सिख धर्म पर निबंध – Essay on Sikhism in Hindi

सिख धर्म पर निबंध – Essay on Sikhism in Hindi: दोस्तों आपका स्वागत करता हूँ आज का हमारा निबंध गुरु नानक देव जी द्वारा स्थापित सिख धर्म पर हैं. आज के निबंध Essay on sikh religion in hindi में हम सिख धर्म का इतिहास, संक्षिप्त परिचय, गुरुओं का योगदान, शिक्षा आदि की जानकारी इस निबंध में प्राप्त करेंगे. Sikhism Essay & Essay On Sikhism में आज हम सिख धर्म इतिहास, कला, संस्कृति, वेशभूषा, परम्पराएं, रीती रिवाज, भाषा भूगोल पर्यटन स्थल आदि के बारे में इस सिक्ख धर्म के बारे आगे बात करेगे.

सिख धर्म पर निबंध – Essay on Sikhism in Hindi

सिख धर्म पर निबंध - Essay on Sikhism in Hindi

सिख सिक्ख धर्म का संक्षिप्त इतिहास History Of Sikh Dharm Facts About Sikhism Sanskriti:– सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक हैं. इन्हें सिख धर्म का प्रथम गुरु माना जाता हैं. वे सम्पूर्ण भारत, लंका, मक्का, मदीना, बगदाद तथा बर्मा में घूम घूमकर चालीस वर्ष तक धर्मोपदेश करते रहे और अंतिम समय में पंजाब के करतारपुर नामक स्थान पर इनकी मृत्यु हुई.

Essay on Sikhism in Hindi

गुरु नानक ने अपनी मृत्यु से पूर्व अपने प्रिय शिष्य लहना, जिसे बाद में गुरु अंगद के नाम से जाना गया, को अपना उतराधिकारी बनाया. गुरु अंगद ने करतारपुर में लंगर भोजन की व्यवस्था की. गुरु अंगद के पश्चात सिख धर्म के आठ गुरु हुए.

इनमें पांचवें गुरु अर्जुन देव ने अमृतसर में स्वर्ण मन्दिर का निर्माण कराया जो कि सिखों का पवित्र स्थल हैं. इसके साथ ही गुरु अर्जुन देव ने विभिन्न धार्मिक पदों को एकत्र कर उन्हें गुरु ग्रंथ साहिब के रूप में संकलित किया. यह सिख धर्म का पवित्र, प्रमाणिक और मौलिक धर्म ग्रंथ हैं.

1606 ई में बादशाह जहाँगीर के उत्पीड़न का शिकार होने के कारण शहीद हो गये. सिक्खों के अंतिम और दसवें गुरु थे गुरु गोविन्द सिंह. अप्रैल 1699 में उन्होंने खालसा संघ की स्थापना की. खालसा का अर्थ होता है विशुद्ध.

उन्होंने संतों सहित आम सिखों का सैन्यीकरण किया. उन्होंने सर्वप्रथम अपने पांच अनुयायियों को खालसा पंथ की दीक्षा दि और उन्होंने उन्हें पांच चीजे धारण करने के आदेश दिए, ये चीजे थीं केश, कंघा, कड़ा, कच्छा और कृपाण. जाति एवं वंश के भेद को समाप्त करते हुए उन्होंने उन सभी को सिंह का उपनाम प्रदान किया.

उन्होंने उन्हें सच्चाई तथा अत्याचार के विरुद्ध लड़ने का उपदेश दिया. धूम्रपान व नशीली वस्तुओं के सेवन का निषेध किया. उनके चार पुत्र थे जो धर्म की रक्षार्थ युद्ध में शहीद हो गये तथा गुरु गोविन्द सिंह की भी नांदेड़ हैदराबाद में एक हमलावर द्वारा 1708 में हत्या कर दी गई.

उन्होंने मृत्यु के पूर्व घोषणा की थी कि आगे से सिखों का कोई गुरु जीवित गुरु नहीं होगा. गुरु ग्रंथ साहिब ही सिखों का आध्यात्मिक मार्ग प्रशस्त करेगा और खालसा ही दस गुरुओं का जीवित प्रतिनिधि होगा.

