परशुराम पर निबंध | Essay On Parshuram In Hindi

Essay On Parshuram In Hindi: नमस्कार दोस्तों आज हम भगवान महर्षि परशुराम पर निबंध लेकर आए हैं. निबंध, भाषण, अनुच्छेद में हम भगवान परशुराम जयंती, इतिहास, जीवनी, कथा, जीवन परिचय के बारें में विस्तार से जानेगे, आप इसे पढ़ने के बाद जान पाएगे कि परशु राम कौन थे उनकी प्रतिज्ञा व कार्य क्या थे आदि.

Essay On Parshuram In Hindi

Essay On Parshuram In Hindi

परशुराम त्रेता युग के एक ऋषि थे, उनका जन्म भृगुवंश में हुआ था. उनके पिता का नाम जमदग्नि तथा माता का नाम रेणुका था. महर्षि जमदग्नि द्वारा आयोजित पुत्रेष्टि यज्ञ से प्रसन्न होकर देवराज इंद्र के वरदान के फलस्वरूप रेणुका के गर्भ से वैशाख शुक्ल तृतीया को उनका जन्म हुआ था. वे अपने माता पिता की पाँचवी संतान थे  उन्हें विष्णु के छठे अवतार आवेशा वतार के रूप में जाना जाता हैं.

जन्म के पश्चात उनके पितामह ने उनका नामकरण संस्कार कर उनका नाम रामभद्र रखा. जमदग्नि का पुत्र होने के कारण उन्हें जामदग्नेय तथा भृगु वंश में जन्म लेने के कारण भार्गव नाम से जाना जाता हैं. परशुराम सदा अपने से बड़ो व माता पिता का सम्मान करते थे तथा उनकी आज्ञा का पालन करते थे.

परशुराम की प्रारम्भिक शिक्षा उनकी माता रेणुका द्वारा आश्रम में ही सम्पन्न हुई. उनका लालन पालन आश्रम में प्रकृति के सुरम्य वातावरण में हुआ था. अतः उनका प्रकृति एवं पशु पक्षियों के साथ जीवंत सम्बन्ध था. वे पशु पक्षियों की बोली को समझते थे. तथा उनसे बात करने में भी पारंगत थे. परशुराम अपने व्यवहार से कई हिंसक वन्य प्राणियों को भी अपना मित्र बना लेते थे.

तत्पश्चात उन्होंने महर्षि विश्वामित्र और महर्षि ऋचीक के आश्रम में रह कर शिक्षा प्राप्त की, उनकी योग्यता से प्रभावित होकर महर्षि ऋचिक ने उन्हें अपना सारंग नामक दिव्य धनुष तथा महर्षि कश्यप ने वैष्णवी मंत्र प्रदान किया. वे परम शिव भक्त थे, उन्होंने कैलास पर्वत कर कठोर तपस्या की तथा भगवान शिव को प्रसन्न कर उनसे विदुयदभि नामक परशु प्राप्त किया और वे रामभद्र से परशुराम कहलाएँ.

परशुराम जगत में वैदिक संस्कृति का प्रचार प्रसार करना चाहते थे. उन्होंने स्वयं ब्राह्मण होते हुए भी शस्त्र धारण करके क्षत्रियोचित व्यवहार कर वर्ण व्यवस्था की इस धारणा को मिथ्या साबित किया कि मनुष्य का वर्ण जन्म से निर्धारित होता है कर्म से नहीं. परशुराम शस्त्र विद्या में पारंगत आचार्य थे. कौरव कुलगुरु आचार्य द्रोण पितामह भीष्म तथा अंगराज कर्ण उनके प्रमुख शिष्य थे. वे स्वयं बहुत शक्तिशाली थे.

परशुराम नारी के सम्मान के प्रति कटिबद्ध थे. उन्होंने ऋषि अत्रि की पत्नी अनुसूया, अगस्त्य की पत्नी लोपमुद्रा के साथ नारी जागृति हेतु प्रयास किया. महाभारत काल में गंगा पुत्र भीष्म ने जब काशीराज की पुत्री अम्बा का अपहरण कर लिया था तो उसके सम्मान की रक्षा के लिए उन्होंने भीष्म से भी युद्ध किया तथा पुरुषों के लिए एक पत्नी धर्म का संदेश दिया.

त्रेता युग में सीता स्वयंवर के दौरान श्रीराम ने जब शिवजी के धनुष को तोड़ा तो उसकी गर्जना पूरे ब्रह्मांड में फ़ैल गई. शिव धनुष की गर्जना सुनकर परशुराम मिथिला पहुंचे और टूटे हुए शिव धनुष को देखकर बहुत क्रोधित हुए. इस विषय पर उनका श्रीराम के अनुज लक्ष्मण के साथ विवाद भी हुआ, लेकिन जब उन्हें ज्ञात हुआ कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने धनुष भंग किया है तब जाकर उनका क्रोध शांत हुआ और वे अपना धनुष श्रीराम को सौंप कर शांत भाव से वहां से चले गये.

परशुराम परम गौ भक्त भी थे. महिष्मती के हैहयवंशीय शासक कार्तवीर्यार्जुन ने कठोर तपस्या से भगवान दत्तात्रेय को प्रसन्न कर एक सहस्त्र भुजाओं का बल तथा अपराजेय होने का वर प्राप्त किया. सहस्त्र भुजाएं होने के कारण उसे सहस्त्रबाहु भी कहा जाने लगा. अपनी शक्ति के अहंकार में सहस्त्रबाहु ने ऋषि जमदग्नि के आश्रम से देवराज इंद्र द्वारा प्रदत्त कपिला कामधेनु का हरण कर लिया. परशुराम को इस घटना का पता चला तो वे अत्यंत क्रोधित हुए और उन्होंने सहस्त्रबाहु का संहार कर कपिला कामधेनु को सम्मान के साथ वापिस आश्रम ले आए.

परशुराम दानवीर भी थे. हैहयवंशीय राजाओं को परास्त कर उन्होंने अश्वमेध यज्ञ किया तथा सम्पूर्ण भूमि महर्षि कश्यप को दान में दे दी. इसके पश्चात उन्होंने अपने अस्त्र शस्त्र त्याग दिए और महेंद्र पर्वत पर आश्रम बनाकर तपस्या करने लगे. प्राचीन इतिहास एवं पुराणों के अनुसार ऐसा माना जाता है कि संसार में सात ऐसे महापुरुष है जो चिंरजीवी है तथा सभी दिव्य शक्तियों से सम्पन्न है उनमें परशुराम भी एक हैं तथा आज भी वे महेंद्र पर्वत पर विद्यमान हैं. इनका प्रातः स्मरण करने से मनुष्य दीर्घायु तथा निरोग रहता हैं.

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