भारत छोड़ो आंदोलन पर निबंध | Essay On Quit India Movement in Hindi

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भारत छोड़ो आंदोलन के कारण, कार्यक्रम व प्रगति तथा परिणाम का विवेचन-क्रिप्स मिशन की विफलता के बाद महात्मा गांधी ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ तीसरा बड़ा आंदोलन छेड़ने का फैसला किया. अगस्त 1942 में शुरू हुए इस आंदोलन को अंग्रेजों भारत छोड़ो का नाम दिया गया.

भारत छोड़ो आंदोलन पर निबंध Essay On Quit India Movement in Hindi

Essay On Quit India Movement in Hindi

अगस्त 1942 में गांधीजी ने अपना तीसरा बड़ा आंदोलन अंग्रेजों भारत छोड़ो प्रारम्भ किया. यह आंदोलन सही मायनों में एक जन आंदोलन था. जिसमें लाखों आम हिंदुस्थानी शामिल थे. इस आंदोलन में युवा वर्ग को बहुत बड़ी संख्या में अपनी ओर आकर्षित किया. उन्होंने अपने कॉलेज छोडकर जेल जाने का रास्ता अपनाया.

जिस दौरान कांग्रेस के नेता जेल में बंद थे. उसी समय जिन्ना तथा मुस्लिम लीग के उनके साथी अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ाने लगे थे. इस आंदोलन के दौरान लीग को पंजाब व सिंध में अपनी पहचान बनाने का अवसर मिला, जहाँ अभी तक उनका कोई खास वजूद नहीं था. इस आंदोलन के दौरान महाराष्ट्र में स्वतंत्र सरकार भी बनी जो 1946 तक चलती रही. इसलिए हम कह सकते हैं कि 1942 का आंदोलन वास्तव में एक जन आंदोलन था.

भारत छोड़ो आंदोलन के कारण– 1942 में गांधीजी द्वारा भारत छोड़ो आंदोलन प्रारम्भ करने के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे.

अंग्रेजों की साम्राज्यवादी नीतिसितम्बर 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हो गया. ब्रिटिश सरकार ने भारत के नेताओं से परामर्श किये बिना ही भारत को भी युद्ध में धकेल दिया. कांग्रेस ने अंग्रेजों को युद्ध में समर्थन देने के लिए दो प्रमुख मांगे प्रस्तुत कीं. युद्ध की समाप्ति के बाद भारत को स्वतंत्रता प्रदान की जाए, युद्धकाल में केंद्र में भारतीयों की राष्ट्रीय सरकार का गठन किया जाए.

ब्रिटिश सरकार ने इन मांगों को ठुकरा दिया. अन्तः 1939 में 8 प्रान्तों में कांग्रेसी मंत्रिमंडलों ने त्याग पत्र दे दिया और उन्होंने अंग्रेजी साम्राज्यवादी नीति के विरुद्ध आंदोलन प्रारम्भ करने का निश्चय कर लिया.

अगस्त प्रस्ताव– 8 अगस्त 1940 को भारत के वायसराय लार्ड लिनलिथगो ने एक घोषणा की, जिसे अगस्त प्रस्ताव कहा गया. लेकिन इसमें न तो राष्ट्रीय सरकार के गठन की बात स्वीकार की गई और न भारत को पूर्ण स्वराज्य देने की घोषणा की गई. अतः कांग्रेस ने अगस्त प्रस्ताव को ठुकरा दिया तथा अंग्रेजों के विरुद्ध आंदोलन करने का निश्चय किया.

क्रिप्स मिशन की विफलता– विश्व युद्ध में कांग्रेस का सहयोग प्राप्त करने की दृष्टि से चर्चित ने अपने एक मंत्री सर स्टेफर्द क्रिप्स को भारत भेजा. क्रिप्स के साथ वार्ता में कांग्रेस ने इस बात कर जोर दिया कि अगर धुरी शक्तियों से भारत की रक्षा के लिए ब्रिटिश शासन कांग्रेस का समर्थन चाहता है

तो वायसराय को पहल अपनी कार्यकारी परिषद में किसी भारतीय को एक रक्षा सदस्य के रूप में नियुक्त करना चाहिए. इसी बात पर वार्ता टूट गई. क्रिप्स मिशन की विफलता के बाद गांधीजी ने अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन शुरू करने का फैसला लिया.

