भारत की संसद पर निबंध | Essay on the Parliament in Hindi

भारत की संसद पर निबंध | Essay on the Parliament in Hindi: किसी भी लोकतांत्रिक शासन में सरकार के तीन अंग होते हैं. व्यवस्थापिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका. व्यवस्थापिका में प्रत्येक देश में इसे पार्लियामेंट, संयुक्त राज्य अमेरिका में कांग्रेस जापान में डायट, जर्मनी में बुन्देस्टांग, अफगानिस्तान में सूरा, ईराक में मुजलिस कहते हैं. भारत की व्यवस्थापिका को संसद (parliament of india) कहा जाता हैं. जिसका गठन संविधान के अनुच्छेद 79 में किया गया हैं. parliament house in hindi में निबंध जानेगे.

भारत की संसद पर निबंध | Essay on the Parliament in Hindi

member of parliament india, parliamentary system in india, parliament Of india Essay In Hindi: जिसके अनुसार भारतीय संघ के लिए एक संसद होगी जो राष्ट्रपति और दोनों सदनों से मिलकर बनेगी, जिनके नाम राज्यसभा और लोकसभा होंगे. इस प्रकार राष्ट्रपति भारतीय संघ की कार्यापालिका का संवैधानिक प्रमुख होने के साथ ही संघ की व्यवस्थापिका अर्थात संसद का भी अभिन्न अंग होता हैं. यह व्यवस्था नितांत संसदीय शासन प्रणाली के अनुरूप हैं.

Essay on the Parliament in Hindi

अनेक लोगों का यह मत है कि भारत में लोकतंत्र एवं संसद के रूप में प्रतिनिधि संस्थाओं की स्थापना ब्रिटिश शासन की देन हैं. यदपि यह सत्य नहीं हैं. प्रतिनिधि निकाय तथा लोकतांत्रिक स्वशासी संस्थाएं भारत में प्राचीन काल से ही विद्यमान रही हैं.

ऋग्वेद में सभा और समिति नामक दो संस्थाओं का उल्लेख आता हैं. वहीँ से आधुनिक संसद की शुरुआत मानी जा सकती हैं. समिति आधुनिक लोकसभा के सद्रश्य मानी जा सकती हैं. जबकि सभा विशिष्ट लोगों का संगठन हुआ करती थी. जिसका स्वरूप आजकल की राज्यसभा से मिलता जुलता हैं.

ऐसा ज्ञात होता है कि आधुनिक संसदीय लोकतंत्र के कुछ महत्वपूर्ण तत्व ऐसे स्वतंत्र चर्चा एवं बहुमत द्वारा निर्णय तब भी विद्यमान थे. ऐतरेय ब्राह्मण, पाणिनि की अष्टाध्यायी, कौटिल्य की अर्थशास्त्र, अशोक के शिलालेखों एवं समकालीन इतिहासकारों में इस तथ्य के पर्याप्त ऐतिहासिक प्रमाण मिलते है कि उस काल में अनेक गणराज्य भी थे. जहाँ आधुनिकतम स्वरूप के विधि एवं संवैधानिक सिद्धांत प्रचलित थे.

इसके अतिरिक्त राजतंत्रात्मक शासन व्यवस्थाओं में भी कुछ लोकतंत्रात्मक संस्थाएं एवं परम्पराएं सदैव बनी रही हैं. स्वाभाविक है पुरातन परम्पराओं को नई परिस्थितियों एवं नयें वातावरण के अनुसार बदलकर उनका अनुसरण किया गया हैं.

पृष्ठभूमि (Background)

ब्रिटिश शासन के दौरान विभिन्न अधिनियमों द्वारा भारत में संसदीय परम्पराओं को सिमित एवं मुख्यतः अनुत्तरदायी रूप से लागू करने की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई. 1833 के चार्टर अधिनियम से 1935 के भारत शासन अधिनियम तक में संसदीय तत्वों के विकास को देखा जा सकता हैं. 1892 के अधिनियम द्वारा गवर्नर जनरल की विधान परिषद में अधिकतम सदस्यों की संख्या सोलह निर्धारित कर उनमें से चार सदस्यों को अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित करने की प्रक्रिया को शामिल किया गया.

