विधवा जीवन पर निबंध | Essay on Widow Life in Hindi

विधवा जीवन पर निबंध | Essay on Widow Life in Hindi: समय के साथ साथ जैसे जैसे स्त्री के प्रति दृष्टिकोण संकीर्ण होता गया, वैसे ही पुरुष पर उसकी निर्भरता बढ़ती गई अतः यदि किसी स्त्री का पति मर जाए तो समाज में उसकी स्थिति बहुत दयनीय हो जाती थी. विधवा जीवन पर निबंध | Essay on Widow Life in Hindi

Essay on Widow Life in Hindi

राजस्थान की दिघवा (चाहे वह विधवा हो) के सामने सर्वाधिक आदर्श विकल्प था. पति के साथ सती हो जाना और यदि सती न हो तो दूसरा विकल्प था आजीवन विधवा रहना.

तत्कालीन साहित्य किसी भी स्थिति में प्रतिष्ठित विधवा को पुनर्विवाह की स्वीकृति नहीं देता. उच्च जाति की विधवाओं का जीवन बहुत ही कष्टसाध्य था. पति की मृत्यु के साथ ही उसके भाग्य की इति श्री हो जाती थी. अतः उसे न केवल सौभाग्य के सब प्रतीकों का त्याग करना पड़ता था बल्कि शरीर की अधिकाधिक विकृत और कुरूप बनाना पड़ता था.

विद्रूप दिखने और शरीर को अत्यधिक कष्ट देने में ही उसके वैधव्य जीवन की सार्थकता थी. फटे पुराने कपड़े पहनना, जमीन पर सोना, जिन्दा रहने भर के लिए रूखा सूखा खाना, किसी भी प्रकार के फार निषेध के साथ बाल मुडवाना एक विधवा के लिए आवश्यक था.

सामाजिक संवेदनहीनता और पितृसत्ता की पराकाष्टा यह थी कि किसी उत्सव, त्यौहार अथवा शुभ कार्य में विधवा की उपस्थिति को अपशकुन माना जाता था. उसे पति की सम्पत्ति में भी अधिकार नहीं मिलता था, बस वह गुजारा ले सकती थी.

समाज में निम्न व पिछड़ी मानी जाने वाली जातियों में विधवा का जीवन इतना कष्टसाध्य नहीं था. यदपि इन जातियों में भी विधवा के फेरे के साथ पुनर्विवाह तो नहीं हो सकता था लेकिन नाती प्रथा के द्वारा मृत के पति के परिजनों की स्वीकृति से उसे दूसरा पति चुनने का अवसर मिलता था.

नाते की यह प्रथा पति के जीवित होने पर भी प्रचलित थी और आज भी हैं. लेकिन इस प्रथा को ऊँची जातियों में हेय समझा जाता था. बाल विवाह तथा बहुविवाह के कारण राजस्थान में विधवाओं की बड़ी संख्या थी और स्त्री जीवन के लिए एक बड़ी विडम्बना.

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