भारत की ऋतुओं पर निबंध | Essay on Seasons of India in hindi

भारत की ऋतुओं पर निबंध Essay on Seasons of India in hindi: नमस्कार दोस्तों भारत ऋतुओं का देश कहा जाता हैं यहाँ तीन, चार अथवा छः ऋतुओं का वार्षिक चक्र माना गया हैं. भारत की ऋतुओं में बसंत ऋतु, ग्रीष्म ऋतु, वर्षा ऋतु, शरद ऋतु, हेमंत ऋतु, शीत ऋतु को मुख्य ऋतुएँ माना जाता है. आज के निबंध स्पीच में हम भारत की ऋतुओं की जानकारी प्राप्त करेगे.

Essay on Seasons of India in hindi

Essay on Seasons of India in hindiभारत में मुख्यतः चार ऋतुओं को पहचाना जा सकता हैं. ये हैं शीत ऋतु, ग्रीष्म ऋतु, वर्षा ऋतु या मानसून के आगमन की ऋतु तथा मानसून प्रत्यावर्तन या वापसी की ऋतु.

शीत ऋतु

उत्तरी भारत में शीत ऋतु मध्य नवम्बर से आरम्भ होकर फरवरी तक रहती हैं. भारत के उत्तरी भाग में दिसम्बर एवं जनवरी सबसे ठंडे महीने होते हैं. तापमान दक्षिण से उत्तर की ओर बढ़ने पर घटता जाता हैं. पूर्वी तट पर चेन्नई का तापमान 24 डिग्री सेल्सियस से 25 डिग्री सेल्सियस के बीच होता हैं.

जबकि उत्तरी मैदान में यह 10 डिग्री से 15 डिग्री के बीच होता हैं. दिन गर्म तथा रातें ठंडी होती हैं. उत्तर में तुषारापात सामान्य है तथा हिमालय के ऊतरी ढालों पर हिमपात होता हैं. इस ऋतु में देश में उत्तर पूर्वी व्यापारिक पवनें प्रवाहित होती हैं. ये स्थल से समुद्र की बहती हैं तथा इसलिए देश के अधिकतर भाग में शुष्क मौसम होता हैं.

इन पवनों के कारण कुछ मात्रा में वर्षा तमिलनाडु के तट पर होती हैं, क्योंकि वहां ये पवनें समुद्र से स्थल की ओर बहती हैं. देश के उत्तरी भाग में एक कमजोर उच्च दाब का क्षेत्र बन जाता हैं, जिसमें हल्की पवनें इस क्षेत्र से बाहर की ओर प्रवाहित होती हैं. उच्चावच से प्रभावित होकर ये पवन पश्चिम तथा उत्तर पश्चिम से गंगा घाटी से बहती हैं. सामान्यतः इस मौसम में आसमान साफ़, तापमान तथा आद्रता कम एवं पवनें शिथिल तथा परिवर्तित होती हैं.

शीत ऋतु में उत्तरी मैदानों में पश्चिम एवं उत्तर पश्चिम से चक्रवाती विक्षोभ का अंतर्वाह विशेष लक्षण हैं. यह कम दाब वाली प्रणाली भूमध्यसागर एवं पश्चिमी एशिया के ऊपर उत्पन्न होती है तथा पश्चिमी पवनों के साथ भारत में प्रवेश करती हैं. इसके कारण शीतकाल में मैदानों में वर्षा होती है तथा पर्वतों का हिमपात.

यदपि शीतकाल में वर्षा, जिसे स्थानीय तौर पर मावट कहा जाता है की कुल मात्रा कम होती है, लेकिन ये रबी फसलों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण होती हैं. प्रायद्वीपीय भागों में शीत ऋतु स्पष्ट नहीं होती हैं. समुद्री पवनों के प्रभाव के कारण शीत ऋतु में भी यहाँ तापमान के प्रारूप में न के बराबर परिवर्तन होता हैं.

