संत कबीर पर निबंध Essay On Sant Kabir In Hindi

संत कबीर पर निबंध Essay On Sant Kabir In Hindi: प्रिय दोस्तों आपका स्वागत हैं, आज हम हिंदी के महान कवि एवं समाज सचेतक कबीर दास के जीवन पर निबंध Sant Kabir Essay के रूप में बता रहे हैं. यदि आप संत कबीर का जीवन परिचय, जीवनी, इतिहास, रचनाएँ (Life introduction, biography, history, compositions) के बारे में जानकारी चाहते हैं तो इस Short Essay को पढ़े.

Sant Kabir Essay In Hindi: कबीर के जन्म काल, जीवन मरण तथा जीवन की प्रसिद्ध घटनाओं के विषय में किवदंतियाँ प्रसिद्ध हैं. जनश्रुति के अनुसार इनका जन्म 1397 ई में काशी की एक विधवा ब्राह्मणी के घर में हुआ था. किन्तु लोकापवाद के भय से वह इन्हें लहरतारा ताल के निकट छोड़ आई.

इनका पालन पोषण नीरू नीमा नामक जुलाहा दम्पति ने किया. इस प्रकार कबीर ब्राह्मणी के पेट से उत्पन्न हुए थे, लेकिन उनका पालन पोषण जुलाहे के यहाँ हुआ. कबीर ने भी अपने को कविता में अनेक बार जुलाहा कहा हैं. बाद में वे जुलाहा ही प्रसिद्ध हुए. कबीर की मृत्यु के बारे में भी कहा जाता है कि हिन्दू शव को जलाना चाहते थे और मुसलमान दफनाना.

इस पर विवाद हुआ, किन्तु पाया गया कि कबीर का शव अंतर्ध्यान हो गया. वहां कुछ कुछ फूल है उनमें से कुछ को हिन्दुओं ने जलाया तथा कुछ को मुसलमानों ने दफनाया. कबीर की पत्नी का नाम लोई था. उनकी सन्तान के रूप में पुत्र कमाल और पुत्री कमाली का उल्लेख मिलता हैं. कबीर के प्रधान शिष्यों में धर्मदास ने कबीर की वाणी का संग्रह किया. ऐसा माना जाता हैं कि कबीर की मृत्यु मगहर जिला बस्ती में सन 1518 ई में हुई.

संत कबीर पर निबंध – Essay On Sant Kabir In Hindi

संत कबीर का अपना पंथ या सम्प्रदाय क्या था, इसके बारे में कुछ भी निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता हैं. रामानंद इनके दीक्षा गुरु थे. उनके नाम का मंत्र लेने के लिए ये पंचगंगा घाट की उन सीढियों पर जा पड़े, जहाँ से प्रातःकाल रामानंद स्नान करने जाते थे. अँधेरे में रामानंद के चरण कबीर साहब पर पड़ गये और रामानंद ज बोल उठे राम राम कह.

आगे चलकर यही मंत्र मानुषी सत्य की महान लक्ष्य प्राप्ति में तथा विषमता के दुराग्रहों को छोड़कर सामाजिक न्याय और समानता की स्थापना में सहायक हुआ. शेख तकी नाम के सूफी संत को भी कबीर का गुरु कहा जाता हैं, किन्तु इसकी पुष्टि नहीं होती, सम्भवतः संत कबीर ने इन सबसे सत्संग किया होगा और इन इन सबसे किसी न किसी रूप में प्रभावित भी हुए होंगे.

संत कबीर की जाति के विषय में हजारी प्रसाद द्वेदी ने अपनी पुस्तक कबीर में प्राचीन उल्लेखों, कबीर की रचनाओं, प्रथा, वयन जीवी बुनकर जातियों के रीति रिवाज का विवेचन विश्लेष्ण करके दिखाया हैं. आज की वयनजीवी जातियों में से अधिकाँश किसी समय ब्राह्मण श्रेष्ठता को स्वीकार नहीं करती थी.

जोगी नामक आश्रम भ्रष्ट घरबारियों की एक जाति सारे उत्तर और पूर्वी भारत में फैली हुई थी. ये नाथपंथी थे, कपड़ा बुनकर और सूत कातकर या गोरखनाथ और भरथरी के नाम पर भीख मांगकर जीविका चलाया करते थे. इनमें निराकार भाव की उपासना प्रचलित थी. मुसलमानों के आने के बाद ये धीरे धीरे मुसलमान होते रहे. पंजाब, उत्तर परदेश, बिहार और बंगाल में इनकी कई बस्तियों ने सामूहिक रूप से मुसलमानी धर्म ग्रहण किया. कबीरदास इन्ही नवधर्मान्तरित लोगों में पालित हुए थे.