सिखों के प्रमुख त्योहार

सिख धर्म के अनुयायियों के लिए सबसे बड़ा पर्व गुरु पर्व कहलाता हैं. इसे गुरु नानक देवजी की जयंती अथवा प्रकाश पर्व के रूप में भी मनाते हैं. यह वही दिन था जब गुरु नानक का अवतरण हुआ था. हिन्दू पंचांग के अनुसार कार्तिक माह की पूर्णिमा के दिन गुरु नानकदेव जयंती पर्व होता हैं. सिख समुदाय के प्रसिद्ध पर्वों एवं त्योहारों में लोहड़ी एवं वैशाखी  हैं जिन्हें संसार भर में बसने वाला सिख बड़े हर्ष और उल्लास के साथ मनाता हैं.

सिख धर्म की स्थापना तथा आज तक के दौर तक हजारों सिख सिपाहियों ने कठोर यातनाएं सही, शासकों के अनाचार सहे मगर धर्म की राह से कभी पीठ नहीं दिखाई. प्रत्येक नानक सिपाही ने धर्म को अपने कर्तव्य के रूप वरण कर उसकी रक्षा की खातिर जान तक अर्पित कर दी. सिख धर्म हमें एकता एवं मानव मात्र की मदद करने का संदेश देता हैं.

सिख धर्म की शिक्षाएं उपदेश व सिद्धांत (Teaching & Essay on Sikhism in Hindi)

सिख आंदोलन कर्मकांडों का विरोधी– सिख धर्म के प्रवर्तक गुरु नानक ने हिन्दू धर्म में व्याप्त कुरीतियों और कर्मकांडों का विरोध किया. उन्ही के शब्दों में मेरा दीप तो ईश्वर का नाम है जिसमें लोगों के दुखों का तेल डाला हुआ हैं. इस दीप ने मेरे मृत्युभय रुपी अंधकार को भगा दिया हैं. मरे हुए को पिंड या पतल क्या देना. वास्तविक कर्मकांड तो ईश्वर का सत्य नाम हैं जो सर्वज्ञ मेरा उद्धारक हैं.

जब गुरु नानक देव ने लोगों को प्रातःकाल पितरों को जल द्वारा तर्पण करते देखा तब गुरु नानक भी पश्चिम मे जल उछालने लगे. इससे लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ और उन्होंने इस सम्बन्ध में नानक देव से प्रश्न किया जिसका उत्तर गुरु नानक ने यह दिया कि आपके द्वारा उछाला गया जल पितरों तक पहुच सकता है तो मेरे द्वारा उछाला गया यह जल भी खेतों में पहुच सकता हैं. आगे लोग गुरुनानक से इतने प्रभावित हुए कि उनके उपदेश सुनकर लोग आश्चर्यचकित रह गये.

एक ही ईश्वर में आस्था- सिख धर्म के अनुसार संसार का एक ही ईश्वर है और वही सर्वत्र व्यापक है. वह काशी में भी हैं. तो वही काबा में भी हैं. वे मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं करते हैं. गुरु नानक देव का यह दृढ विश्वास था कि प्रत्येक व्यक्ति अपने ही धर्म में रहता हुआ एक सर्वशक्तिमान व अलौकिक शक्ति में आस्था रखकर ब्रह्मा या सत्य की प्राप्ति कर सकता हैं.

समानता पर जोर– सिख धर्म में ऊँच नीच का कोई भेद नहीं हैं. जन्म से परमात्मा ने सबको समान बनाया हैं. यदि कोई व्यक्ति समाज में छोटा या बड़ा बनता है तो वह अपने कर्मों से. सिख गुरुओं ने तो स्त्री और पुरुषों के अधिकारों तक में समानता की बात कही हैं. वे दोनों को एक ही श्रेणी का समझते हैं. इससे स्पष्ट है कि सिख धर्म में समानता पर विशेष जोर दिया गया हैं.

