राजनीति और नैतिकता पर निबंध | Essay on politics and ethics In Hindi

राजनीति और नैतिकता पर निबंध | Essay on politics and ethics In Hindi

राजनीति और नैतिकता: अब वक्त आ गया है जब राजनीतिक दलों को भूमि भवन व अन्य सुविधाएं देने के मापदंड चुनाव में प्रदर्शन के आधार पर तय कर ठोस नीति बनाई जाए.

सार्वजनिक सम्पतियों पर राजनीतिक दलों के अवैध कब्जों के किस्से नये नहीं हैं. पारदर्शिता की बाते भले ही बड़ी बड़ी होती हो लेकिन हकीकत यह है कि चुनावी चंदे से लेकर अपने दफ्तरों के लिए सार्वजनिक सम्पतियों पर कब्जों को लेकर ये दल सबसे ज्यादा बदनाम रहते हैं.

राजनीति और नैतिकता पर निबंध Essay on politics and ethics In Hindi

शायद यही वजह है कि त्रिपुरा हाईकोर्ट ने लम्बे समय से काबिज होने का आधार बनाकर सार्वजनिक सम्पति पर राजनीतिक दलों के अवैध कब्जे पर हैरानी जताते हुए इसे अनैतिक करार दिया हैं. कोर्ट ने यह भी कहा है कि क्यों नहीं सार्वजनिक सम्पति पर अवैध रूप से काबिज दलों को बेदखल कर दिया जाए.

वैसे तो यह प्रकरण त्रिपुरा का हैं. लेकिन राजनीतिक दलों के सार्वजनिक सम्पति पर कब्जों के ऐसे उदाहरण कमोबेश देश के हर प्रान्त में हैं. कहीं दफ्तरों के नाम आवटिंत सरकारी बंगलों को अलग से जमीन आंवटन के बावजूद राजनीतिक दल उन्हें खाली नहीं कर रहे तो दिवंगत राजनेताओं को आवंटित बंगलों से उनके परिजनों का मोह नहीं छूट रहा.

एक दौर था जब राजनीति में मिशन का भाव होता था. राजनीतिक दलों के दफ्तर भी नेताओं के घर या दानदाताओं की दी हुई जगह पर होते थे. जैसे जैसे ये दल सत्ता पर काबिज होते गये, अपने हित को साधने वाले कानून कायदे भी बनाने लगे. ज्यादा तर मामलों में इन नियम कायदों को भी ताक पर रखकर सरकारों बंगलों पर अवैध कब्जे होने लगे.

आंध्रप्रदेश में तो पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने मुख्यमंत्री रहते हुए अवैध रूप से जनसुनवाई केंद्र भी बनवा लिया था, जिसे मौजूदा सरकार को ध्वस्त करवाना पड़ा. देश की राजधानी में पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरणसिंह के लिए आवंटित बंगले को खाली कराने में सरकार को काफी मशक्कत करनी पड़ी थी.

इतना ही नहीं राजस्थान में तो पूर्व मंत्रियों व विधायकों से सरकारी बंगले खाली करवाने के लिए कानून का सहारा लेना पड़ा. ऐसे हालात शर्मसार करने वाले हैं. सुप्रीम कोर्ट के जिस फैसले को आधार बनाकर राजनीतिक दल अपने कब्जे को जायज ठहराने लगे हैं वह सरकारी सम्पतियों पर कब्जों के मामलों में लागू नहीं होता हैं.

दरअसल ऐसे मामलों में कोई भी दल दूध का धुला नहीं हैं. पिछले सालों में सत्ता में रहते हुए राजनीतिक दलों ने मुख्यालयों को कार्पोरेट दफ्तरों की तरह चकाचौंध युक्त बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. हाँ, वे राजनीतिक दल जरुर पीछे रहें, जिन्हें सत्ता सुख या तो कम मिला या मौका ही नहीं मिला.

चुनाव आयोग भी चुनाव के प्रदर्शन के आधार पर राजनीतिक दलों को राष्ट्रीय या राज्य स्तरीय दल का दर्जा देने का फैसला करता हैं. अब समय आ गया हैं कि जब राजनीतिक पार्टियों को कार्यालयों के लिए भूमि, भवन आदि अन्य सुविधाएं देने के लिए मापदंड तय कर कोई ठोस नीति बनाई जाए. शायद ऐसा करने से भारत की राजनीति में नैतिकता जाग जाए.

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