मृदा पर निबंध Essay On Soil In Hindi

मृदा पर निबंध Essay On Soil In Hindi: नमस्कार दोस्तों आज का निबंध मृदा अथवा मिट्टी पर दिया गया हैं. प्रत्येक जीवित प्राणी का मिट्टी से अस्तित्व जुड़ा है यह हवा, जल की तरह आवश्यक संसाधन है. आज के निबंध, भाषण, अनुच्छेद (पैराग्राफ) में हम जानेगे कि मृदा क्या है इसका अर्थ मृदा प्रदूषण अपरदन इसका महत्व इस शोर्ट निबंध में दिया गया हैं.

मृदा पर निबंध Essay On Soil In Hindi

मृदा पर निबंध Essay On Soil In Hindi

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Short Essay On Soil In Hindi Language

मृदा हमारे जीवन का मूल आधार हैं. अधिकांश मनुष्य बस्तियां उन्ही क्षेत्रों में मिलती है जहाँ अच्छी और उपजाऊ मृदा उपलब्ध हैं. मृदा, पेड़ पौधों की वृद्धि के लिए एक प्राकृतिक माध्यम हैं. पौधे अपने भोजन के अधिकतर पोषक तत्व मृदा से ही प्राप्त करते हैं.

वनस्पति जीवन के लिए महत्वपूर्ण यह मृदा मूल शैलों के विखंडित पदार्थों से बनती हैं. इसमें अनेक खनिज पदार्थ जीवाणु, फफूंद और छोटे बड़े अनेक प्रकार के कीड़े मकोड़े रहते हैं. मृदा में मिलने वाले ये सभी तत्व और जीवाणु उसकी उर्वरता को प्रभावित करते हैं.

चट्टानों के प्रकार, जमीन की भौतिक विशेषताओं, जलवायु और वनस्पतियों आदि के संबध में विभिन्न स्थानों में अंतर होता हैं यही कारण है कि पृथ्वी के धरातल पर विभिन्न प्रकार की मिट्टी पाई जाती हैं. मिट्टी में विभिन्नताओं के कारण ही हमें विभिन्न प्रकार की फसलें, घास तथा पेड़ पौधें प्राप्त होते हैं.

जिस मृदा में पौधे और फसलें आसानी से पैदा हो जाती है, उसे उर्वर मृदा तथा जिसमें कोई भी पौधें नहीं उगते हो उसे अनुर्वर या ऊसर मृदा कहा जाता हैं. सामान्यतः नदी घाटियों की मिट्टी उपजाऊ होती हैं. इसके विपरीत पर्वतीय और पहाड़ी ढालों पर स्थित छिछली और अनुपजाऊ मिट्टी खेती के लिए बहुत कम महत्व की होती हैं.

इस प्रकार मिट्टी की किस्म का कृषिगत उत्पादन से प्रत्यक्ष संबध होता हैं. क्षेत्र की जलवायु, धरातल और चट्टानों में विविधता का प्रभाव मृदा आकारिकी एवं उसके भौतिक व रासायनिक गुणों पर पड़ता हैं जो देश में भिन्न भिन्न प्रकार की मिट्टियों को जन्म देता हैं.

Essay # 1. मिट्‌टी का अर्थ (Meaning of Soil):

विभिन्न रासायनिक घटकों के मिश्रण को सरल भाषा में मृदा कहा जाता हैं. मूल रूप से मृदा अवक्रमिक शिलाओं के टूटने से बनती हैं जिसमें बाद में अन्य रासायनिक पदार्थों मिल जाते हैं. भले ही मृदा स्वतः निष्क्रिय रूप में हो मगर इसमें अनगिनत रासायनिक अपघटक एवं अभिक्रियाएँ सदैव चलती रहती हैं.

जीवशास्त्रियों ने मृदा को अजैविक घटक मानने के साथ ही जीवन के लिए आवश्यक सबसे मूलभूत पदार्थों में से एक मानकर इसे जीवन सहायक की भूमिका के रूप में अध्ययन का विषय माना हैं. मृदा परत के रूप में पृथ्वी की ऊपरी सतह पर पाई जाती हैं जो पौधों को कठोर आधार प्रदान करती हैं. मृदा में ही एक बीज जल वायु और खाद के सम्पर्क में आने पर पौधें का रूप धारण करता हैं.

Essay # 2. मृदा अपरदन या क्षरण (soil erosion)

मिट्टी की एक से दो सेंटीमीटर मोटी परत बनने में लगभग दो शताब्दियाँ लग जाती हैं, किन्तु यह बनी बनाई मिट्टी कुछ ही समय में नष्ट हो सकती हैं. मृदा की ऊपरी सतह पर से उपजाऊ मृदा का स्थानांतरित हो जाना मिट्टी का कटाव या मृदा का अपरदन कहलाता हैं.

इससे मृदा के पौषक तत्व भौतिक बनावट व रासायनिक सरंचना विनष्ट हो जाती हैं व उर्वरा शक्ति क्षीण हो जाती हैं. मृदा का स्थानांतरण बहते हुए जल, पवन अथवा हिम के साथ होता हैं. मृदा क्षरण को रेंगती हुई मृत्यु (Creeping death) कहा जाता है.

मृदा क्षरण या अपरदन दो प्रकार से होता हैं.

