पंचतत्व ( पृथ्वी,जल,आकाश,अग्नि और वायु) || Five Elements (Earth, Water, Sky, Fire, And Air)

पंचतत्व/Five Elements (Earth, Water, Sky, Fire, And Air) केवल अग्नि ही पंचतत्व में प्रमुख है जो भय उत्पन्न करती है. हम सांस लेते है, पृथ्वी पर पैर रखते, जल में स्नान करते है. हम केवल अग्नि के निकट सम्मानपूर्वक जाते है. यही एक ऐसा तत्व है जो सदा जागरूक रहता है. और दूर से देखने में सदा सुखकारी लगता है. कभी कभी शीतप्रधान देशों को छोड़कर हम जिस वायु में सांस लेते है, उस वायु को देख नही पाते है और कौन कहेगा ऐसा द्रश्य मनोहर होता है.

हम पृथ्वी को घूमते हुए देख नही पाते है. उसके भीतर से ही जन्म लेने वाले वृक्ष या अन्यान्य वनस्पतियाँ इतने धीरे धीरे बाहर निकलती है.कि उन्हें देखने पर आनन्द नही आता है. पृथ्वी को देखने पर किसी का धैर्य छुट सकता है. क्युकि वह तो अनंत विशाल अग्रिशिखाओं की एक पतली पपड़ी जैसी है. जिसका निर्माण अपेक्षाकृत अवर्चिन है. इन द्रश्यो के पीछे लालायित रहना धैर्य का धौतक नही है.

नदी के रूप में बहने वाला जल एकाध क्षण के लिए देखते समय अवश्य ही रमणीय प्रतीत होता है. फिर उसके बाद जल की अनियमित गतिशीलता थकान वाली हो जाती है. विविधता तथा रमणीयता की द्रष्टि से केवल सम्पूर्ण समुद्र का जल ही अग्नि की प्रतिस्पर्धा कर सकता है. किन्तु एक इमारत के प्रज्वलित होते समय जिस प्रकार का द्रश्य दिखाई देता है, उसकी तुलना में कम रोमांचित प्रतीत होता है. जहाँ तक अन्य बातों का सम्बन्ध है.

समुद्र की नीरसता तथा उकलाहट के अलग अलग अवसर होते है. भले ही वह पूर्ण रूप से प्रशांत लगता हो. किसी जाली या झंझरी के भीतर रखी हुई थोड़ी सी अग्नि तब तक मनोरंजक और प्रेरक लगती है. जब आप उसे बाहर न निकाले इस प्रकार की अग्नि एक मुट्ठी भर मिटटी अथवा गिलाश भरे जल के समान है. जो आँखों के लिए आनन्द का विषय तो बनता ही है. वह किसी गौरवपूर्णत महता का संकेत भी करती है.

अन्य रूपों में भले ही वे प्रचुर नमूनों के रूप में विद्यमान हो. अग्नि की पवित्रता की अपेक्षा हमे कम प्रभावित करते है.पौराणिक आख्यान के मुताबिक़ केवल अग्नि को ही स्वर्ग से पृथ्वी पर उतारा गया था. अन्य पंचतत्व शुरुआत से ही यही पर विद्यमान थे.

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