संसद के कार्य एवं शक्तियों का वर्णन | Functions of Parliament In Hindi

संसद के कार्य एवं शक्तियों का वर्णन | Functions of Parliament In Hindi: देश की संसद का निर्माण लोकसभा राज्यसभा दोनों सदनों के साथ राष्ट्रपति के मिलने से पूर्ण हो जाती हैं. दो सदन की भारतीय संसद देश की सर्वोच्च विधायी निकाय हैं. भारत के संसद भवन की ईमारत नई दिल्ली में हैं. वर्तमान में लोकसभा के 545 तथा राज्यसभा के 245 सदस्य चुनकर आते हैं. आज हम भारतीय संसद के कार्य जानेगे. Role and Function Of Parliament को विस्तार से पढेगे.

संसद के कार्य एवं शक्तियों का वर्णन | Functions of Parliament In Hindi

What Is Role And Indian Parliament Functions In Hindi, sansad ke karya, what are the five important functions of parliament: किसी भी देश की व्यवस्थापिका या संसद का पहला कार्य विधि निर्माण यानि कानून बनाने का कार्य होता है. इसके अतिरिक्त धन विधेयक पारित करना और संविधान संशोधन तथा कार्यपालिका पर नियंत्रण का कार्य भारत की संसद मुख्य रूप से करती हैं.

Functions of Parliament In Hindi

विधि निर्माण– सरकारके व्यवस्थापिका अंग का सबसे प्रमुख कार्य विधि निर्माण होता हैं. संसद भारत की व्यवस्थापिका हैं. अतः उसका मुख्य कार्य विधि निर्माण का हैं. भारत में संघात्मक व्यवस्था की स्थापना की गई हैं, जिसका अभिप्रायः यह है कि संघ एवं प्रान्तों में विधायी शक्तियों का विभाजन किया गया हैं.

संविधान की सातवीं अनुसूची में संघ सूची राज्य सूची एवं समवर्ती सूची के माध्यम से संघ एव प्रान्तों में शक्ति विभाजन किया गया हैं. इसके अनुसार संघ सूची एवं समवर्ती सूची में अंतर्विष्ट विषयों में से किसी भी विषय पर संसद विधान बना सकती हैं.

अवशिष्ट शक्तियों पर भी विधान निर्माण की शक्ति संसद को ही प्राप्त हैं. राज्यों को सौपें गये राज्य सूची के विषयों के संबध में भी कुछ परिस्थितियों में संसद विधान बना सकती हैं.

कानून बनाने के प्रस्ताव को साधारण विधेयक कहते हैं. यह विधेयक संसद के किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता हैं. यदि विधेयक मंत्री परिषद के किसी सदस्य द्वारा सदन में रखा गया हैं.

तब उसे सरकारी विधेयक कहते हैं. जबकि साधारण सदस्यों द्वारा रखा गया विधेयक को गैर सरकारी विधेयक कहलाता हैं. विधेयक को पारित होने के लिए संसद में अनेक प्रक्रियाओं में गुजरना होता हैं. विधेयक के प्रत्येक सदन के तीन वाचन होते हैं.

नियत समय पर सदन में सम्बन्धित सदस्य खड़े होकर प्रस्ताव करता हैं. कि विधेयक को पेश करने की अनुमति दी जाए. आमतौर पर अनुमति दे दी जाती हैं. इस प्रकार सदन में विधेयक को प्रस्तुत करने की अनुमति ही उसका प्रथम वाचन कहलाता हैं.

द्वितीय वाचन किसी भी विधेयक की सबसे महत्वपूर्ण एवं निर्णायक अवस्था होती हैं. सामान्यतः इस अवस्था में विधेयक पर प्रवर समिति का गठन किया जाता हैं. जो विधेयक पर बारीकी से विचार करती है. प्रत्येक धारा पर चर्चा करती है. निर्धारित अवधि में समिति अपना प्रतिवेदन सदन को प्रस्तुत करती हैं.

इस प्रतिवेदन पर सदन में बहस एवं विचार विमर्श होता हैं. उसकी प्रत्येक धारा पर मतदान होता हैं. यह पूरी प्रक्रिया विधेयक का द्वितीय वाचन कहलाता हैं. इसके पश्चात विधेयक में आवश्यक शाब्दिक एवं औपचारिक संशोधन किये जाते है एवं अंतिम रूप से पारित करने के लिए सदन में प्रस्तुत किया जाता हैं.

What are the functions of Parliament in India?

चूँकि द्वितीय वाचन में विस्तार से विधेयक पर चर्चा हो चुकी होती हैं. अतः तृतीय वाचन में सामान्य चर्चा के उपरान्त मतदान होता हैं. यदि उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों को साधारण बहुमत विधेयक के पक्ष में हो तब वह उस सदन में पारित समझा जाएगा.