  • जलीय क्षरण- जल के विभिन्न रूपों नदियों, झीलों, हिमानी झरनों आदि से मृदा का क्षरण होता हैं. इनमें से नदिया बहते पानी के रूप में सर्वाधिक मृदा क्षरण करती हैं. इससे मृदा क्षरण मुख्यतः जलीय क्षरण व अवनलिका क्षरण के रूप में होता हैं जल द्वारा मृदा की ऊपरी सतह को हटा देने को तलीय या परत क्षरण कहते हैं. जब जल तेजी से बहता हुआ मृदा को कुछ गहराई तक काट देता है तो इसे अवनलिका क्षरण कहते हैं.
  • वायु क्षरण– मरुस्थलीय क्षेत्रों तथा शुष्क व अर्द्धशुष्क मैदानों में जहाँ वायु अबाध रूप से चलती हैं वायु द्वारा मृदा क्षरण होता हैं. इसमें वायु द्वारा मिट्टी का एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाकर बिछा दी जाती हैं.

Essay # 3. मृदा अपरदन के कारण (Cause Of soil erosion)

  1. वनों का हास तथा अन्धान्धुध कटाई
  2. वर्षा पूर्व मरुस्थलीय अंधड़
  3. कृषि के अवैज्ञानिक तरीके
  4. ढालू भूमि में जल की तेज धारा से मृदा अपरदन
  5. चारागाहों पर अंधाधुध चराई भेड़ बकरियों द्वारा वनस्पति को अंतिम बिंदु तक चरकर उसे खोखला बना दिया जाता हैं.
  6. पहाड़ी क्षेत्रों में आदिवासियों द्वारा वालरा कृषि

समस्या के कुप्रभाव

  • भीषण तथा आकस्मिक बाढ़ों का प्रकोप
  • निरंतर सूखा
  • भू जल स्तर का गिरना
  • नदी/ नहरों का मार्ग अवरोधित होना
  • कृषि उत्पादन का निरंतर क्षय
  • वायु अपरदन से बोई गई फसल का अंकुरण नहीं होना.

Essay # 4. मृदा अपरदन को रोकने के उपाय (Measures to prevent soil erosion)

  1. जंगलों व चारागाहों की वृद्धि करना
  2. चराई पर नियन्त्रण रखना
  3. खेतों में मेडबंदी करना
  4. ढालू भूमि पर कंटूर कृषि को बढ़ावा देना
  5. पट्टीदार खेती को प्रोत्साहित करना
  6. फसलों को हेर फेर क्र बोना एवं समय समय पर खेतों को पड़ती छोड़ना
  7. नदी के तेज बहाव को रोकने के लिए बांधों का निर्माण करना
  8. वृक्षारोपण करना ताकि मरुस्थलीय क्षेत्रों में मिट्टी को उड़ने से रोका जा सके तथा नदी के किनारों पर मिट्टी के कटाव को रोका जा सके.
  9. मरुभूमि के अनुकूल वृक्षों जैसे खेजड़ी, कीकर, रोहिड़ा, जोजोबा, नीम, बोरडी, फोग आदि की खेती को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए.
  10. सिंचाई के साधनों का विकास किया जाना चाहिए ताकि जलाभाव की समस्या दूर हो सके व अधिकाधिक वृक्षारोपण किया जा सके.
  11. सूखी खेती को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए तथा बूंद बूंद सिंचाई व फव्वारा सिंचाई का उपयोग किया जाना चाहिए.
  12. ऊर्जा के वैकल्पिक व पुनर्नवीकरणीय स्रोतों का विकास किया जाना चाहिए ताकि कोयले व जलाने की लकड़ी की बचत कर जंगलों को कटने से रोकना चाहिए.

लवणीयता व क्षारीयता की समस्या: पानी के अत्यधिक प्रयोग की वजह से भूमि में लवणीयता व क्षारीयता की समस्या बढ़ी है जिससे भूमि बंजर हो जाती हैं.

मिट्टी में लवणीयता की समस्या को कम करने के लिए रॉक फास्फेट का प्रयोग किया जाता हैं. धमासा व सुबबूल आदि खरपत वार को मिट्टी में दबाने से भी यह समस्या कम हो जाती हैं. मिट्टी की क्षारीयता को दूर करने हेतु ग्वार एवं ढेंचे की फसल को काट कर खेत में ही दबा दिया जाता हैं. अथवा जिप्सम का प्रयोग किया जाता हैं. मिट्टी के उपजाऊपन को बनाए रखने हेतु लाभदायक सूक्ष्म जीवों एवं केंचुओं को संरक्षण प्रदान किया जाना चाहिए.

सेम की समस्या: नहरी जल के रिसाव व अत्यधिक सिंचाई के कारण भूजल स्तर के उपर आ जाने से भूमि का दलदली हो जाना सेम की समस्या हैं. इससे भूमि की उर्वरा शक्ति नष्ट हो जाती हैं.

सेम की समस्या का निदान

  1. दलदली क्षेत्रों में पानी की निकासी हेतु ड्रिप ड्रेनेज कैनाल का निर्माण प्राकृतिक ढाल को ध्यान में रखते हुए किया जाना चाहिए.
  2. पानी के रिसाव को न्यूनतम करने हेतु नहर की मरम्मत व लाइनिंग कार्य किया जाना चाहिए.
  3. सिंचाई की आधुनिकतम तकनीकों बूंद बूंद सिंचाई पद्धति व फव्वारा सिंचाई पद्धति का प्रयोग किया जाना चाहिए.
  4. सेम नाला बनाकर पानी पुनः नहर में डाला जाना चाहिए
  5. सिंचाई योग्य भूमि में वृद्धि करना.

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दोस्तों उम्मीद करता हूँ मृदा पर निबंध Essay On Soil In Hindi का यह निबंध आपकों पसंद आया होगा. मृदा तथा मृदा अपरदन पर दिए गये निबंध (Essay) में दी गई जानकारी आपकों कैसी लगी कमेंट कर जरुर बताएं, यह जानकारी अच्छी लगी हो तो इसे अपने दोस्तों के साथ भी जरुर शेयर करें.

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