राष्ट्र के निर्माण में युवाओं का योगदान पर निबंध | Essay On Role of Youth in Nation Building in Hindi

राष्ट्र के निर्माण में युवाओं का योगदान पर निबंध Essay On Role of Youth in Nation Building in Hindi: दोस्तों आज हम आपके साथ साझा कर रहे हैं. राष्ट्रीय उत्थान में युवा वर्ग का योगदान अथवा राष्ट्र निर्माण में युवाओं की भूमिका का यह निबंध स्टूडेंट्स के लिए साझा कर रहे हैं.

Essay On Role of Youth in Nation Building in Hindi

राष्ट्र के निर्माण में युवाओं का योगदान पर निबंध Essay On Role of Youth in Nation Building in Hindi

राष्ट्र के निर्माण में युवाओं का योगदान पर निबंध

युवक और देश की स्थितियुवक देश के कर्णधार होते हैं. देश और समाज का भविष्य उन्ही पर निर्भर होता हैं. परन्तु आज हमारे देश की दशा अत्यंत शोचनीय हैं. समाज में एकता, जागरूकता, राष्ट्रीय चेतना, कर्तव्य बोध, नैतिकता आदि की कमी हैं. शिक्षा प्रणाली भी दोषपूर्ण हैं.

राजनीतिक कुचक्र एवं भ्रष्टाचार का बोलबाला हो गया हैं. स्वार्थ भावना में वृद्धि, कर्तव्यबोध की कमी, कोरा दिखावा एवं अंधविश्वास आदि समाज को जकड़े हुए हैं. ऐसी स्थिति में युवकों का दायित्व निश्चय ही बढ़ जाता हैं.

युवा पीढ़ी का वर्तमान रूप– इस बिखरते समाज को व्यवस्थित करने का दायित्व युवकों पर ही है, किन्तु आज की युवा पीढ़ी की दशा की शोचनीय हैं. युवा पीढ़ी कुंठा, निराशा, तोड़ फोड़ की प्रवृत्ति, दायित्व हीनता आदि अधिक व्याप्त हैं.

समाज की पूर्व प्रचलित मान्यताएँ उन्हें स्वीकार नहीं हैं. पश्चिम का प्रभाव उन पर अधिक हैं. इसलिए वे भारतीय भूमि पर पाश्चात्य सभ्यता का ढांचा खड़ा करना चाहते हैं. शिक्षा का अर्थ उनकी निगाह में केवल नौकरी प्राप्त करने का एक साधन रह गया हैं. अश्लील चलचित्र, सस्ते साहित्य और फैशनपरस्ती आदि में उनकी रूचि अधिक हैं.

युवकों का दायित्व– अतः युवा पीढ़ी के जहाँ समाज के प्रति दायित्व हैं, वहीँ अपने जीवन निर्माण के प्रति उसे कुछ सावधानी बरतना अपेक्षित हैं. पहले युवक युवती स्वयं को सुधारें, स्वयं को शिक्षित करे, स्वयं को जिम्मेदार नागरिक बनें और स्वयं को चरित्रवान बनाएं. तभी वे समाज की प्रगति में सहायक हो सकते हैं.

समाज में शान्ति और व्यवस्था बनाए रखना उनका दायित्व हैं. समाज विरोधी तत्वों की रोकथाम युवकों के सहयोग से ही संभव हैं. वे हड़ताल, आगजनी, तोड़ फोड़ आदि को रोके, ताकि सामाजिक वातावरण बिगड़े नहीं, समाज में धर्म व नीति की मर्यादाओं को बनाये रखना भी उनका कर्तव्य हैं. अच्छे चरित्र के अभाव में समाज को सुखमय नहीं बनाया जा सकता हैं.

छात्र जीवन में उन्हें चाहिए कि वे निष्ठापूर्वक अध्ययन करे, गलत साहित्य न पढ़े. संभव हो तो गलत साहित्य के प्रकाशन को भी रोके. समाज में बेईमानी और भ्रष्टाचार करने वालों के विरुद्ध संगठित होकर कार्य करें. इसी भांति युवकों को चाहिए कि वे थोड़े से स्वार्थ के लिए राजनीति के कुचक्रो में न फसे, पश्चिमी भौतिकवाद के प्रभाव से स्वयं को बचाकर रखे.

उपसंहार– उक्त सभी पक्षों को व्यावहारिक रूप देकर ही युवा पीढ़ी समाज के प्रति अपने दायित्वों को पूरा कर सकती हैं. इसी दशा में समाज सुखमय बन सकता हैं. नवयुवक भारत की भावी आशाएं हैं, उन्हें यथासम्भव समाज की अपेक्षाओं को पूरा करने का प्रयत्न करना चाहिए.