विधेयक दूसरे सदन में

जिस सदन में विधेयक पेश किया गया हो, वहां से पारित किये जाने के पश्चात उसे पारित करने के लिए दूसरे सदन में भेजा जाता हैं. वहां पर भी विधेयक के तीन वाचन होते हैं. यदि दूसरा सदन विधेयक को पारित कर ले तब दोनों सदनों द्वारा पारित समझा जाता हैं. एवं राष्ट्रपति के समक्ष हस्ताक्षर के लिए प्रस्तुत किया जाता हैं. लेकिन दूसरा सदन विधेयक को अस्वीकार कर दे अथवा ऐसे संशोधन करें, जिससे पहला सदन सहमत नहीं हो अथवा सदन विधेयक पर छः मास तक चर्चा ही नहीं करे तब इसका अर्थ यह होता है कि उस साधारण विधेयक पर दोनों सदनों में मतभेद उत्पन्न हो गया हैं.

दोनों सदनों की संयुक्त बैठक

दोनों सदनों में साधरण विधेयक पर असहमति से उत्पन्न गतिरोध का समाधान संयुक्त बैठक में होता हैं. अनुच्छेद 108 के तहत राष्ट्रपति को यह अधिकार प्राप्त है कि वह विधेयक पर फैसला करने हेतु संयुक्त बैठक आमंत्रित करे. इस संयुक्त बैठक की अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष द्वारा की जाती हैं.

संयुक्त बैठक में निर्णय दोनों सदनों के उपस्थित और मतदान करने वाले कुल सदस्यों के बहुमत द्वारा किया जाता हैं. अब तक केवल तीन विधेयक ही संयुक्त बैठक में पास किये गये हैं.

विधेयक पर राष्ट्रपति की अनुमति

दोनों सदनों द्वारा पारित विधेयक राष्ट्रपति के हस्ताक्षर हेतु प्रस्तुत किया जाता हैं. क्योंकि वह कार्यपालिका का संवैधानिक प्रमुख होने के साथ ही भारत की संसद का भी अभिन्न अंग होता हैं. अनुच्छेद 111 के अनुसार राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होने पर ही कोई विधेयक अधिनियम अर्थात कानून बनाता हैं.

राष्ट्रपति विधेयक को पुनर्विचार के लिए एक बार संसद को भेज सकता हैं. लेकिन यदि संसद संसोधनों सहित बिना किसी संशोधन के पुनः पारित पर विधेयक राष्ट्रपति के समक्ष भेजे तब राष्ट्रपति के लिए उस पर हस्ताक्षर करना आवश्यक होता हैं. इस प्रकार विधि निर्माण की यह जटिल प्रक्रिया राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के साथ समाप्त होती हैं लेकिन संसद का यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य माना जाता हैं.

उसके द्वारा संसद लोगों के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन करने एवं देश की सामाजिक, आर्थिक आवश्यकताओं को पूरा करने का कार्य करती हैं. लेकिन क्या संसद देश के सभी नागरिकों के लिए विधि निर्माण का अधिकार रखती हैं. यह आश्चर्य की बात हैं. कि देश के मुसलमानों एवं ईसाईयों के लिए सामाजिक, धार्मिक जीवन के लिए कानून निर्माण का अधिकार संसद को प्राप्त नहीं हैं.

उन्हें यह विशेषाधिकार प्राप्त है कि उनके लिए अपने पर्सनल लॉ बोर्ड होंगे, जो उनके सामाजिक जीवन के नियमों का निर्धारण करेगे. यदपि यह संविधान प्रदत्त विधि के समक्ष समानता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन हैं. यही नहीं नीति निदेशक तत्वों में अनुच्छेद 44 के तहत राज्य का यह कर्तव्य घोषित हैं कि वह यथाशीघ्र समान नागरिक संहिता की स्थापना करेगा. भारत का सर्वोच्च न्यायालय भी अनेक बार समान नागरिक संहिता की स्थापना करने का निर्णय दे चुका हैं लेकिन अभी तक ऐसा हुआ नहीं हैं.

धन विधेयक पारित करना

संसद का दूसरा महत्वपूर्ण कार्य धन विधेयक को पारित करना हैं. अनुच्छेद 109 में धन विधेयक की प्रक्रिया का वर्णन है तथा अनुच्छेद 110 में इसे परिभाषित किया गया हैं. धन विधेयक राज्यसभा में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता. वह राष्ट्रपति की सिफारिश पर केवल लोकसभा में ही पेश किया जा सकता हैं.

लोकसभा द्वारा पास किये जाने पश्चात राज्य सभा की सिफारिशों के लिए उनके पास भेजा जाता हैं. राज्यसभा के लिए विधेयक की उसे प्राप्ति की तिथि से 14 दिन के भीतर लोकसभा को लौटाना अनिवार्य हैं. यदि 14 दिन में लौटाया नहीं जाता तब भी वह दोनों सदनों के पास किया गया जाना जाएगा. यह भी उल्लेखनीय है कि धन विधेयक अनिवार्य रूप से सरकारी विधेयक ही होता है, गैर सरकारी विधेयक नहीं.