Essay On Kabir Das In Hindi, संत कबीर दास पर निबंध

कबीर के काव्य पर इन सबका प्रभाव देखा जा सकता हैं. उनमें वेदान्त का अद्वैत, नाथ पंथियों की अन्तस्साधना रहस्य भावना, हठयोगी, कुंडलिनी योग, सहज साधना, इस्लाम का एकेश्वरवाद सब कुछ मिलता हैं.

कवि के रूप में कबीर जीवन की सहजता के अधिक निकट हैं. उनकी कविता में छंद, अलंकार, शब्द शक्ति आदि गौण है और लोकमंगल की चिंता प्रधान है. इनकी वाणी का संग्रह इनके अनुयायियों ने बीजक के नाम से किया हैं. इसके तीन भाग है रमैनी, सबद और साखी. रमैनी और सबद में गाने के पद हैं तथा साखी दोहा छ्न्द में लिखी गई हैं. रमैनी, सबद ब्रजभाषा में है जो तत्कालीन मध्यदेश की काव्यभाषा थी.

संत कबीर ने अपनी कविता में अंतस्साधनात्म्क परिभाषिक शब्दावली का प्रयोग भी खूब किया हैं. साथ ही अहिंसा की भावना और वैष्णव प्रप्तिवाद थी. कबीर की भाषा मूलतः तो पूरब की है, किन्तु उनमें अन्य बोलियों का मिश्रण होने के कारण उसे सधुक्कड़ी कहा जाता हैं. कबीर साहसपूर्वक जन बोली के शब्दों का प्रयोग अपनी कविता करते हैं. बोली के ठेठ शब्दों के प्रयोग के कारण ही संत कबीर को वाणी का डिक्टेटर कहा जाता हैं.

उनकी अंतत तेजस्विता उनकी भाषा शैली में भी प्रकट हैं. काजी, पंडित, मुल्ला को संबोधित करते समय वे प्रायः तन जाते हैं. पांडे कौन कुमति तोंहि लागी, कसरे मुल्ला बांग नेवाज, किन्तु सामान्य जन को या हरिजन को सम्बोधित करते समय वे भाई या साधो जैसे शब्दों का प्रयोग करते हैं.

कबीर तथा अन्य निर्गुण संतों की उल्टबसियां प्रसिद्ध हाँ. उलटबासियों का पूर्व रूप हमें सिद्धों की संधा भाषा में मिलता हैं. उलट बासियाँ अंतस्सध्नात्मक अनुभूतियों को आसामान्य प्रतीकों में प्रकट करती हैं. वे वर्णाश्रम व्यवस्था को मानने वाले संस्कारों को धक्का देती हैं. इन प्रतीकों का अर्थ खुलने पर ही उलटबासियाँ समझ में आती हैं.

संत कबीरदास पर निबंध (sant kabir das essay in hindi)

संत कबीरदास ने भक्ति पूर्व धार्मिक साधनाओं को आत्मसात अवश्य किया था. किन्तु वे इन साधनाओं को भक्ति की भूमिका या तैयारी मात्र मानते थे. जीवन की सार्थकता वे भक्ति या भगवद विषयक रति में मानते थे. यदपि उनके राम निराकार है, किन्तु वे मानवीय भावनाओं के आलंबन हैं. इसलिए कबीर ने निराकार निर्गुण राम को भी अनेक प्रकार के मानवीय सम्बन्धों में याद किया हैं. वे भरतार है कबीर बहुरिया है. वे कबीर की माँ है- हरि जननी मैं बालक तोरा’ वे पिता भी हैं. जिनके साथ कबीर बाजार जाने की जिद करते हैं.

कबीर भक्ति के बिना सारी साधनाओं को व्यर्थ और अनर्थक मानते हैं. इसी प्रेम एवं भक्ति के बल पर वे अपने युग के सारे मिथ्याचार, कर्मकांड, अमानवीयता, हिंसा, पर पीड़ा को चुनौती देते हैं. उनके काव्य, उनके व्यक्तित्व और उनकी साधना में जो अक्खड़पन, निर्भीकता और दोटूकपन है वह भी इसी भक्ति या महाराग के कारण.

वे पूर्व साधनाओं की पारिभाषिक शब्दावली को अपनाकर भी उसमें जो नई अर्थवत्ता भरते हैं, वह भी वस्तुतः प्रेम भक्ति की ही अर्थवत्ता हैं. संत कबीर अपने अनुभव, पर्यवेक्षण और बुद्धि के निर्णायक मानते हैं, शास्त्र को नहीं. इस दृष्टि से वे यथार्थ बोध के रचनाकार हैं. उनके यहाँ जो व्यंग्य की तीव्रता और धार है वह भी कथनी और करनी के अंतर को देख पाने की क्षमता के कारण. अपने देखने या अनुभव को न झुठलाने के कारण ही वे परंपरा द्वारा दिए गये समाधान को अस्वीकार करके नयें प्रश्न पूछते हैं.