वैयक्तिक अहंकार को महत्व नहीं- सिख धर्म में वैयक्तिक अहंकार को कोई स्थान नहीं हैं. गुरु नानक के ही शब्दों में जब तक मन को मारकर उसे वंश में न कर लिया जाए, तब तक कोई कार्य सिद्ध नहीं हो सकता. इसको अपने वंश में करना तभी सम्भव हैं जब इसे निर्गुण राम के गुणों के उलझन में डाल दिया जाए. तब कहीं जाकर मन उस एकाकार में ठहर सकेगा. उनका मानना था कि हठ और निग्रह करने मात्र से शरीर नष्ट होता हैं. और मन को केवल राम नाम की सहायता से ही वश में किया जा सकता हैं.

गुरु के प्रति गहरी निष्ठा– सिख धर्म में ईश्वर प्राप्ति के लिए सच्चे गुरु के प्रति गहरी आस्था प्रकट की गई हैं. गुरु नानक ने कहा है कि हमें अपने आध्यात्मिक जीवन के अंत तथा प्रारम्भ का अनुभव गुरु के मिलने पर ही होता हैं. गुरु के मिलने से गर्व भी दूर हो जाता हैं और मुक्तावस्था प्राप्त होती हैं. जिससे प्रभु की शरण में हमें स्थान मिल जाता हैं.

उनके अनुसार संसार में चाहे जितने ही मित्र व सखा क्यों न हो, परन्तु गुरु के बिना परमेश्वर के अस्तित्व का बोध नहीं हो सकता. गुरु के शब्द हमें मानव के भीतर हीरे, रत्नों को पहचानने की शक्ति प्रदान करते हैं. दस सिक्ख गुरुओं के उपदेश को ही साक्षात गुरु की तरह वे मानते हैं. गुरु ग्रंथ साहिब उनका सच्चा गुरु हैं. इस प्रकार स्पष्ट हैं कि सिख धर्म में ईश्वर की प्राप्ति के सच्चे गुरु का होना आवश्यक माना गया हैं.

खालसा संघ गुरुओं का जीवित प्रतिनिधि- गुरु गोविंद सिंह ने खालसा पंथ की स्थापना की. इसकी दीक्षा में पांच चीजों को अपनाने का महत्व दिया गया हैं. केश, कंघा. कड़ा, कच्छा और कृपाण.

  • केश – इसलिए आवश्यक समझे गये ताकि एक सिख साथी को आसानी से पहचान सके.
  • कंघा- बढ़े हुए बालों को व्यवस्थित रूप देने के लिए
  • कृपाण- विरोधी समूह से रक्षा के लिए
  • कछे का प्रयोग नग्नता से बचने के लिए
  • कड़े का प्रयोग मुसलमान सैनिकों द्वारा अपवित्र की वस्तुओ को शुद्ध करने के लिए

कर्म को महत्व- गुरुनानक के अनुसार एक अच्छे सिख को जीवन में कभी भी भिक्षा या दूसरों की कमाई पर निर्भर नहीं रहना चाहिए. उसे अपनी जीविका ईमानदारी तथा परिश्रम से निभानी चाहिए. बिना तीर्थ किये एक साधारण गृहस्थ कुछ समय ईश्वर का स्मरण कर अच्छा सिख बन सकता हैं लेकिन उसका मानना था कि परिश्रम और सच्चाई का रास्ता ही सच्चा रास्ता हैं. वह इस सिद्धांत में विश्वास करता है कि जैसा कर्म करेगा उसको वैसा ही फल मिलेगा. अच्छे कर्म ही उसे सत्य की ओर ले जाते है और बुरे कर्म उसे नर्क का रास्ता दिखाते हैं.

गुरु ग्रंथ साहिब की महत्ता– सिख धर्म में सभी को समानता का अधिकार हैं. सिखों में पुरोहिताई की कोई व्यवस्था नहीं हैं सिखों के मन्दिर गुरुद्वारे के नाम से जाने जाते हैं. सामान्यतः प्रत्येक गुरूद्वारे में एक ग्रंथी की नियुक्ति की जाती हैं. ग्रंथी का कार्य होता हैं कि गुरु ग्रंथ साहिब का पाठ करना, गुरुद्वारे में होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों को सम्पन्न करना और गुरूद्वारे की देखरेख करना. सिख गुरु ग्रंथ साहिब का अत्यधिक आदर करते हैं जब कभी आवश्यकता पड़ने पर एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाना पड़े तो वे गुरु ग्रंथ साहिब को अपने सिर पर रखकर ले जाते हैं.

