दयानंद सरस्वती पर निबंध – Essay on Swami Dayanand Saraswati in Hindi

Essay on Swami Dayanand Saraswati in Hindi: भारत में आर्य समाज के संस्थापक महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती के महान व्यक्तित्व उनके जीवन परिचय विचारों तथा उनके कार्यों को आज के निबंध के जरिये विस्तार से जानेगे. एक महान समाज सुधारक एवं अंधविश्वास, रूढ़िवादिता, विभिन्न प्रकार के आडंबरों व सभी अमानवीय आचरणों का प्रखर विरोध करने वाले दयानंद सरस्वती का निबंध [lines on swami dayanand in hindi] यहाँ पढ़ेगे.

दयानंद सरस्वती निबंध Essay on Swami Dayanand Saraswati in Hindi

दयानंद सरस्वती निबंध Essay on Swami Dayanand Saraswati in Hindi

Swami Dayanand Saraswati Essay in Hindi दयानंद सरस्वती निबंध

स्वामी दयानंद का संक्षिप्त जीवन परिचय- स्वामी दयानंद का जन्म 1824 ई में काठियावाड़ की मोरवी रियासत के टंकारा कस्बे में अत्यंत धार्मिक ब्राह्मण परिवार में हुआ था. उनके बचपन का नाम मूलशंकर था. 21 वर्ष की आयु में वे घर से निकल पड़े और 15 वर्ष तक वे ज्ञान की खोज में भटकते रहे.

1860 में वे मथुरा के स्वामी विरजानंद के शिष्य हो गये और ढाई साल तक वेदों आदि का गहन अध्ययन किया. स्वामी विरजानंद ने उन्हें देश में वैदिक धर्म का प्रचार करने की प्रेरणा दी. 1864 से स्वामी दयानंद ने सार्वजनिक रूप से उपदेश देना प्रारम्भ किया. उन्होंने देश के विभिन्न भागों का भ्रमण किया, अनेक शास्त्रार्थ किये, अनेक ग्रंथों की रचना की और 10 अप्रैल 1875 को बम्बई में आर्य समाज की स्थापना की.

30 अक्टूबर 1883 को जोधपुर में विष दिए जाने के कारण उनका अजमेर में देहांत हो गया.

स्वामी दयानंद के धार्मिक सुधार

वैदिक धर्म का पुनरुद्धार– स्वामी दयानंद ने वेदों का अध्ययन पूर्ण करके समस्त देश में घूम घूमकर अपने विचारों तथा वैदिक धर्म का प्रचार किया. वेदों को वे अपौरुषेय तथा ईश्वर मुख से निसृत मानते थे. विभिन्न मत मतान्तरों का उन्होंने विरोध किया तथा कहा कि केवल एकमात्र वैदिक धर्म ही मानव का सच्चा धर्म हैं. उन्होंने एकेश्वरवाद का प्रचार किया.

हिन्दू धर्म के आलोचकों को करारा उत्तर– स्वामी दयानंद ने हिन्दू धर्म को पतित करने वाले पाखंडों, मूर्ति पूजा, बहुदेववाद, अवतार वाद, पुरोहितवाद आदि की कटु आलोचना की. उन्होंने हिन्दू धर्म की आलोचना करने वाले ईसाई धर्म प्रचारकों तथा इस्लाम धर्म प्रचारकों का डटकर विरोध किया और उनकी आलोचनाओं का तर्क सम्मत उत्तर दिया. उन्होंने वैदिक धर्म के गौरव पर प्रकाश डाला और हिन्दुओं में आत्म सम्मान और आत्म विश्वास की भावनाएं जागृत की.

हिन्दू धर्म के मूल स्वरूप पर बल देना– दयानंद की यह मान्यता थी कि धार्मिक सुधारों के द्वारा ही भारतीय समाज में जागृति आ सकती थी और राष्ट्रीय विकास का मार्ग प्रशस्त हो सकता था. उन्होंने पुरोहितवाद, अवतारवाद, बहुदेववाद तथा मूर्तिपूजा का घोर विरोध किया तथा धर्म के वास्तविक स्वरूप पर बल दिया. उन्होंने हिन्दू धर्म के मूल स्वरूप पर बल दिया. उस स्वरूप का जिसका निर्धारण वेदों और उपनिषदों में हुआ था.

स्वामी दयानंद के सामाजिक सुधार

सामाजिक कुरीतियों का विरोध– दयानंद ने अपनी महत्वपूर्ण रचना सत्यार्थ प्रकाश में उक्त सभी कुरीतियों का विरोध किया. आज नारी शिक्षा और विधवा विवाह का समर्थन किया, सती प्रथा को पाप और क्रूरता कहकर सम्बोधित किया तथा विवाह के लिए उन्होंने पुरुष की आयु २५ वर्ष तथा कन्या की आयु १६ वर्ष निश्चित की. अंतरजातीय विवाह का समर्थन किया.

