आरक्षण नीति पर निबंध | Essay On Reservation System In Hindi

Essay On Reservation System In Hindi: आज हम बच्चों के लिए आरक्षण नीति पर हिंदी निबंध साझा कर रहे हैं. कक्षा 1,2,3,4,5,6,7,8,9,10 के छोटे बच्चों के लिए यहाँ सरल भाषा में यहाँ पर Essay On Reservation System In Hindi लेकर आए हैं. चलिए जानते है रिजर्वेशन एस्से स्पीच को.

आरक्षण नीति पर निबंध | Essay On Reservation System In Hindi

आरक्षण नीति पर निबंध | Essay On Reservation System In Hindi

Get Here Free Short Essay On Reservation System In Hindi Language For School Students & Kids In Various Length Like 100, 200, 250, 300, 400 and 500 Words.

Essay On Reservation System In Hindi In 700 Words

भारतीय संविधान द्वारा पिछड़े तबके को ऊपर उठाने के लिए आरक्षण का प्रावधान किया था. मगर आज आरक्षण की समस्या ने समानता को ताक पर रखी दिया. आरक्षण का दुष्परिणाम, नुकसान हमारे सामने है समाज दो भागों में विभाजित हो गया हैं. आज समय की आवश्यकता है कि आरक्षण : देश के लिए वरदान या अभिशाप विषय पर इसके लाभ हानि कारणों पर फिर से डिबेट की जानी चाहिए तथा पक्ष विपक्ष के तर्कों के आधार पर आरक्षण की परिभाषा को पुनः परिभाषित कर एक नयें अर्थ देने की आवश्यकता हैं.

यदि आरक्षण का उद्देश्य देश के संसाधनों, अवसरों एवं शासन प्रणाली में समाज के प्रत्येक की उपस्थिति सुनिश्चित करना है, तो यह बात अब निर्णायक रूप से कही जा सकती हैं कि आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था असफल हो चुकी हैं. सामाजिक न्याय का सिद्धांत वास्तव में वहीँ लागू हो सकता हैं, जहाँ समाज के नेतृत्व की नियत स्वच्छ हो, विशिष्ट सामाजिक बनावट के कारण भारत जैसे देश में सामाजिक न्याय के सिद्धांत को जिस तरीके से लागू किया गया हैं, उसमे तो असफल होना ही था.

भारत में आरक्षण नीति क्या है (Problem of Reservation System in India in Hindi)

भारतीय संविधान में पिछड़े वर्ग के उत्थान के लिए विशेष प्रावधान इस प्रकार किया गया हैं- अनुच्छेद 15- समानता का मौलिक अधिकार द्वारा राज्य के किसी भी नागरिक के विरुद्ध केवल जाति, धर्म, मूल वंश, लिंग या जन्म स्थान इनके आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जाएगा, लेकिन 15 (4) के अनुसार इस अनुच्छेद की या अनुच्छेद 29 के खंड 2 में की कोई बात राज्य को शैक्षिक अथवा सामाजिक दृष्टि से पिछड़े नागरिकों के किन्ही वर्गों अथवा अनुसूचित जाति एवं जनजातियों के लिए कोई विशेष व्यवस्था बनाने से नहीं रोक सकती.

अर्थात राज्य चाहे तो इनके उत्थान के लिए आरक्षण या शुल्क में कमी अथवा अन्य उपबन्ध कर सकती हैं, जिसे कोई भी व्यक्ति उसकी विधि मान्यता पर हस्तक्षेप नहीं कर सकता कि वह वर्ग विभेद उत्पन्न करते हैं.

स्वतंत्रता प्राप्ति के समय से ही भारत में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए सरकारी नौकरियों एवं शिक्षा में आरक्षण लागू हैं. मंडल आयोग की संस्तुतियों के लागू होने के बाद 1993 से ही अन्य पिछड़े वर्गों के लिए नौकरियों में आरक्षण लागू हैं. 2006 के बाद से केंद्र सरकार के शिक्षण संस्थानों में भी अन्य पिछड़े वर्षों के लिए आरक्षण लागू हो गया हैं. महिलाओं को भी विभिन्न क्षेत्रों में आरक्षण की सुविधा का लाभ मिल रहा हैं कुल मिलाकर समाज के अत्यधिक बड़े तबके को आरक्षण की सुविधाओं का लाभ प्राप्त हो रहा हैं, लेकिन आरक्षण की निति का परिणाम क्या निकला?

aarakshan niti par nibandh- Essay on Reservation in Hindi Language

अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के लिए आरक्षण लागू होने के ७२ साल से अधिक समय हो चूका है और मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू होने के बाद भी लगभग तीन दशक पूरे हो गये हैं लेकिन क्या सम्बन्धित पक्षों को उसका पर्याप्त फायदा मिला हैं. सत्ता एवं सरकार अपने निहिर्थ स्वार्थ के कारण आरक्षण की नीति की समीक्षा नहीं करती.

अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की समीक्षा तो संभव नहीं हैं क्योंकि इससे सम्बन्ध वास्तविक आंकड़े पता नहीं हैं चूँकि आंकड़े नहीं हैं. इसलिए योजनाओं का कोई लक्ष्य भी नहीं हैं. आंकड़ों के अभाव में देश के संसाधनो अवसरों और राजकाज में किस जाति और जाति समूह की कितनी हिस्सेदारी हैं, सैम्पल सर्वे के आंकड़ों इसमें कुछ मदद कर सकते हैं, लेकिन इतने बड़े देश में चार पांच हजार नमूना सर्वेक्षण से ठोस नतीजे निकाले जा सकते हैं.

