Essay on Superstition in Hindi | अंधविश्वास पर निबंध

Essay on Superstition in Hindi अंधविश्वास पर निबंध आज हम 21 वीं सदी में जी रहे हैं कहने को तो भारतीय समाज आधुनिक एवं विकसित माना जाता हैं फिर भी अंधविश्वास व रूढ़ियों को आज भी हम यूँ ही ढोते जा रहे हैं एक तरफ हम चाँद व मंगल पर मानव जीवन की सम्भावनाओं की तलाश कर रहे हैं दूसरी तरफ आज भी बिल्ली के रास्ता काट देने पर हम कार्य को अगले दिन के लिए टाल देते हैं. आज का हमारा निबंध Speech भाषण अंधविश्वास (Superstition) के बारे में दिया गया हैं.

Essay on Superstition in Hindi | अंधविश्वास पर निबंध

Essay on Superstition in Hindi अंधविश्वास पर निबंध

भारत बहुत बड़ा देश है जहाँ दर्जनों धर्म मजहब के लोग निवास करते हैं. जिनकी अपनी अपनी मान्यताएं व रीति रिवाज होते हैं मगर सभी में प्रायः एक समानता देखी जाती हैं वो हैं अंधविश्वास और आडम्बर की. समाज के लिए यह बेहद घातक होता हैं. अंधविश्वास उस प्रथा या रीति रिवाज को कहते हैं जिन्हें बिना सोचे समझे उस पर विश्वास कर अनुकरण करने लगते हैं.

एक प्रगतिशील समाज के लिए अंधविश्वास जैसी चीजे प्रगति व नई सोच की बाधक होती हैं, जिसकी जड़ में अज्ञानता बसी होती हैं. अंधविश्वासी व्यक्ति के मन में भय, निराशा, असहायता, निर्भरता व ज्ञान की कमी का घर होता हैं. मगर आज के पढ़े लिखे नौजवान भी उन पुराने रीति रिवाजों व आडम्बरों में स्वयं को लिप्त रखना चाहते हैं जिनकें मूल में कोई वैज्ञानिक आधार नहीं होता हैं.

आज के तकनीकी एवं विज्ञान की प्रगति के दौर में भी अंधविश्वास का होना तथा कठोरता से उनका पालन करना हमारी बौद्धिक कमजोरी के दर्शन करवाता हैं. समाज में ऐसे बहुत से कार्य जिन्हें सामान्य व्यक्ति समझ नहीं पाता अतः वह उसे चमत्कार मान लेता हैं तथा किसी दैवीय कारण या प्राचीन परम्परा के रूप में इसकी पालना करने लग जाता हैं.

हम बाकी दुनिया से अपनी एक अलग ही दुनियां रसा बसा लेते हैं जिनकें नियम बड़े हास्यास्पद लगते हैं जहाँ कोई राह चलते छींक दे अथवा बिल्ली रास्ता काट ले अथवा विधवा के दर्शन हो जाए तो यात्रा को रोक लेते हैं, ऐसे प्रतीक दिखने कुछ बहुत बुरा होने के संकेत मान लेते हैं. संख्या 13 के अंक तो अशुभ ही मान लिए हैं.

रात में उल्लू या भेड़िये की आवाज सुनाई पड़े तो उस दिशा में अंगार फेकना अथवा कुछ अप्रिय न हो इसकी आशंका से अपने इष्ट को याद करना ये सब अंधविश्वास और अज्ञान हैं. हमारे इस तरह के क्रियाकलाप मानव सभ्यता को अपने आदिम युग में ले जाते हैं. बहुत से घरों के द्वार पर घोड़े की नाल बांधना, दुकान अथवा ऑफिस के द्वार पर नींबू मिर्च का लटकाना वाकई बड़ा हास्यास्पद लगता हैं.

ऐसा भी नहीं है कि अंधविश्वास केवल हमारे भारत देश में ही हैं बल्कि यह हर उस जगह विविध रूपों में विद्यमान हैं जहाँ मानव की बसावट हैं. कुछ दशक पूर्व तक यह माना जाता था कि शिक्षा की कमी के चलते लोग इस तरह के विश्वास को पालते हैं. मगर शिक्षित लोगों को भी यह करते देखकर तो केवल इतना कहा जा सकता हैं कि हम जैसा चला आ रहा हैं बस उसी के साथ जीवन बिता देना ही पसंद करते हैं.

वैसे गरीब तथा अशिक्षित वर्ग में अंधविश्वास अधिक होता हैं. तांत्रिक, भोपे आदि क्रियाकलापों एवं भय दिखाकर मासूम लोगों को सच्चाई से दूर रखकर अपना कारोबार चलाते हैं. समाज के प्रत्येक तबके तक वैज्ञानिक सोच को प्रसारित कर समाज से हम अंधविश्वास को मिटा सकते हैं. शिक्षित एवं जागरूक नागरिकों को चाहिए कि वे आम लोगों के समझ में न आने वाले अन सुलझे रहस्यों को प्रत्येक व्यक्ति को सिद्धांत, तर्क, प्रयोग के जरिये सुलझाए तभी हम अंधविश्वास को जड़ों से खत्म कर सकते हैं.