1909 ई के अधिनियम द्वारा अधिकतम सदस्य संख्या को 60 कर दिया गया तथा उनके अधिकारों में भी वृद्धि की गई, लेकिन दूसरी ओर इनके निर्वाचन के साम्प्रदायिक प्रणाली को प्रारम्भ कर भारतीय एकता को खंडित करने के प्रयास भी किये गये.

भारत सरकार अधिनियम 1919 द्वारा केन्द्रीय स्तर पर एक सदनीय विधान परिषद के स्थान पर द्विसदनीय विधान मंडल बनाया गया. जिसमें एक था राज्य परिषद और दूसरा था विधान सभा और प्रत्येक सदन में अधिकाँश सदस्य निर्वाचित होते थे.

इसी तरह 1935 के अधिनियम द्वारा भी इन दोनों सदनों को बनाए रखा गया हालांकि इनकी सदस्य संख्या और अधिकारों में पर्याप्त बढ़ोतरी की गई फिर भी उत्तरदायी शासन का रूप अब भी खंडित ही था. मतदाताओं की संख्या सम्पति के आधार पर बहुत ही सिमित थी. केवल पन्द्रह प्रतिशत लोगों को ही वोट देने का अधिकार था.

मतदाता साम्प्रदायिक और व्यवसायिक आधार पर ही विभिन्न वर्गों में बंटे हुए थे. स्वभाविक रूप से भारतीय संविधान द्वारा गठित होने वाली संसद में इन सभी अलोकतांत्रिक तत्वों को हटाया गया तथा इसे लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप बनाया गया.

संसद का गठन (Composition oF Parliament)

जैसा पूर्व में उल्लेखित हैं संसद का गठन संविधान के अनुच्छेद 79 के द्वारा हुआ हैं. जिसके अनुसार राष्ट्रपति के अलावा संसद के दो सदन होंगे राज्यसभा और लोकसभा. राष्ट्रपति के व्यवस्थापिका को अंग होने के नाते क्या क्या कार्य होंगे, उसका उल्लेख राष्ट्रपति की विधायी शक्तियों के अंतर्गत किया जा चुका हैं. अतः अब हम संसद की प्रक्रिया एवं दोनों सदनों के गठन एवं कार्यों व शक्तियों का अध्ययन करेगे.

संसद सदस्य होने की योग्यताएं एवं निर्योग्यताएं (Qualifications & Disqualifications Of Parliament Member)

संविधान ने संसद का सदस्य होने के लिए निम्नलिखित योग्यताएं निर्धारित की हैं. उसे भारत का नागरिक होना चाहिए, लम्बे समय से देश में यह मांग की जाती रही है कि देश के सर्वोच्च पदों पर जन्मजात भारतीय ही आसीन होना चाहिए. कई देशों में ऐसा प्रावधान भी हैं यदपि भारतीय संविधान में ऐसा कोई उल्लेख अभी तक नहीं हैं. , उसे राज्यसभा के लिए न्यूनतम 30 वर्ष की आयु का एवं लोकसभा के स्थान के लिए 25 वर्ष की आयु का होना चाहिए, उसके पास अन्य ऐसी योग्यताएं होनी चाहिए जो संसद निर्धारित करे.

इसके अतिरिक्त कोई विकृत चित्त व्यक्ति अथवा अनुन्मोचित दिवालिया व्यक्ति भारत की संसद का सदस्य नहीं हो सकता. कोई व्यक्ति एक समय में संसद के दोनों सदनों का सदस्य नहीं हो सकता. कोई भी व्यक्ति अधिकतम दो स्थानों से लोकसभा चुनाव लड़ सकता हैं. यदि वह दोनों स्थानों से निर्वाचित होता है तब वह एक माह के भीतर उसे एक स्थान रिक्त करना होता हैं.

