युवा असंतोष पर निबंध | Essay on Young Discontent in Hindi

युवा असंतोष पर निबंध | Essay on Young Discontent in Hindi, Hindi Essay on unrest Growing Discontent Among the Youth Essayहमारे देश में जातीय, धार्मिक एवं भाषाई रूढ़ियाँ व इनके साथ साथ कुछ अन्य महत्वपूर्ण रुढ़ीबद्ध छवियों में एक छवि देश के युवा वर्ग की भी है, जो विद्रोही क्रन्तिकारी, विवेकहीन एवं अपरिपक्व वर्ग के रूप में सामने लाती है. यह सही है कि युवा बाहरी प्रभावों के प्रति अति संवेदनशील होते है और दूसरों की नकल करते है.

युवा असंतोष पर निबंध | Essay on Young Discontent in Hindi

युवा असंतोष पर निबंध | Essay on Young Discontent in Hindi

परन्तु इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि युवा केवल विध्वंस आक्रमण और आतंक में विश्वास करते हैं. दरअसल देश में जब चारों ओर भ्रष्टाचार विरोधाभास का आलम है तो ऐसे में सिर्फ युवाओं से ही क्यों अपेक्षा की जानी चाहिए कि वे पारम्परिक नैतिक मूल्यों एवं ऊँचे आदर्शों के अनुरूप व्यवहार करे. आज हम इसी युवावर्ग के असंतोष को निबंध में (Essay on Young Discontent in Hindi or essay on yuva varg in hindi) में बता रहे हैं.

युवा असंतोष पर निबंध Essay on Young Discontent in Hindi

प्रस्तावना– हमारा देश वर्तमान में संक्रमण के काल से गुजर रहा हैं. इस समय राष्ट्र के हर क्षेत्र में असंतोष फैला हुआ हैं. गरीबी के कारण आर्थिक असंतोष बढ़ता जा रहा हैं. समाज की दो पीढ़ियों में सामजस्य न होने के कारण सामाजिक असंतोष पनप रहा हैं. बेरोजगार युवाओं में असंतोष के दृश्य आये दिन सामने आते रहते हैं.

असंतोष के कारण– छात्रों और नवयुवकों में व्याप्त असंतोष के कई कारण हैं, सबसे बड़ा कारण बेरोजगारी. शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद युवक युवतियों को अरसे तक बेकार रहना पड़ता हैं. शिक्षा प्रणाली भी असंतोषजनक हैं. विश्वविद्यालयों की डिग्री को ही युवकों के भविष्य का निर्णायक मान लिया जाता हैं. शासन व्यवस्था में भ्रष्टाचार के कारण उनमे राजनीतिक असंतोष पनप रहा हैं. देशव्यापी महंगाई, नौकरशाही में रिश्वतखोरी तथा लालफीताशाही ने सभी को परेशान कर रखा हैं. युवाओं और बुजुर्गों के मध्य वैचारिक वैषम्य अधिक हैं. आर्थिक असमानता भी एक प्रमुख कारण हैं.

असंतोष के परिणाम– छात्रों एवं युवाओं में व्याप्त इस असंतोष के कारण ही हड़ताल, आगजनी व तोड़फोड़ की घटनाएं होती रहती हैं. समाज में अशांति फैलती रहती हैं. अपराधों के पनपने में भी यह असंतोष उत्तरदायी हैं. अतः असंतुष्ट छात्र तथा युवागण किसी भी जिम्मेदारी का सम्यक पालन नहीं करते हैं.

असंतोष को दूर करने के उपाय– नवयुवकों में व्याप्त असंतोष को दूर करना जरुरी हैं. इसके लिए असंतोष के कारणों को दूर किया जाना आवश्यक हैं. युवकों को यथासंभव रोजगार उपलब्ध करवाया जाए. शिक्षा प्रणाली में सुधार किया जाए. इसी भांति शासन व्यवस्था में सुधार करके भ्रष्टाचार व रिश्वतखोरी की रोकथाम भी आवश्यक हैं. बुजुर्गों को भी चाहिए कि बदले और युवकों को को नई हवा के अनुरूप तथा उचित दिशा में मार्गदर्शन प्रदान करे.

उपसंहार- इन सुधारों के आधार पर नवयुवकों के अच्छे भविष्य की आशा की जा सकती हैं. अन्यथा यह असंतोष युवा पीढ़ी का पतन कर देगा. वैसे भी युवा शक्ति का समुचित उपयोग करना जरुरी हैं. नवयुवक ही हमारे राष्ट्र के भावी सुनागरिक हैं.

युवा छात्रों में बढ़ता असंतोष

युवा वर्ग जब पाता है कि उसके समाज का नेतृत्व करने वालों की कथनी और करनी में चौड़ी खाई है, तो उसमें नाराजगी उत्पन्न होना स्वाभाविक है. इसमें निराशा और भ्रमित होकर कुंठित युवा एक सामाजिक विरोध को प्रस्तुत करने के लिए कोई तो आन्दोलन चलाते है, कुछ राजनीतिज्ञ आन्दोलन में रूचि लेना आरम्भ कर देते है और कुछ मामलों में तो इन समूह आंदोलनों को जीवित रखने के लिए असामाजिक तत्वों की सहायता भी लेते हैं. जब ये असामाजिक तत्व लूट या आगजनी करते है तो इन विध्वंसक गतिविधियों के लिए युवाओं को दोषी करार दिया जाता हैं.