संविधान संशोधन का कार्य

संविधान देश की सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक आवश्यकताओं की पूर्ति का उपकरण होता हैं. आवश्यकताओं में परिवर्तन के अनुरूप संविधान में बदलाव भी आवश्यक होता हैं. अतः प्रत्येक देश के संविधान में संशोधन की व्यवस्था होती हैं. संशोधन प्रक्रिया के आधार पर संविधान लचीला एव कठोर दो प्रकार का होता हैं. ब्रिटिश संविधान जहाँ सबसे लचीला संविधान का उदाहरण हैं वहीँ अमेरिका का संविधान कठोर संविधान का उदहारण माना जाता हैं.

भारतीय संविधान में संशोधन करने की शक्ति संसद को प्राप्त हैं. संविधान संशोधन प्रक्रिया का वर्णन संविधान के अनुच्छेद 368 में हैं. इसके अनुसार संविधान संशोधन दो प्रकार से हो सकता हैं. संविधान की अधिकांश धाराओं में परिवर्तन प्रत्येक सदन की कुल सदस्य संख्या के बहुमत तथा उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों से कम से कम दो तिहाई बहुमत द्वारा पारित प्रस्ताव से होता हैं.

परन्तु ऐसा कोई संशोधन जो संघ एवं राज्यों की कार्यपालिका शक्ति में परिवर्तन, राज्यों के विधायी सम्बन्धों से परिवर्तन, संसद में राज्यों के प्रतिनिधित्व तथा स्वयं अनुच्छेद 368 में संशोधन आदि से सम्बन्धित हो तो ऐसे संशोधन वाले विधेयक के लिए संसद के विशेष बहुमत के साथ साथ कम से कम आधे राज्यों के विधान मंडलों द्वारा उसे अनुसमर्थन प्राप्त होना आवश्यक होता हैं.

संविधान संशोधन विधेयक किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है एवं दोनों सदनों द्वारा अलग अलग पारित करना आवश्यक हैं अर्थात इसमें संयुक्त अधिवेशन का प्रावधान नहीं होता हैं. दोनों सदनों द्वारा पारित संविधान संशोधन विधेयक राष्ट्रपति के हस्ताक्षर से पारित समझा जाता हैं. राष्ट्रपति इस पर हस्ताक्षर करने से इनकार नहीं कर सकते हैं.

इस प्रकार विधेयक तीन प्रकार के होते है साधारण, धन एवं संविधान संशोधन विधेयक. साधारण एवं धन विधेयक पर जहाँ लोकसभा को राज्यसभा पर प्रभुत्व प्राप्त होता हैं. वही संविधान संशोधन विधेयक पर दोनों सदनों को समान शक्ति प्राप्त होती हैं. क्योंकि एक सदन इसे पारित करे और दूसरा सदन पारित नहीं करे तब संविधान विधेयक समाप्त माना जाता हैं.

कार्यपालिका पर नियंत्रण का कार्य

लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार जनता के प्रति उत्तरदायी होती हैं. एवं जनता मताधिकार के माध्यम से उसे नियंत्रित करती हैं. लेकिन कार्यपालिका को नित प्रतिदिन कार्यों में नियंत्रित करने का कार्य जनता की प्रतिनिधि संस्था अर्थात संसद को प्राप्त हैं. भारतीय संसद विभिन्न तरीको से कार्यपालिका को नियंत्रित करती हैं जैसे प्रश्नकाल, शून्यकाल, ध्यानाकर्षण प्रस्ताव, काम रोको प्रस्ताव आदि के द्वारा.

लेकिन कार्यपालिका अर्थात मंत्री परिषद पर नियंत्रण की सबसे बड़ी शक्ति लोकसभा को प्राप्त हैं. वह है विश्वास प्रस्ताव एवं अविश्वास प्रस्ताव पारित करना. विश्वास का मत प्रधानमंत्री सदन में प्रस्तुत करते हैं. और सदस्यों से इसके पक्ष में मत देकर पारित करने का आग्रह करते हैं. अविश्वास प्रस्ताव मंत्री परिषद को अपने पद से हटाने के लिए विपक्ष द्वारा लाया जाता हैं.

विश्वास मत के पारित न होने और अविश्वास मत के पारित होने पर इन दोनों का ही परिणाम मंत्री परिषद का अपने पद से हटना पड़ता हैं. इसके साथ ही संसद देश में विचार विमर्श का सबसे बड़ा मंच हैं. विकास एवं कल्याण की विभिन्न योजनाओं पर विस्तार से संसद में चर्चा होती हैं. संसद राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति आदि के निर्वाचन एवं उनको पद से हटाने का कार्य भी करती हैं.

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