ग्रीष्म ऋतु

सूर्य के उत्तर की ओर आभासी गति के कारण भूमंडलीय ताप पट्टी उत्तर की तरफ खिचक जाती हैं. मार्च से मई तक भारत में ग्रीष्म ऋतु होती हैं. मार्च में दक्कन का पठार का उच्च तापमान लगभग 38 डिग्री सेल्सियस होता हैं. अप्रैल में मध्य प्रदेश एवं गुजरात का तापमान लगभग 42 डिग्री सेल्सियस होता हैं. मई में देश के उत्तर पश्चिमी भागों का तापमान सामान्यतः 45 डिग्री सेल्सियस होता हैं. प्रायद्वीप भारत में समुद्र प्रभाव के कारण तापमान कम होता हैं.

देश के उत्तरी भाग में ग्रीष्मकाल में तापमान में वृद्धि होती है तथा वायुदाब में कमी आती हैं. मई के अंत में उत्तर पश्चिम में थार के रेगिस्तान से लेकर पूर्व एवं दक्षिण पूर्व में पटना तथा छोटा नागपुर का पठार तक कम दाब का लम्बवत क्षेत्र उत्पन्न होता हैं. पवन का परिसंचरण इन गर्त के चारों ओर प्रारम्भ होता हैं.

लू ग्रीष्मकाल का एक प्रभावी लक्षण हैं. ये धूल भरी गर्म एवं शुष्क पवनें होती है, जो कि दिन के समय भारत के उत्तर एवं उत्तर पश्चिमी क्षेत्रों में चलती हैं. उत्तरी भारत में मई महीने के दौरान सामान्यतः धूल भरी आंधिया आती हैं. ये आंधियाँ अस्थायी रूप से आराम पहुंचाती हैं, क्योंकि ये तापमान को कम कर देती है तथा अपने साथ ठंडे समीर एवं हल्की वर्षा लाती हैं.

इस मौसम में कभी कभी तीव्र हवाओं के साथ गरज वाली मूसलाधार वर्षा भी होती हैं. इसके साथ प्रायः हिम्व्रष्टि भी होती हैं. वैशाख के महीने में होने के कारण पश्चिम बंगाल में इसे काल वैशाखी कहा जाता हैं. ग्रीष्म ऋतु के अंत में केरल एवं कर्नाटक में प्रायः पूर्व मानसूनी वर्षा होती हैं, इसके कारण आम जल्दी पक जाते हैं तथा प्रायः इसे आम्र वर्षा भी कहा जाता हैं.

वर्षा ऋतु या दक्षिण पश्चिमी मानसून की ऋतु

यह ऋतु मध्य जून से मध्य सितम्बर तक होती हैं. भारत के उत्तरी पश्चिमी भाग में तापमान तेजी से बढ़ जाने के कारण निम्न वायुदाब विकसित हो जाता हैं. यह पश्चिमी राजस्थान से लेकर पश्चिम बंगाल तक विस्तीर्ण हो जाता हैं. निम्न वायुदाब के कारण इस क्षेत्र में अरब सागर और बंगाल की खाड़ी दोनों से ही दक्षिणी पश्चिमी पवनों के रूप में मानसून भारतीय क्षेत्र में प्रवेश करता हैं. इसे दक्षिणी पश्चिमी मानसून कहते हैं.

अरब सागर की मानसून पवनें– अरब सागर से उत्पन्न होने वाली मानसून पवनें आगे तीन शाखाओं में बंट जाती हैं.

  1. इसकी एक शाखा को पश्चिमी घाट रोकते हैं. ये पवनें पश्चिमी घाट की ढालानों पर 900 से 1200 मीटर की ऊँचाई तक चढ़ती हैं. अतः ये पवनें तत्काल ठंडी होकर सहाद्री के पवनाभिमुखी ढाल तथा पश्चिमी तटीय मैदान पर भारी वर्षा करती हैं. इस घनघौर वर्षा को मानसून का फटना कहते हैं. पश्चिम घाट को पार करने के बाद ये पवनें नीचे उतरती है और गर्म होने लगती हैं. इससे इन पवनों की आद्रता में कमी आ जाती हैं. परिणामस्वरूप पश्चिम घाट के पर्व में इन पवनें से नाममात्र की वर्षा होती हैं. कम वर्षा का यह क्षेत्र वृष्टि छाया क्षेत्र कहलाता हैं.
  2. अरब सागर से उठने वाली मानसून की दूसरी शाखा मुंबई के उत्तर में नर्मदा और तापी नदियों की घाटियाँ से होकर मध्य भारत में दूर तक वर्षा करती हैं. छोटा नागपुर पठार में इस शाखा से 15 सेमी वर्षा होती हैं. यहाँ यह गंगा के मैदान में प्रवेश कर जाती है और बंगाल की खाड़ी से आने वाली मानसून की शाखा से मिल जाती हैं.
  3. इस मानसून की तीसरी शाखा सौराष्ट्र प्रायद्वीप और कच्छ से टकराती हैं. वहां से यह अरावली के साथ साथ पश्चिमी राजस्थान को लांघती हैं और बहुत ही कम वर्षा करती हैं. पंजाब और हरियाणा में यह बंगाल की खाड़ी से आने वाली मानसून की शाखा से मिल जाती हैं. ये दोनों शाखाएं मिलकर पश्चिमी हिमालय विशेष रूप से धर्मशाला में वर्षा करती हैं.