राष्ट्र के निर्माण में युवाओं का योगदान Essay On Role of Youth in Nation Building in Hindi

जब जब संकट घिरे देश पर
किसने वक्ष अड़ाए हैं
देश प्रेम की बलिवेदी पर
किसने शीश चढाए है
प्यासी धरती को श्रम जल से
कौन सींचता आया है
किसने सपनों के सुमनों से
माँ का रूप सजाया हैं.

इन प्रश्नों के उत्तर में एक ही नाम एक छवि उभरती है और वह देश का युवावर्ग. वह युवा वर्ग ही था जिसने मातृभूमि को परतन्त्रता की बेड़ियों में जकड़ने वाले क्रूर विदेशी शासन को चुनौती दी थी.

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में हैं
देखना है जोर कितना बाजू ए कातिल में हैं.

युवा वर्ग की क्षमता– विधाता के किसी निर्माण को देखों. जवानी उसकी आयु का चरम क्षण होती हैं. जवानी की उमंगे सागर को मार करती हैं. जवान कल्पनाएँ आकाश को भी छोटा साबित कर देती हैं. धरती फोड़कर वे जलधारा निकाल सकती हैं. पहाड़ो निकाल सकती हैं. पहाड़ों के सिर पर वे रास्ता बना लेती हैं.

पर्वतों को काटकर सडकें बना देते हैं
सैकड़ों मरुभूमि में नदियाँ बहा देते हैं वे

कविवर माखनलाल चतुर्वेदी ने युवा रक्त की भूमिका को सराहते हुए कहा हैं.

द्वार बलि का खोल चल, भूडोल कर दे
एक हिमगिरी एक सिर का मोल कर दें
मसल कर अपने इरादों सी उठाकर
दो हथेली हैं कि पृथ्वी गोल कर दें.

युवा वर्ग की क्षमताएँ अनंत हैं. अतः यह तो इनकी क्षमताओं का दोहन करने वालों के इमान पर निर्भर हैं कि वे इस छुरी से निरपराध का गला काटते हैं या इसे एक शल्य चिकित्सक के हाथ थमाकर किसी मरणोंन्मुख के प्राण बचाते हैं.

युवा वर्ग और भारतीय लोकतंत्र– समाज का हर वर्ग, लोकतंत्र का हर स्वयंमभू ठेकेदार युवकों को अपने पक्ष में खरीद लेना चाहता हैं. भारतीय लोकतंत्र का भविष्य जिनकें कंधों पर टिका है, उन युवाओं को बेरोजगार भटकते देखकर, उनका चारित्रिक पतन होते देखकर, क्या इस लोकतंत्र को तनिक भी लज्जा का अनुभव होता है? केवल युवा वर्ग के  बाहुबल का   और  उसकी प्रतिभा का शोषण ही लोकतंत्र का पावन कर्तव्य बना गया हैं. युवाओं की समस्याओं का समाधान करना शासन और समाज का अनिवार्य दायित्व हैं.

युवा ही लोकतंत्र के संरक्षक– लोकतंत्र को प्रतिष्ठा को स्थायित्व दिलाने वाले उसके युवक ही होते हैं. भारतीय लोकतंत्र की अधिकांश समस्याएं उसके युवकों की समस्याएं हैं और युवा वर्ग पर ही उसके समाधान भी हैं. युवा पीढ़ी में हम जैसे संस्कार बोएगे वैसे ही काटने पड़ेगे.

उनकी सुशिक्षा, स्वास्थ्य, मनोरंजन, जीवनयापन और अभिलाषाओं के प्रति यह लोकतंत्र जितना जागरूक और सचेष्ट रहेगा, उतनी ही उनसे अपेक्षाएं कर सकेगा. युवा वर्ग में व्याप्त, असंतोष, भटकाव और निराशा भारतीय लोकतंत्र की प्रतिष्ठा को उज्ज्वल नहीं बना पाएगी.

उपसंहार– युवा शक्ति का विवेक और ईमानदारी से प्रयोग देश के वयोवृद्ध नेतृत्व का परम कर्तव्य है.  युवा वर्ग  एक  दुधारी तलवार है, जरा चूके तो लेने के देने पड़ सकते हैं. युवाओं को अपनी महत्वकक्षाओं और स्वार्थ की सीढ़ी बनाने वाले, श्मशानी पीढ़ी के लोग सावधान हो जाएं. यह आग कभी भी उनके पाखंड पूर्ण इरादों को जलाकर ख़ाक कर सकती हैं.

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