राजा राममोहन राय पर निबंध – Essay on Raja Ram Mohan Roy in Hindi

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राजा राममोहन राय पर निबंध – Essay on Raja Ram Mohan Roy in Hindi

Essay on Raja Ram Mohan Roy in Hindi

बंगाल में उन्नीसवीं सदी में जो समाज सुधार की लहर उठी उसे पुनर्जागरण का नाम दिया गया. उन्नीसवीं सदी के शुरूआती समय में बंगाल में बड़ी भीषण प्रथा का प्रचलन था. बंगाल के लोग इसे सती प्रथा कहकर प्रतिष्ठित करने लगे.

सती प्रथा की चर्चा प्राचीनकाल में भी यदा कदा होती थी, मध्यकाल में इसका प्रचलन कुछ ज्यादा बढ़ गया था. पर उन्नीसवीं सदी के बंगाल में तो इसने वीभत्स रूप ले लिया था. कुलीन परिवारों में जोर जबरदस्ती से सती के नाम पर नई विधवा की आहुति दे दी जाती थी. यह बड़ी विकराल परिस्थिति थी, जिसका लोग सती प्रथा की आड़ में पालन किया करते थे.

इस कुरीति के खिलाफ कलकत्ता के राजा राममोहन राय ने एक मुहीम छेड़ी. राम मोहन राय का जन्म बंगाल के राधानगर में एक जमीदार ब्राह्मण परिवार में हुआ था. उन्होंने कई भाषाओं व वैदिक ग्रंथों का अध्ययन किया तथा वैदिक ग्रंथों का साधारण भाषा में अनुवाद किया.

राजा राममोहन राय ने भारत के सभी धर्म ग्रंथों का विश्लेष्ण करके यह बताया कि कहीं भी यह नहीं कहा गया हैं कि स्त्री को अपने पति की मौत पर अपने आप को आग में झोक देना चाहिए. राम मोहन राय ने अपनी बातों के आधार पर अंग्रेजी शासन को भी सहमत होने के लिए बाध्य किया.

वर्ष 1828 में उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर ब्रह्म सभा का गठन किया. अगले साल इसका नाम बदल कर ब्रह्म समाज रखा गया. ब्रह्म समाज के दवाब में आकर अंत में सरकार ने 1829 में एक कानून बनाया, जिसमें सती प्रथा का समर्थन करने वाले को सजा देने का प्रावधान रखा गया. जो लोग स्त्री को सती करने में मदद करते थे. अब उन्हें सख्त सजा दी जाने लगी, बड़ी तेजी से यह कुरीति समाज से खत्म होने लगी.

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