रदूषण की समस्या ने जन्म नहीं लिया. हमारा भारत गायों का देश था हर घर में गाय का पालन किया जाता था. गाय और बैल किसान के मित्र समझे जाते थे. मगर आज यांत्रिक कृषि ने इन्हें मनुष्य से दूरी बना दिया हैं. परिणामस्वरूप खेतों में जैविक खाद के स्थान पर रासायनिक खाद का प्रयोग बड़े पैमाने पर किया जाने लगा.

भारतीय किसान अब फिर से जैविक कृषि की ओर उन्मुख हुए है. भारत में सर्वप्रथम मध्यप्रदेश में 2001-02 में प्रत्येक ब्लोक पर ऑर्गेनिक खेती को आरम्भ किया गया तथा उन गाँवों को जैविक गाँव कहा गया. इस अभियान की शुरुआत के प्रथम वर्ष में ही 300 से अधिक गाँवों ने रासायनिक खेती का त्याग कर जैविक कृषि को चुना. अगले ही साल ब्लोक स्तर पर दो दो गाँवों को प्रेरित किया गया और इस वर्ष 1500 गाँवों के किसान जैविक खेती करने लगे. तीन वर्ष के अंतराल के पश्चात जैविक गाँव के आन्दोलन को 2006 में फिर से आरम्भ किया और इस बार ब्लोक स्तर पर 5-5 गाँव चुने गये इस प्रकार तीन हजार गाँवों ने इस कार्यक्रम में हिस्सा लिया और जैविक खेती को अपनाया.

जैविक कृषि : स्वास्थ्य के लिये लाभकारी

आज से 18 साल पहले जैविक खेती का भारत में सफल प्रयोग हुआ, एक किसान आन्दोलन के रूप में मध्यप्रदेश में इसे पूर्ण सफलता मिली. भारत के साथ साथ पश्चिम के देशों को भी इस पहल को आगे बढ़ाना चाहिए, मगर इस अभियान से जुड़ा प्रश्न यह भी है कि क्या सम्पूर्ण देश में जैविक खेती को पुनर्जन्म दिया जा सकता हैं. हमारे देश में कृषि के लिए पर्याप्त उपजाऊ भूमि है, कुल भूक्षेत्र के 60 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र पर कृषि की जाती हैं. देश की 58 प्रतिशत जनसंख्या का रोजगार क्षेत्र भी कृषि हैं.

यदि जैविक कृषि के लिए एक स्वस्थ कृषि पद्धति जन्म लेती है अथवा नयें युग व साधनों के अनुरूप अच्छी कृषि व्यवस्था का जन्म होता है तो देश व दुनियां की पैदावार तथा स्वास्थ्य सूचकांक में बदलाव अपेक्षित हैं. इस क्षेत्र में कार्य करने वाले शोध कर्ताओं का विश्वास है कि जैविक कृषि के सम्बन्ध में असीम सम्भावनाएं हैं. पश्चिम के देशों के लिए यह एक नवीन व्यवस्था है जिसमें किसान रुचिकर हैं. मगर भारत के विषय में एक लुप्त पुरातन व्यवस्था को पुनर्जीवित करना हैं. सिक्किम वर्ष 2016 में देश का प्रथम जैविक राज्य बना था. यहाँ के कृषकों ने 75,000 हेक्टेयर कृषि भूमि पर जैविक प्रथाओं एवं जैविक कृषि पद्धतियों से पैदावार प्राप्त की. जिसमें किसी प्रकार के रसायन का खाद, कीटनाशक या अन्य रूप में उपयोग नहीं किया गया था.

सिक्किम की तर्ज पर देश में जैविक क्रांति को आरम्भ किया जा सकता हैं इसके लिए रासायनिक कृषि उत्पादों व रोक तथा किसानों को प्रशिक्षण व प्रोत्साहन देने की आवश्यकता हैं. इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ ऑर्गेनिक एग्रीकल्चर मोमेंट ने भारत को जैविक खेती अपनाने वाले शीर्ष दस देशों में नौवा स्थान दिया हैं. हमारे देश में अबाधित रसायनिक खेती के पीछे का कारण ज्ञान का अभाव हैं. एक आम किसान को इनके हानिकारक प्रभाव के सम्बन्ध में जानकारी नहीं हैं. वह यह भी नहीं जानता कि इस कार्य में वह अपने पैरों पर ही कुल्हाड़ी मार रहा हैं.

Kishan Chandra #OrganicFarming on Green TV

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