जाति प्रथा, छुआछूत तथा ऊँच नीच के भेदभाव का विरोध– स्वामी दयानंद ने जाति प्रथा, छुआछूत तथा ऊंच नीच के भेदभाव का विरोध किया और सामाजिक समानता पर बल दिया. उनका कहना था कि जाति प्रथा ने हिन्दू समाज को विभाजित एवं खोखला कर दिया हैं. अतः जाति प्रथा भारतीय समाज के लिए घातक हैं. उन्होंने छुआछूत का विरोध करते हुए कहा कि छुआछूत के लिए वेदों में कोई स्थान नहीं हैं.

स्त्रियों की दशा सुधारने पर बल देना– दयानंद ने स्त्रियों की दशा सुधारने पर बल दिया. उन्होंने स्त्रियों को पुरुषों के समान अधिकार दिए जाने पर बल दिया. उन्होंने स्त्रियों को समाज में स्त्रियों को उच्च स्थान दिए जाने पर बल दिया. उनका कहना था कि नारी केवल समाज का ही निर्माण नहीं करती अपितु एक युग का भी निर्माण करती हैं. उन्होंने बाल विवाह, बहु विवाह, सती प्रथा, दहेज प्रथा, पर्दाप्रथा कन्या वध आदि का विरोध किया और विधवा विवाह तथा स्त्री शिक्षा का समर्थन किया.

शुद्धि आंदोलन– स्वामी दयानंद ने शुद्धि आंदोलन चला कर हिन्दू धर्म की महान सेवा की. जो हिन्दू धर्म को छोड़कर अन्य धर्मों में चले गये थे, उन्हें पुनः शुद्ध कर हिन्दू बनाने का क्रांतिकारी कार्यक्रम चलाया. हजारों ईसाई व मुसलमान पुनः हिन्दू बन गये.

वेदों की ओर लौटों– स्वामी दयानंद की प्रेरणा के मुख्य स्रोत वेद थे. उनकी मान्यता थी कि केवल वैदिक विचारधारा के अनुसरण से ही हिन्दू समाज का उद्धार हो सकता हैं.

वेदों की ओर लौटों आव्हान के मूल में स्वामीजी की यह धारणा थी कि वेदों का ज्ञान यदि हिन्दू जनता को होगा, तो वे अपनी सभ्यता एवं संस्कृति को गौरवशाली बना सकेंगे. इस प्रकार वेदों के महत्व को भारतीय जनता के सम्मुख रखकर स्वामी दयानंद सरस्वती ने पौराणिक अंधविश्वास और रूढ़ियों का खंडन किया.

दयानंद के शैक्षणिक कार्य– स्वामी दयानंद ने पाश्चात्य शिक्षा प्रणाली की कटु आलोचना की और गुरुकुल प्रणाली का समर्थन किया. स्वामी दयानंद ने स्त्री शिक्षा पर भी बल दिया. कालान्तर में आर्य समाज ने देश के भिन्न भिन्न भागों में दयानंद एंग्लोवैदिक स्कूलों तथा कॉलेजों की स्थापना की तथा 1902 ई में गुरुकुल परिपाटी पर शिक्षा देने के लिए गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय की स्थापना की.

भारतीय राष्ट्रवाद को प्रोत्साहन– हिन्दू पुनरुत्थानवाद के माध्यम से भारतीय राष्ट्रवाद को जगाने वाले स्वामी दयानंद और आर्य समाज ने महत्वपूर्ण योगदान दिया. स्वामी दयानंद ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश में स्वराज्य का आदर्श प्रस्तुत किया. जिससे भारत देश वासियों को प्रेरणा मिली. उन्होंने हिंदी को राष्ट्रीय एकता का आधार माना और स्वदेशी का समर्थन व प्रचार किया.

स्वामी दयानंद के एक जीवनी लेखक ने लिखा हैं कि दयानंद का एक मुख्य लक्ष्य राजनीतिक स्वतंत्रता था. वास्तव में वह प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने स्वराज्य शब्द का प्रयोग किया. वह प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करना तथा स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग करना सिखाया. वह प्रथम व्यक्ति थे, जिन्होंने हिंदी को राष्ट्रभाषा स्वीकार किया.

निष्कर्ष– स्वामी दयानंद और आर्य समाज के प्रयासों से हिन्दुओं में एक नया आत्म विश्वास, आत्म सम्मान और नई चेतना का उदय हुआ. इस आंदोलन ने पाश्चात्य सभ्यता की चकाचौंध से चकित लोगों को भारतीय सभ्यता और संस्कृति के गौरव से परिचित कराया. स्वामी दयानंद के सम्बन्ध में प्रसिद्ध विद्वान् रोमां रोला ने कहा हैं वे इलियड के एक महान नायक के समान थे. उनमें हरक्युलिस की सी शक्ति थी. शंकराचार्य के उपरांत इतना महान संत दूसरा नहीं जन्मा.

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