बंगाल की खाड़ी की मानसून पवनें– बंगाल की खाड़ी की मानसून पवनों की शाखा म्यामार के तट तथा दक्षिण पूर्वी बांग्लादेश के एक थोड़े से भाग से टकराती हैं. किन्तु म्यांमार के तट पर स्थित अराकान पहाड़ियाँ इस शाखा के एक बड़े हिस्से को भारतीय उपमहाद्वीप की ओर विक्षेपित कर देती हैं.

इस प्रकार मानसून पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में दक्षिण पश्चिम दिशा की अपेक्षा दक्षिणी व दक्षिणी पूर्वी दिशा से प्रवेश करती हैं. फिर इसकी एक शाखा गंगा के मैदान के साथ साथ पश्चिम की ओर बढ़ती हैं. और पंजाब के मैदान तक पहुँचती हैं तथा इसकी दूसरी शाखा उत्तर व उत्तर पूर्व में ब्रह्मपुत्र घाटी में बढ़ती हैं. यह शाखा वहां विस्तृत क्षेत्र में वर्षा करती हैं. इसकी एक उपशाखा मेघालय में स्थित गारो और खासी की पहाड़ियों से टकराती हैं. खासी पहाड़ियों के शिखर पर स्थित मनसिराम विश्व की सर्वाधिक औसत वर्षा प्राप्त करता हैं. देश की 3/4 वर्षा दक्षिणी पश्चिम मानसून की ऋतु में ही होती हैं.

तमिलनाडु तट वर्षा ऋतु में शुष्क रह जाता हैं क्योंकि

  1. तमिलनाडु तट बंगाल की खाड़ी की मानसून पवनों के समानांतर पड़ता है तथा
  2. यह दक्षिणी पश्चिमी मानसून की अरब शाखा के वृष्टि क्षेत्र में स्थित हैं.

मानसून के प्रत्यावर्तन की ऋतु या शरद ऋतु

मानसून की वापसी भारत के उत्तर पश्चिमी राज्यों से सितम्बर में प्रारम्भ हो जाती हैं. मध्य अक्टूबर तक मानसून भारतीय प्रायद्वीप के उत्तरी भाग में पूरी तरह से पीछे हट जाता हैं. लौटती हुई मानसूनी पवनें बंगाल की खाड़ी से जलवाष्प ग्रहण करके उत्तर पूर्वी मानसून के रूप में तमिलनाडु में वर्षा करती हैं. दिसम्बर के मध्य तक मानसून भारतीय प्रायद्वीप से पूरी तरह हट चूका होता हैं.

मानसून की वापसी होने से आसमान साफ़ एवं तापमान में वृद्धि हो जाती हैं. दिन का तापमान उच्च होता है, जबकि रातें ठंडी व सुहावनी होती हैं. स्थल अभी भी आद्र होता हैं. उच्च तापमान व आद्रता वाली अवस्था के कारण दिन का मौसम असहनीय हो जाता हैं इसे सामान्यतः क्वार की उमस के नाम से जाना जाता हैं.

द्वीपों पर मानसून की पहली वर्षा होती हैं. यह क्रमशः दक्षिण से उत्तर की ओर अप्रैल के प्रथम सप्ताह से लेकर मई के प्रथम सप्ताह तक होती हैं. मानसून की वापसी भी क्रमशः दिसम्बर से जनवरी के प्रथम सप्ताह तक उत्तर से दक्षिण की ओर होती हैं इस समय देश का शेष भाग शीत ऋतु के प्रभाव में होता हैं.

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