Essay On Right To Information | सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 निबंध

Essay On Right To Information किसी भी रिब्लिक देश में नागरिको को सुचना प्राप्ति का अधिकार होना चाहिए, सच्चे अर्थो में भारत के इतिहास में 15 जून 2005 का दिन अहम माना जाता हैं. इस दिन सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 पारित हुआ था. एक लोकतंत्र में पारदर्शी शासन व्यवस्था की यह निशानदेही होती हैं, कि उनके सभी नागरिकों को शासन व्यवस्था की सम्पूर्ण गतिविधियों की सूचना प्राप्त करने का मौलिक अधिकार हो. टैक्स के रूप में जमा राजस्व का सरकार कहा और कितना उपयोग कर रही हैं. इससे पूर्व की व्यवस्था में हमे कानून और शासन सम्बन्धी किसी भी सुचना व तथ्य जानने का कोई अधिकार नही था. राईट टू इनफार्मेशन (rti form in hindi) का सीधा अर्थ हमारे अधिकारों,कानूनों और व्यवस्था से जुड़ी कोई सूचना प्राप्त करना हैं.

Essay On Right To Information | सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 निबंध

सूचना के इस अधिकार से सरकारी दफ्तरों में लालफीताशाही की परम्परा की समाप्ति, शासन में पारदर्शिता, सभी जरुरी सूचनाएं सभी नागरिको को प्राप्त करने का अधिकार बहुत पहले ही दे दिया जाना चाहिए था. ताकि जनता अपने शासन और शासकों की कार्यो एवं सूचनाओं का उपभोग करते हुए अपनी जनशक्ति का सही स्थान पर उपयोग कर सके.

वैश्विक राजनिति में स्वीडन पहला लोकतान्त्रिक देश था, जिसने सबसे पहले 1766 में अपने नागरिको को सूचना का अधिकार Right To Informationदिया था. आज इस इस सूची में 110 देशों ने अपना नाम दर्ज करवा चुके हैं. RTI कंट्री रेटिंग सूची का अवलोकन किया जाए तो मेक्सिको, साइबेरिया, श्रीलंका, स्लोवेनिया के पश्चात भारत पांचवे पायदान पर हैं.

suchna ka adhikar (आरटीआई क्या हैं)

हम जान ले कि आखिर सूचना का अर्थ क्या हैं, किसे सूचना कहते हैं. किसी भी माध्यम चाहे वो प्रिंट मिडिया,मॉस मिडिया, वेब मिडिया,ईमेल, जनमत,रिपोर्ट, कागज, संवाद,रिपोर्ट और आकड़े,एडवर्टाइजिंग के जरिए प्राप्त ज्ञान को सूचना कहते हैं. आरटी आई में किसी निजी संस्थान से किसी मंत्रालय और मिनिस्ट्री तक की सूचनाएँ माँग कर हासिल करने के हक़ को सूचना का अधिकार कहा जाता हैं.

भारत में आरटी आई के इतिहास में दो तिथियाँ महत्वपूर्ण हैं, 15 जून 2005 में यह भारत के संसद द्वारा सर्वसम्मति से पारित किया गया, इसी वर्ष 13 अक्टूबर को जम्मू & कश्मीर को छोड़कर इसे भारतवर्ष के सभी राज्यों में लागू कर दिया गया. सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के अधिकार क्षेत्र में सरकार द्वारा संचालित सभी विभाग और मंत्रालय आते ही हैं, साथ ही वे सभी निजी संस्थाएँ जो भारत सरकार के अधिन या सहयोग अथवा इनसे मान्यता प्राप्त कर संचालित हैं. RTI के दायरे में आती हैं.

सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 उद्देश्य (rti act 2005 in hindi)

इस अधिकार का मुख्य उद्देश्य प्रत्येक जागरूक नागरिक को उनकी इच्छित सूचनाएँ आसानी से उपलब्ध करवाना, यदि कोई विभाग अथवा संस्था यदि इनफार्मेशन देने से इनकार करता हैं तो उनके विरुद्ध केन्द्रीय सूचना आयोग में शिकायत दर्ज करवाई जा सकती हैं. सूचना प्राप्ति के इस एक्ट को सक्षिप्त में RTI अर्थात राईट टू इनफार्मेशन भी कहा जाता हैं. भारत के सविधान के अनुच्छेद 19 a के तहत शामिल कर इसे मौलिक अधिकार का दर्जा दिया गया हैं.

अभिव्यक्ति के अधिकार के साथ ही जानकारी पूछने अथवा मागने के अधिकार के सेक्शन को भी जोड़ा गया हैं. कोई भी नागरिक सरकार या संस्था के कार्य, भूमिका, उनके कार्य करने का तरीका और अन्य जानकारी प्राप्त कर सकते हैं. इस अधिकार की मदद से सभी नागरिको को सूचना सम्पन्न बनाना, सरकार की कार्यप्रणाली को पारदर्शी और अधिक उतरदायी शासन व्यवस्था की ओर ले जाना हैं. सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 का उपयोग करते हुए शासक वर्ग को जनता सही सलाह, निर्देश अथवा उनको अधिक उत्तरदायी बनाने में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं.

right to information act Growth story

सूचना का अधिकार अधिनियम की विकास यात्रा 1952 से आरम्भ हुई जो वर्ष 2005 में इसके वर्तमान स्वरूप के साथ साकार हुई. भारत सरकार ने प्रेस की स्वतन्त्रता के प्रेस एक्ट पारित किया जा रहा था, उस समय जब लोगों से इस बारे में सुझाव मांगे गये. तो इस प्रकार की बाते उस समय भी उठी कि सभी संस्थाओ से जानकारी (सूचना) प्राप्त अधिकार दिया जाए. केंद्र सरकार ने उस समय इसे परिहार्य न समझते हुए टाल दिया था.

इसके बाद के वर्षो में 1966 और 1967 में भी प्रेस की स्वतन्त्रता पर इस तरह के सुझाव मांगे गये, कमेटिया बिठाई गईं. मगर उस सभी सुझावों को निरस्त कर दिया. आमजन तक सूचना के अधिकार की मांग करने का श्रेय 1977 में जनता पार्टी के घोषणापत्र को जाता हैं. जनता पार्टी की सरकार बनने के तदोपरांत प्रेस आयोग का गठन भी किया गया. मगर सूचना के अधिकार को देने की बात आगे नही बढ़ पाई. भारत के इतिहास में जनता को सूचना का अधिकार दिलाने की दिशा में अहम प्रयास वी.पी. सिंह की सरकार ने दिया. 1990-1998 के दौर में सभी राजनितिक दलों के घोषणा पत्र में सूचना के अधिकार को शामिल किया गया था.

लेकिन 1997 में पहली बार संसद में सूचना के अधिकार का विधेयक लाया गया. जो मुश्किल से वर्ष 2002 के आखिरी महीने में पारित हो सका. इस विधेयक में कई बड़ी मुलभुत गड़बड़ियो को देखते हुए इसे संशोधित कर पुन: 2005 में संसद में प्रस्तुत किया गया जिन्हें 15 जून को पुरे देश में लागू कर दिया गया.

सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत आवेदन पत्र (rti application form in hindi )

  • संसद विधानसभा अथवा कोई भी व्यक्ति द्वारा किसी संस्था व मंत्रालय से सूचना मागने पर वो मना नही कर सकता.
  • सम्बन्धित सम्पूर्ण सूचना 30 दिनों की अवधि में देना अनिवार्य हैं, अन्यथा उनके विरुद्ध क़ानूनी कार्यवाही की जा सकती हैं.
  • व्यक्ति के जीवन से जुड़ी कोई सूचना उन्हें 48 घंटे के भीतर उपलब्ध करवानी होगी.
  • सभी सरकारी संस्थाओ एवं मंत्रालयों में जनसूचना अधिकारी की व्यवस्था का प्रावधान हैं.
  • कोई भी व्यक्ति राजकीय भाषा में पत्राचार के द्वारा केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी से आवेदन कर सकता हैं.
  • सूचना मागने का निर्धारित शुल्क 10 रूपये नकद अथवा किसी अन्य माध्यम से आवेदन के साथ दिया जा सकता हैं.
  • यदि सूचना प्राप्त करने में अधिक लागत लगती हैं, तो इसका भार आवेदनकर्ता पर ही होगा.
  • bpl धारक को सूचना प्राप्ति आवेदन पत्र के लिए किसी तरह का शुल्क देने की जरूरत नही हैं.
  • rti application के लिए किसी ख़ास प्रपत्र की आवश्यकता नही हैं, इसे सादे पेपर से भी प्रस्तुत किया जा सकता हैं.

सूचना का अधिकार अधिनियम की सीमाएं (rti act Limitations in hindi )

व्यापक रूप से जब rti को देखा जाए, तो इसमे उतने अवगुण नजर नही आएगे, जीतने इसके faayde हैं. मगर कुछ विषयों पर सवाल उठते हैं, जिनमे 22 ऐसे क्षेत्र हैं, जिन्हें सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के अंतर्गत नही रखा हैं. इनमे राष्ट्रिय सुरक्षा, विदेश सम्बन्ध, crpf, भारतीय अन्तरिक्ष अनुसन्धान, और bsf.

इसमें जानकारी की उपयोगिता को परखते हुए, अधिकारी सूचना दे भी सकते हैं और नही भी. यदि राष्ट्रिय सुरक्षा और आंतरिक सुरक्षा से जुड़ा कोई मसला हो तो यह उन अधिकारी पर निर्भर करता हैं, वो सूचना साझा करे अथवा नही. इस rti नियम में इसका एक विरोधाभाषी एक और नियम हैं, जिनके तहत किसी अधिकारी द्वारा सूचना ना देने अथवा गलत सूचना देने की स्थति में उन्हें दंड के साथ व्यतीत दोनों में आवेदनकर्ता को ढाई सौ रूपये के हिसाब के जुरमाना भी देना होगा. यह राशि अधिकतम 20 हजार रूपये तक हो सकती हैं.

right to information act in hindi (सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 निबंध)

आज के भूमंडलीकरण और वैश्विक उदारीकरण के समय में जब private सेक्टर की कम्पनियाँ, उधमो की संख्या में साल दर साल इजाफा हो रहा हैं. ऐसे में कुछ क्षेत्रो को सूचना के अधिकार से बाहर रखना निश्चित तौर पर एक गलती हैं. यदि हम अपनी आर्थिक विकास दर में योगदान करने वाले फेक्टर की तरफ नजर डाले तो इसमे निजी व्यसाय का बहुत बड़ा कंट्रीब्युट हैं.

इस कानून में देश की सुरक्षा अखडता और वैज्ञानिक विषयों को इस अधिकार से मुक्त रखा गया हैं. मगर सवाल यह उठता हैं कि क्या इन क्षेत्रो की सभी सूचनाएँ गोपनीय रखी जानी चाहिए, या फिर यह तय करने का अधिकार किसके पास हैं, कि क्या गोपनीय रखना है और क्या नही. . मगर हम इस अधिनियम की अच्छी बातों पर अमल करे तो यकीनन एक आम आदमी का सत्ताधारी लोगों तक पहुच बनाना और उनसे सवाल करने का हक़ हमे सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 से मिला हैं.

यदि एक जागरूक नागरिक अपने इस अधिकार का समुचित उपयोग करे, तो यकीनन हमे आशा हैं देश की कई समस्याओं का समाधान संभव हैं.

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