शहरीकरण के दुष्प्रभाव पर निबंध – Essay on the Impact of Urbanization in Hindi

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Essay on the Impact of Urbanization in Hindi शहरीकरण के दुष्प्रभाव

Essay on the Impact of Urbanization in Hindi शहरीकरण के दुष्प्रभाव

प्रस्तावना– इक्कीसवीं सदी नगर सभ्यता की सदी है, ऐसा कहना बहुत ही सही प्रतीत होता है. कम से कम भारत में तो उजड़ते गाँव और प्रतिदिन बसते शहर यही कहानी कह रहे हैं. शहरी जीवन की बाहरी तड़क भड़क और सुख सुविधाओं से भ्रमित होकर ग्रामीण युवा शहरों की ओर भगा रहे हैं. यह बढ़ता शहरीकरण किस तरह चुपके चुपके जहर परोस रहा हैं. इस पर भोतिक सुख सुविधाओं के दीवानी का ध्यान नहीं हैं.

शहरीकरण का आशय– पहले मनुष्य छोटे समूह के रूप में एक स्थान पर रहने लगे तो ग्राम बने. जब उसने खेती करना सीखा तो उसे एक ही स्थान पर रहने की आवश्यकता हुई. यही ग्राम धीरे धीरे कस्बों, नगरों तथा महानगरों में विकसित हो गये. महा नगरों के विकास में पाश्चात्य सभ्यता का विशेष योगदान रहा हैं.

शहरों की ओर पलायन के कारण

  • शहरों में रोजगार के पर्याप्त साधन हैं, सरकारों का ध्यान बड़े उद्योगों की तरफ अधिक है जिससे लोग मजदूरी हेतु शहरों की ओर पलायन करते हैं.
  • गाँवों में आज की शिक्षा, चिकित्सा, बिजली, संचार जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव हैं. अधिक सुविधायुक्त जीवन जीने की स्वाभाविक लालसा के कारण लोग शहरों में बसने के लिए ललायित करते हैं.
  • सरकारों का ध्यान भी शहरों के विकास पर अधिक रहता हैं.

शहरीकरण का भारतीय समाज पर प्रभाव– शहरों की तीव्र वृद्धि होने से जो दुष्प्रभाव हमारे समक्ष उत्पन्न हो रहे हैं, उनमें से कुछ इस प्रकार हैं.

  1. आवास के नाम पर पेड़ काटे जा रहे हैं तथा कृषि योग्य भूमि का क्षेत्रफल घटता जा रहा हैं.
  2. जनसंख्या में वृद्धि से गंदगी में भी बढ़ोतरी हो रही हैं.
  3. पैसों की भागदौड़ में शहरी जीवन नीरस सा प्रतीत होता हैं. मानवीय मूल्य लुप्त हो रहे हैं और अपराधों में बढ़ोतरी हो रही हैं.
  4. पर्यावरण प्रदूषण शहरों की सबसे भयंकर समस्या बन चुका हैं.
  5. भूमि अधिग्रहण को लेकर किसानों का असंतोष और तीव्र विरोध अप्रिय घटनाओं का कारण बन रहा हैं. नंदीग्राम और भट्टा पारसौल जैसी घटनाएँ इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हैं.

शहरीकरण का निराकरण– बढ़ते शहरों पर नियंत्रण हेतु गाँवों में स्वरोजगार, कुटीर उद्योग आदि को प्रोत्साहन देना होगा. गाँव की प्रतिभा का उपयोग ग्रामीण विकास में ही करने की योजना निर्मित करनी होगी. कृषि को उद्योग का दर्जा प्रदान कर उससे संबंधित अन्य उद्योग जैसे- पशुपालन, डेयरी, ऑयल मिल, आटा मिल, चीनी उद्योग आदि को प्रोत्साहन दिया जाए तो लोग गांवों में रोजगार का अभाव महसूस नहीं करेंगे.

इसके अतिरिक्त संचार सुविधा, परिवहन सुविधा आदि को भी ग्रामीण संरचना की दृष्टि से विस्तारित किया जाए. शहरों की तुलना में ग्रामीणों को अधिक साधन सुविधाएं देने से लोग पलायन नहीं करेगे और बढ़ते शहरों पर नियंत्रण किया जा सकेगा.

उपसंहार– विकास के पाश्चात्य मॉडल का अंधानुकरण ही शहरीकरण की अबाध वृद्धि का कारण है. यदि ग्रामों की उपेक्षा करते हुए विकास का यही प्रयास जारी रहता है तो वह अधुरा विकास होगा. देश के लाखों गाँवों के विकास में ही देश की प्रगति का मूल मंत्र निहित हैं.

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