गुरुद्वारों का महत्व- सिखों के धार्मिक, सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन में गुरूद्वारे की महत्वपूर्ण भूमिका हैं. गुरूद्वारे में लंगर के समय सभी सिखों को बिना किसी के भेदभाव के साथ बैठकर खाना खाते हैं.

सिख धर्म का भारतीय समाज पर प्रभाव – Short Essay on Sikhism in Hindi Language

सिख धर्म का भारतीय समाज पर प्रभाव- भारतीय समाज पर सिख धर्म के प्रभाव को निम्न बिन्दुओं के अंतर्गत स्पष्ट किया जा सकता हैं.

  • कर्मकांडवाद तथा अंधविश्वासों में कमी- सिख धर्म के प्रभाव के कारण भारत में रूढ़ियों और अन्धविश्वास में कमी आई तथा कर्मकांडवाद घटा. हिन्दू धर्मावलम्बियों ने भी हिन्दू धर्म की इन विकृतियों को दूर करने के प्रयत्न किये.
  • एकेश्वरवाद की धारणा को बल- सिख धर्म ने भारत में एकेश्वरवाद की धारणा को बल प्रदान किया. जिससे भारत में अपने अपने देवताओं को लेकर जो संघर्ष चल रहे थे उनमे थोड़ी कमी आई.
  • असमानता पर प्रहार– सिख धर्म ने हिन्दू धर्म में प्रचलित ऊँच नीच की असमानता पर समानता का प्रहार किया. जाति प्रथा की आलोचना की जिससे विचलित होकर हिन्दू धर्म भी इन कुरीतियों को दूर करने के लिए सुधारवादी आंदोलन प्रारम्भ हुए और भारतीय समाज में असमानता को दूर करने के गम्भीर प्रयास हुए.
  • व्यापकता- सिख धर्म एक व्यवहारवादी धर्म हैं इसे आसानी से व्यवहार में अपनाया जा सकता हैं. इसलिए भारतीय समाज पर इसका व्यापक प्रभाव हुआ और इसे व्यापक रूप से लोगों ने अपनाया.
  • हिन्दू धर्म की इस्लाम से रक्षा- सिख धर्म हिन्दू धर्म का ही एक भाग हैं. हिन्दू धर्मावलम्बियों ने या सिख गुरुओं ने मुसलमानों से हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए सिख धर्म को ग्रहण किया और उसकी रक्षा कर हिंदुत्व को अमरता प्रदान की.
  • अन्य प्रभाव– सिख धर्म ने भारत के अन्य धर्मावलम्बियों विशेषकर हिन्दू धर्मावलम्बियों को त्याग और बलिदान का पाठ पठाया और धर्म की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति देने की प्रेरणा दी.

सिख धर्म का उदय अर्थ व महत्व

सिख धर्म तुलनात्मक रूप से एक नवीन धर्म हैं. इसके संस्थापक गुरु नानक देव हैं. हिन्दू धर्म के कर्मकांडी स्वरूप के बढ़ जाने तथा उसके आडम्बरों जादू टोनों, मंत्र तंत्र आदि क्रियाओं के विरोध में 15 वीं शताब्दी में अनेक समाज सुधार आंदोलनों ने जन्म लिया. उनमें से एक सिख आंदोलन भी था. जिसके संस्थापक गुरु नानक देव थे. नानक ने अन्धविश्वास और कर्मकांड से पीड़ित मानव जाति को मुक्ति का नया रास्ता दिखाया, उसे ही सिख धर्म के नाम से जाना जाता हैं.

निष्कर्ष

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि सिख धर्म लगभग 500 वर्ष पुराना है और इसका उदय भारत भूमि पर ही हुआ हैं जैसा कि जैन और बौद्ध धर्म का उदय हुआ, सिख धर्म भी हिन्दू धर्म की असमानतापरक तथा अंधविश्वासों और कर्मकांडी कुरीतियों के विरोध में हुआ तथा हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए खालसा पंथ का विकास हुआ. यह धर्म निर्गुणवादी विचारधारा लेकर चला हैं और सगुण वादी मूर्तिपूजा का विरोधी हैं.

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