चिकित्सा तथा विज्ञान की प्रगति का ही परिणाम हैं कि भारतीय समाज के बौद्धिक स्तर में समाया अंधविश्वास कुछ हद तक कम हुआ हैं. शताब्दी भर पहले तक सती प्रथा, डाकन प्रथा, मानव व पशु बलि आम घटनाएं हुआ करती थी. मगर आज विज्ञान की प्रगति के चलते भले ही नर बलि जैसे कृत्य चल रहे हो मगर इसको सही बताने वालों की संख्या सीमित तथा विरोध करने वालों की तादाद बढ़ी हैं.

अंधविश्वास पर निबंध और घटनाएँ, कारण, नुकसान Short Speech & Essay on Superstition Disadvantages, Causes, Growing Incidents in Hindi Language

विश्वास और अंधविश्वास के मध्य एक हल्की सी लकीर होती हैं. हम कब उस लकीर को पार कर अंधविश्वास की अँधेरी राह पर बढ़ जाते हैं, इसका आभास नहीं होता. यह अंधविश्वास व्यक्ति को उकसाता है कि वह अपनी सोच के दायरे को इतना संकीर्ण लेकिन मजबूत कर ले कि उसके आसपास का हर व्यक्ति जकड़ जाए.

नवरात्रा के दसवें दिन राजस्थान के प्रतापगढ़ में जो कुछ परम्परा के नाम पर घटित हुआ वह विचलित करने वाला हैं. नेजा जुलुस के दौरान बच्चों को लेटा कर उनके ऊपर एड़ी रखकर आगे बढ़ता भोपा दरअसल हमारे अंधविश्वास का प्रतीक हैं. जिसकों भरोसे में तब्दील करने की कोशिश की जाती हैं.

यहाँ यह मान्यता है कि भोपों के ऐसे कृत्यों से बच्चों की बीमारियाँ ठीक हो जाती हैं. अहम सवाल यह है कि आखिर ये अंधश्रद्धा कहाँ से प्रकट होती हैं. दरअसल यह सब उस प्रक्रिया की पुनरावृत्ति की परिणिति होती है, जो किसी समूह या समाज में होने पर एक जैसा परिणाम देता दिखता हैं.

हालांकि ये मान्यताएं सदैव तर्कविहीन होती हो, ऐसा भी नहीं हैं. परन्तु बच्चों के ऊपर चलकर जाने से वे जीवन भर अस्वस्थ नहीं होंगे, यह मान्यता नहीं है अपितु यह एक ऐसी सत्ता नियंत्रण की प्रक्रिया हैं जहाँ कोई व्यक्ति स्वयं सर्वशक्तिमान बन बैठता है और निर्धन, असहाय एवं निरक्षर व्यक्तियों के समूह के मस्तिष्क में अपनी बात बिठा देता हैं. जिससे वह ईश्वर के समकक्ष हो जाता हैं.

इस तरह के भोपों का जाल पुरे भारत में फैला हुआ है और वे अधिकतर समाज के कमजोर वर्ग को अपना शिकार बनाते हैं परम्परा के नाम पर बच्चों को सहजता से इसलिए शिकार बनाया जाता हैं क्योंकि वे अपना दर्द बयान नहीं कर सकते. बीमारी से बचने के लिए भोपों का सहारा लेने की इस कुप्रथा के लिए चिकित्सकों की कमी ज्यादा जिम्मेदार हैं. आम लोगों तक सस्ती चिकित्सा पहुंचेगी तब जाकर ही भोपों का मायाजाल टूटेगा.

समस्या केवल यह नहीं है, समस्या की वास्तविक जड़ तो यह है कि विज्ञान की ओर कदम दर कदम बढ़ाता समाज जब इन घटनाओं से दो चार होता है तो उसका विरोध क्यों नहीं करता. यहाँ तक कि शिक्षित समाज और नगरों में भी ऐसे अंधविश्वास की जड़े खूब फलती फूलती नजर आती हैं.

अपने दावे को सिद्ध करने के लिए भोपा कहानियों का ऐसा मायाजाल बुनते है कि हर कोई उस अंधविश्वास पर विश्वास करने लगता हैं. और कब वह विश्वास मान्यता बन जाती हैं पता ही नहीं चलता. ऐसा नहीं है कि प्रतापगढ़ के नेजा जुलुस को शिक्षित समाज पिछले अनेक वर्षों से नहीं देखता आया होगा, परन्तु क्यों किसी ने इसके विरुद्ध आवाज नहीं उठाई.

अलबत्ता आम लोगों के लिए यह परम्परा से अधिक उस विश्वास की बात है जिस पर प्रश्नचिह्न खड़ा करना यानि स्वयं को नास्तिक करार देना हैं. आम लोगों को सस्ती चिकित्सा पहुंचे तब जाकर ही हमारा समाज इस तरह के अंधविश्वासों से मुक्ति पा सकेगा. इसमें समय लगे पर इसकी शुरुआत ही अंधविश्वास पर कुठाराघात की प्रथम पहल होगी.

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