युवाओं में असंतोष के कारण (Causes For discontent among youth)

पहले से कुंठित युवा और अधिक कुंठित हो जाते है जिससे उनमें असंतोष कि भावना और बढ़ जाती हैं. सामाजिक असंतोष एक समुदाय के सामूहिक मोह भंग नाराजगी एवं कुंठा की अभिव्यक्ति हैं. युवा असंतोष का परिणाम युवा उत्तेजनापूर्ण आंदोलनों के रूप में सामने आता है. वे क्रुद्ध युवा जो घोर अन्याय से उत्पीड़न महसूस करते है या जो विद्यमान ढांचों एवं अवसरों से नाराज होते हैं. सामूहिक रूप से सत्तारूढ़ व्यक्तियों पर युवा उत्तेजनापूर्ण आन्दोलन के रूप में जो कुछ परिवर्तन लाने के लिए दवाब डालते हैं.

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत के युवाओं ने भ्रष्टाचार, असमानता, शोषण, राजनीतिक साठ गाठ, पुलिस की नर्शन्स्ता, प्रशासनिक निर्दयता, धार्मिक कट्टरवाद आदि को कई बार बिना कोई सामाजिक विरोध किये सहन किया हैं. लेकिन सहन करने की भी एक सीमा होती है जब सहनशीलता धैर्य खो देती है, तब यह असंतोष उत्तेजनापूर्ण आंदोलनों में परिणित हो जाती हैं.

कुछ समाजशास्त्रियों का मत है कि उत्तेजनापूर्ण आन्दोलन करना व्यक्तिगत असफलता का बहाना मात्र हैं. आंदोलनकर्ताओं को कुछ ऐसे असंतुष्ट, कुंठित युवा व्यक्तियों का समर्थन प्राप्त होता है, जिनके जीवन में अर्थ और पूर्ति का अभाव हैं. ऐसे व्यक्ति उत्तेजनापूर्ण आंदोलन एवं सामाजिक आंदोलनों के प्रति आकर्षित होते है, जो ऊबे हुए है, असमायोजित व्यक्ति हैं. रचनात्मक होते हुए भी स्रजन नहीं कर सकते, दोषी है, पतनोन्मुख है और अपने जीवन से अत्यंत असंतुष्ट है, वे उत्तेजनापूर्ण गतिविधि द्वारा अपने खाली जीवन का अर्थ एवं उद्देश्य प्रदान करते हैं.

युवा असंतोष कारण और समाधान (Youth Discontent reasons and solutions)

भारत में कुछ युवा यह भी महसूस करते है कि अवसरों का अभाव, बेरोजगारी, जाति आधारित आरक्षण, उच्च शिक्षा की सीमाएं, विशेष तौर पर तकनीकी एवं व्यवसायिक शिक्षा ऐसे मामले है, जिन्हें हटाया जा सकता है. उनकी आकांक्षा बेहतर नौकरियों, आर्थिक सुरक्षा, पदोन्नति के अवसरों, सामाजिक गतिशीलता और अनेक व्यक्तियों द्वारा उपयोग की जाने वाली वस्तुओं का उपयोग करने की रहती हैं. उन्हें विद्यमान सामाजिक ढांचे और सत्ताधारी अभिजनों से यह अपेक्षा नहीं रहती है कि वे उनकी अपेक्षाओं की पूर्ति कर पाएगे, ऐसी स्थिति में युवा असंतोष उत्तेजनापूर्ण आन्दोलन की राह पकड़ता हैं.

एक सामान्य युवा पुरुष व्यक्तिवादी, कल्पनाशील एवं प्रतिसर्दी होता हैं. वह केवल मार्गदर्शन चाहता है जिससे उसको उत्साह एवं जोश नियंत्रित हो सके. युवाओं को अपना रोष अभिव्यक्त करना सीखना चाहिए. यदि एक व्यक्ति रोष को दबाता है तो उसे एक निकास खोजना पड़ता है, जिससे उसके मन के गुब्बार को निकालने का अवसर मिल सके.

इसलिए माता पिता को भी चाहिए कि वे अपने बच्चों के भावात्मक तनाव को विभिन्न प्रकार की गतिविधियों से मुक्त करने के लिए प्रोत्साहित करे. परन्तु यह भी सच है कि युवा समस्याओं का समाधान युवाओं को साथ लिए बिना नहीं हो सकता हैं. इसलिए अभिभावकों प्राध्यापकों एवं प्रशासकों को युवाओं का सहयोग प्राप्त करना पड़ेगा.

समाज के विभिन्न वर्गों के युवाओं की समस्याओं को समझने एवं उन्हें तर्कसंगत दिशा निर्देश देने में सहयोग करना चाहिए. अब समय आ गया है कि इस विशाल युवाशक्ति को सामाजिक अन्याय को समाप्त करने तथा विकास एवं राष्ट्रीय सामूहिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए लगाया जाए, दमन एवं टकराव के वातावरण के स्थान पर आशा विश्वास एवं आस्था के वातावरण की आवश्यकता को समझना चाहिए और युवाओं को संगठित कने को पहल करनी चाहिए.

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