चलन चलन सब लोग कहत है न जाने बैकुंठ कहाँ है

या न जाने तेरा साहब कैसा हैं.

कबीर की भक्ति

संत कबीर बहुत गहरी मानवीयता और सह्रदयता के कवि है. अक्खड़ता और निर्भयता उनके कवच हैं, उनके ह्रदय में मानवीय करुणा, निरीहता, जगत के सौन्दर्य से अभिभूत होने वाला ह्रदय विद्यमान हैं. कबीर की एक और विशेषता है- काल का तीव्र बोड. वे काल को सर्वग्रासी रूप में चित्रित करते हैं और भक्ति को उस काल से बचने का मार्ग बताते हैं.

परम्परा पर संदेह, यथार्थ बोध, व्यंग्य, काल बोध की तीव्रता ओर गहरी मानवीय करुणा के कारण कबीर आधुनिक भाव बोध के बहुत निकट लगते हैं. किन्तु संत कबीर में संतस्साध्नाताम्क रहस्य भावना भी है और राम में अन्यय भक्ति तो उनकी मूल भाव ही हैं.

नाद, बिंदु, कुंडलिनी, षडचक्रभेदन आदि का बारम्बार वर्णन कबीर काव्य का अंतस्सधनात्म्क रहस्यवादी पक्ष हैं. कबीर में स्वाभाविक रहस्य भावना बड़े मार्मिक तौर पर व्यक्त की गई हैं. ऐसे अवसर पर वे प्रायः जिज्ञासु होते हैं- कहो भईया अंबर कासौ लागा’

जीवन के सम्बन्ध में कबीर के विचार

संत कबीर में जीवन के द्न्दात्म्क पक्ष को समझने की अद्भुत क्षमता थी. इस परस्पर विरोधिता को न समझने पर कबीर का मर्म नहीं खुलता. जिसे जीना कहा जाता हैं. वह वस्तुतः जीवित रहने और मृत्यु की ओर निरंतर बढ़ते रहने की प्रक्रिया हैं. फिर भी लोग कुशल पूछते है और कुशल बताते हैं. लोग जीने का एक पक्ष देखते हैं दूसरा नहीं. कबीर इस पर व्यंग्य करते है, हंसते है और करुणा करते हैं.

”कुसल कुसल ही पूछते कुसल रहा न कोय

जरा मुई न भय मुआ कुसल कहा ते होय”

कबीर विशाल गतिशील बिम्ब प्रस्तुत करते हुए आकाश और धरती को चक्की के दो पाट बताते हैं. चलती चाकी देखकर दिया कबीर रोय/ दो पाटन के बीच में साबित बचा न कोय, इसी तरह वे समाधि, सत्संग, गुरु उपदेश, हरि भजन आदि की सुखा नुभूति का चित्रण उत्कृष्ट इन्द्रिय बोधात्मक तीव्रता के साथ करते हैं. सतगुरु हमसू रीझ कर, कहा एक परसंग. बादर बरसा प्रेम का, भीज गया अंग.

संत कबीर साद्रश्य विधान प्रायः अवर्ण जातियों का व्यवसाय के आधार पर खड़ा करते हैं. जुलाहा, माली, कुम्हार, लोहार, व्याध, कलवार आदि के व्यवसायों का उपयोग वे प्रायः अलंकार योजना में करते हैं. यह भाव प्रायः सभी निर्गुण कवियों में पाया जाता हैं.

निष्कर्ष

इस प्रकार भाषा, संवेदना, विचार प्रणाली सभी दृष्टियों में संत कबीर शास्त्रीयता के समक्ष खांटी देशीपन को महत्व देते हैं. संसकिरित के कूपजल को छोड़कर वे भाखा के बहते नीर तक स्वयं पहुचते हैं. और सबकों पहुंचाते हैं. संस्कृत से मुक्त लोक संस्कृति को बनाने में उनका योगदान अप्रितम हैं. पंडित और मुल्ला यहाँ दोनों को एक वे एक साथ अप्रासंगिक कर देते हैं. मूलतः कवि होने के नाते शास्त्र की तुलना में वे अनुभव को प्रमाणिक मानते हैं. भाखापन को लेकर गहरा आत्मविश्वास भाव उनके रचनाकार व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता कही जा सकती हैं.

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