बड़े शहर के जीवन पर निबंध – Essay on the Life in a Big City in Hindi

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बड़े शहर के जीवन पर निबंध – Essay on the Life in a Big City in Hindi

बड़े शहर के जीवन पर निबंध - Essay on the Life in a Big City in Hindi

एक बड़े शहर में जीवन विभिन्न युद्ध के मैदानों में संघर्ष जैसा हैं. किसी पड़ोसी की सूचना पर चीनी राशन की दूकान पर पहुँच चुकी हैं. इस बात का संकेत हैं कि लड़ाई के लिए जूते कस लो. अपने नाश्ते, रात्रि भोज अथवा चाय को छोड़, अपने मित्र से भेंट को छोड़ करके बड़े शहर का निकासी चीनी लाने के लिए दौड़ पड़ता हैं. इस तरह एक व्यूह रचना कर लोग राशन की दूकान के सम्मुख खड़े हो जाए हैं.

यहाँ बड़े शहर का निवासी थकान, प्यास, पंक्ति तोड़ने वाले कम होते भंडार एवं बेईमान दुकानदार से लड़ता हैं. इस वीरोचित युद्ध के पश्चात उसे लूट मिल सकती हैं, अगर उसे नहीं मिल पाती तो उसे घर पर कमांडर द्वारा डांट खानी पड़ेगी.

बड़े श्हों में रहने वालों की बस यात्रा की अपनी एक अलग कहानी हैं. प्रत्येक सुबह उसे घर से बस स्टॉप तक की तेज दौड़ लगानी पडती हैं. जहाँ जेब कतरों से भिडंत हो सकती हैं, शरारती बच्चों से मुलाक़ात सम्भव हैं, औरतों के धक्के एवं कन्डक्टर के साथ बहस का दृश्य बन सकता हैं. पहियों पर चलते साक्षात करके में उसे चोट लग सकती हैं, मोच आ सकती हैं, हड्डी भी टूट सकती हैं.

रेलगाड़ी से यात्रा करने के लिए अग्रिम योजना बनानी पड़ती हैं. अपनी टिकट बुक कराने के लिए उसे असली युद्ध से दो महीने पूर्व युद्ध लड़ना पड़ेगा. पंक्ति में प्रतीक्षा करने के वक्त किसी को भी पिछले दरवाजे से आकर टिकट ले जाते देखकर कुछ नहीं कर सकते. बुकिंग बाबू द्वारा वक्त समाप्त हो गया हैं. यह कहने से पूर्व खीसें निपोरते देख कर बर्दाश्त करना होगा. रूपये खेल बदल सकता हैं और बुकिंग बाबू की हंसी के मायने भी कई बार कंधों पर हल्की सी दस्तक होती है और हट्टा कट्टा व्यक्ति सौ रूपये के अधिमूल्य पर टिकट प्रस्तुत करता दिख सकता है.

बड़े शहर के निवासी की वीर गाथाएँ और भी हैरत अंगेज हैं. जब वो किसी विद्यालय या कॉलेज में अपने बच्चे का दाखिला कराने जाता हैं. रजिस्ट्रेशन फॉर्म के लिए पंक्ति, माता पिता का साक्षात्कार, विद्यालय की शिक्षिका का दम्भपूर्ण व्यवहार, ऑफिस के बाबू व चपरासी, विद्यालय के चंदे की मांग एवं ऐसी ही कई अन्य बाधाएं पार करनी होती हैं. अगर बच्चे का दाखिला भी हो जाता है तो एक मोटी रकम की जरूरत होती हैं. विद्यालय की यूनिफार्म, फेट के लिए पैसे, स्थापना दिवस के लिए पैसे, कक्षा की सजावट के लिए पैसे और किस लिए पैसे नहीं चाहिए. अगर यह व्यय थोड़ा और बढ़ गया तो लोगों के परिवार विस्तार पर रोक लगाने का कारण बन जाएगा.

दूध के डीपों पर जोड़ तोड़, स्थानीय फोन सेवा के डेड फोन एवं नौकरशाही के गलियारे की कहानी भी कम तकलीफ देह नहीं होती हैं. शहर के निवासी को तेजी से आते हुए ट्रक से सड़क पर अपने आप को बचाना है जो उसके ऊपर से गुजर सकता है, भोला भाला सा दिखने वाला गरीब भिखारी 50 रूपये के लिए चाक़ू भी मार सकता हैं. और बचना होगा. उन फेरी वालों से जो मीठी मीठी बातों से ठग सकते हैं. ट्रेफिक जाम, भीड़ भरी सड़के, दुकाने, रूपये लुटाते अमीर एवं बढ़ते मूल्य के शहरियों को अजीब पशोपश में डाले रखते हैं. उदासी के निराशा में थका हुआ शहरी बुड बुडाता हैं, ईश्वर ने गाँव बनाए और शैतान ने शहर.

#शहरी जीवन पर निबंध लाभ और हानि वरदान या अभिशाप विशेषताएं

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