संविधान की दसवीं अनुसूची के अनुसार किसी संसद सदस्य को दल बदल का दोषी पाये जाने पर सदस्यता से बर्खास्त किया जा सकता हैं. इसके अलावा सदस्य के चुनावी अपराध अथवा चुनाव में भ्रष्ट आचरण का दोष सिद्ध होने पर सदस्यता से बर्खास्त किया जा सकता हैं.

संसद सदस्यों की योग्यताओं और निर्योग्यताओं के सम्बन्ध में यह भी उल्लेखनीय है कि किसी शैक्षणिक योग्यता को आवश्यक नहीं समझा गया हैं जबकि राजस्थान सहित अनेक राज्यों में स्थानीय स्वशासन में चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता को आवश्यक माना गया हैं.

शपथ (Oath)

संसद के सभी सदस्य जिन्हें हम बोलचाल में सांसद अथवा एम पी कहकर संबोधित करते हैं. वे अपना स्थान ग्रहण करने से पूर्व राष्ट्रपति अथवा उसके द्वारा इस कार्य के लिए नियुक्त व्यक्ति के समक्ष शपथ लेता हैं और उस पर अपने हस्ताक्षर करता हैं.

संसद के सत्र (Sessions Of Parliament)

संविधान के अनुच्छेद 85 के अनुसार राष्ट्रपति समय समय पर संसद के प्रत्येक सदन को ऐसे समय और स्थान पर जो वह ठीक समझे अधिवेशन के लिए आहूत करेगा, किन्तु संसद के एक सत्र की अंतिम बैठक और आगामी सत्र की प्रथम बैठक के लिए नियत तारीख के बीच छः माह का अंतर नहीं होगा.

वास्तव में भारतीय संसद के प्रतिवर्ष तीन सत्र अथवा अधिवेशन होते हैं. बजट सत्र, मानसून सत्र तथा शीतकालीन सत्र. संसद की कार्यवाही के दौरान सदनों को स्थगित करने का अधिकार पीठासीन अधिकारी (लोकसभा में लोकसभा अध्यक्ष तथा राज्यसभा में सभापति) का होता है. लेकिन सत्रावसान करने का अधिकार राष्ट्रपति को प्राप्त होता हैं.

गणपूर्ति / कोरम (Quorum)

गणपूर्ति अथवा कोरम सदस्यों की वह न्यूनतम संख्या है जिसकी उपस्थिति से सदनों की कार्यवाही को वैधानिकता प्राप्त होती हैं. यह प्रत्येक सदन में पीठासीन अधिकारी सहित सदन की कुल संख्या का दसवां भाग होता हैं. इसका अर्थ यह हुआ कि लोकसभा की कार्यवाही का संचालन करने हेतु सदन में कम से कम 55 सदस्य एवं राज्यसभा की कार्यवाही करने हेतु सदन में कम से कम 25 सदस्य अवश्य होने चाहिए.

संसद में भाषा (Language Of Parliament)

संविधान के अनुसार संसद के कार्य संचालन की भाषा हिंदी व अंग्रेजी हैं. किन्तु पीठासीन अधिकारी किसी ऐसी सदस्य को जो हिंदी या अंग्रेजी में अपनी बात को अभिव्यक्त नहीं कर सकता हो मातृभाषा में बोलने की अनुमति दे सकता हैं.

मंत्रियों एवं महान्यायवादी के संसद में अधिकार (Powers Of Ministers And Advocate General)

संविधान के अनुच्छेद 88 में उल्लेखित हैं कि प्रत्येक मंत्री एवं भारत के महान्यायवादी को यह अधिकार होगा कि वह संसद के किसी भी सदन में बोलने एवं कार्यवाही में भाग लेने का अधिकारी होगा. महान्यायवादी को संसद में मतदान का अधिकार नहीं होगा तथा मंत्री मतदान केवल उसी सदन में कर सकेगा जिस सदन का वह सदस्य हैं.

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