सरकार ने १०४ वें संविधान संशोधन के द्वारा देश के सरकारी विद्यालयों के साथ साथ गैर सहायता प्राप्त निजी शिक्षण संस्थानों में भी अनुसूचित जातियों/ जनजातियों एवं अन्य पिछड़े वर्गों के अभियर्थियों को आरक्षण का लाभ प्रदान कर दिया हैं.

सरकार के इस निर्णय का समर्थन और विरोध दोनों हुआ. वास्तव में निजी क्षेत्रों में आरक्षण लागू होना अत्यधिक कठिन हैं. क्योंकि निजी क्षेत्र लाभ से समझौता नहीं कर सकते, यदि गुणवत्ता प्रभावित होने से ऐसा होता तो. पिछले कई वर्षों में आरक्षण के नाम पर राजनीति हो रही हैं.

आए दिनों कोई न कोई वर्ग अपने आरक्षण की मांग कर बैठता हैं एवं इसके लिए आन्दोलन पर उतारू हो जाते हैं. इस तरह देश में अस्थिरता एवं अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो जाती हैं. आर्थिक एवं सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर निम्न तबके के लोगों के उत्थान के लिए उन्हें सेवा एवं शिक्षा में आरक्षण प्रदान करना उचित हैं. लेकिन जाति एवं धर्म के आधार पर आरक्षण को कतई उचित नहीं कहा जा सकता हैं.

Essay On Reservation System In Hindi In 500 Words With Headings

आरक्षण व्यवस्था का उद्देश्य- हमारे संविधान निर्माताओं ने समाज के दलित और पिछड़े वर्ग को निर्धनता, अपमान और शोषण से मुक्त करने के लिए संविधान में एक विशेष व्यवस्था कि हैं. उन्होंने दलित जातियों की सूची बनाई तथा पिछड़ी जातियों को भी अलग से गणना कराई. अनुसूचित तथा पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण दिए जाने की व्यवस्था की गई.

यह आरक्षण सरकारी नौकरियों में स्थान सुरक्षित करके दिया गया. आरम्भ में यह व्यवस्था केवल दस वर्षों के लिए की गई थी किन्तु अनेक बार इसकी अवधि बढ़ाई गई. अब तो लगता है कि यह व्यवस्था सदा के लिए मान ली गई हैं.

आरक्षण का वर्तमान स्वरूप- आरक्षण अब एक लोककल्याणकारी व्यवस्था न रहकर एक सामाजिक समस्या का रूप लेता जा रहा है. अब पदोन्नति में भी आरक्षण आ गया हैं. शिक्षण संस्थाओं में भी आरक्षण है और देश के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थाएं आई आई टी आदि में भी आरक्षण का प्रवेश हो चुका हैं.

अब यह वोट बटोरने का हथियार बन चुका हैं. सच्चाई यह है कि आरक्षण प्रथा को स्थायी बनाए रखने का सुविचारित षड्यंत्र प्रतीत हो रहा हैं. प्रतिभा और कुशलता के सिर पर आरक्षण की तलवार लटका दी गई हैं.

आरक्षण के पक्ष और विपक्ष- आरक्षण को बनाये रखने के समर्थकों का मानना हैं कि सैकड़ों वर्षों से शोषण और उपेक्षा भोगने वाली जातियों को केवल अनिवार्य आरक्षण से ही सम्मानजनक स्थान मिल सकता हैं. आरक्षण के समर्थक आरक्षण की कोई समय सीमा भी स्वीकार नहीं करना चाहते हैं.

आरक्षण के वर्तमान स्वरूप के विरोधियों का कहना है कि जाति के आधार पर सीमाहीन आरक्षण से प्रतिभा, परिश्रम और कार्यकुशलता कि हानि हो रही हैं. आधुनिक अर्थव्यवस्था का आधार विशेषज्ञता और कार्यकुशलता हैं. मुक्त व्यापार और विश्वव्यापी प्रतियोगिता की चुनौतियों का सामना आरक्षण के चलते नहीं किया जा सकता. आरक्षण जाति के आधार पर नहीं आर्थिक आधार पर होना चाहिए. आरक्षण सामाजिक विघटन और जातीय द्वेष को बढ़ा रहा हैं.

राजनीतिक दुरूपयोग- अब यह पूर्ण रूप से स्पष्ट हो चुका हैं कि आरक्षण का उपयोग राजनीतिक लाभ ले लिए हो रहा हैं. सत्ता लोलुप राजनेता अपने वोट बैंक बनाने के लिए आरक्षण का दुरूपयोग कर रहे हैं. स्वार्थी राजनीतिक लोग अब सेना में भी अल्प संख्यकों के लिए आरक्षण का नारा लगा रहे हैं. राजनेताओं का यह पाखंड देश की सुरक्षा और एकता के लिए खतरा बनता जा रहा हैं.

आदर्श स्वरूप- आरक्षण की आवश्यकता से कोई इंकार नहीं कर सकता, लेकिन इसका आधार तार्किक और न्यायोचित होना चाहिए. केवल जातीय आधार पर आरक्षण दिया जाना सवर्ण जातियों के निर्धन और पिछड़े लोगों के साथ अन्याय हैं. आरक्षण कि नित्य नई मांग को लेकर सार्वजनिक जीवन को अशांत बनाने के साथ राष्ट्रीय सम्पति को नष्ट करना कदापि उचित नहीं हैं.

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