भारत छोड़ो आंदोलन का प्रारम्भ– 8 अगस्त 1942 को मुंबई में कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में गांधीजी का भारत छोड़ो प्रस्ताव पास कर दिया गया. प्रस्ताव में कहा गया कि भारत में ब्रिटिश शासन का तुरंत अंत होना चाहिए. यह भारत तथा मित्र राष्ट्रों की सफलता के लिए आवश्यक हैं. इस अधिवेशन में गांधीजी ने करो या मरो का नारा बुलंद किया.

आंदोलन की प्रगति– सरकार ने भारत छोड़ो आंदोलन की घोषणा के बाद 9 अगस्त 1942 को ही गांधीजी, नेहरूजी आदि अनेक प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया. कांग्रेस को अवैध घोषित कर दिया तथा सभाओं, जुलूसों और समाचार पत्रों पर कठोर प्रतिबंध लगा दिए गये. 

इसके बावजूद सम्पूर्ण भारत में हड़ताले और सरकार विरोधी प्रदर्शन हुए. देशभर के युवा कार्यकर्ता हडतालों और तोड़ फोड़ की कार्यवाहियों के जरिये आंदोलन चलाते रहे. कांग्रेस में जयप्रकाश नारायण जैसे समाजवादी सदस्य भूमिगत प्रतिरोध गतिविधि यों में सबसे ज्यादा सक्रिय थे. पश्चिम में सतारा और पूर्व में मेदिनीपुर जैसे कई जिलों में स्वतंत्र सरकार की स्थापना कर दी गई थी. अहमदाबाद में क्रांतिकारी सरकार की स्थापना हुई.

आंदोलन का अंत– अंग्रेजों ने आंदोलन के प्रति सख्त रवैया अपनाया, फिर भी इस विद्रोह को दबाने में सरकार को सालभर से अधिक समय लगा. लेकिन जयप्रकाश नारायण, डॉ राममनोहर लोहिया, श्रीमती अरुणा आसफ अली आदि भूमिगत होकर आंदोलन चलाते रहे.

भारत छोड़ो आंदोलन का महत्व और परिणाम

इस आंदोलन के निम्न प्रमुख परिणाम निकले

  • भारत में राजनीतिक जागृति– भारत छोड़ो आंदोलन सही मायनों में एक जन आंदोलन था जिसमें लाखों आम हिंदुस्थानी शामिल थे. इसके फलस्वरूप भारत में राजनीतिक जागृति में वृद्धि हुई.
  • राष्ट्रीय आंदोलनों में युवकों का प्रवेश– इस आंदोलन ने युवकों को बड़ी संख्या में अपनी ओर आकर्षित किया. उन्होंने अपने कॉलेज छोड़कर जेल का रास्ता अपनाया.
  • क्रांतिकारी गतिविधियों को प्रोत्साहन– इस आंदोलन ने उग्रवादी ने उग्रवादी एवं क्रांतिकारी गतिविधियों को प्रोत्साहन दिया.
  • मुस्लिम लीग ने पंजाब व सिंध में अपनी पहचान बनाई– आंदोलन के दौरान कांग्रेस के नेता जेल में थे. उसी समय जिन्ना और मुस्लिम लीग के उनके साथी अपना प्रभाव क्षेत्र फैलाने में लगे रहे. इन्ही सालों में लीग को पंजाब और सिंध में अपनी पहचान बनाने का मौका मिला, जहाँ अभी तक उसका कोई ख़ास वजूद नहीं था.
  • जल सेना विद्रोह- इसी आंदोलन के फलस्वरूप 1946 में भारतीय जल सेना ने भी अंग्रेजों के विरुद्ध झंडा खड़ा कर दिया था.

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