गणित पर कविता | Funny Poem On Maths In Hindi

Funny Poem On Maths In Hindi: गणित (मैथ्स) एक कठिन होने के साथ साथ महत्वपूर्ण विषय भी हैं. इस सब्जेक्ट के साथ एक फैक्ट यह भी जुड़ा है, कि जिसे गणित एक बार समझ नही आती मुश्किल है वो आगे विषय पर अपनी पकड़ बना पाएगा. यहाँ पर गणित पर कविता Funny Poem On Maths, Math Poem In Hindi में आपके लिए कुछ हास्य कविताएँ प्रस्तुत की गई हैं. छोटी कक्षा के विद्यार्थियों के लिए फनी मैथ्स पोएम आनन्दायक हो सकती हैं.

Funny Poem On Maths In HindiFunny Poem On Maths In Hindi

poem on maths teacher in Hindi: 

एक दो तीन चार
आज शनि है कल इतवार
पांच छः सात आठ
याद करुगा सारा पाठ
इसके आगे नौ और दस
हो गई गिनती पूरी बस

funny poems on maths subject

मुझे भिन्न कहते है
किसी पांचवी क्लाश के क्रुद्ध बालक की
गणित पुस्तिका में मिलूगी
एक पाँव पर खड़ी डगमग

मैं पूर्ण इकाई नही
मेरा अधोभाग
मेरे माथे से जब भारी पड़ता है
लोग मुझे मानते है ठीक ठाक
अंग्रेजी में प्रॉपर फेक्शन

अगर कही गलती से
मेरा माथा
मेरे अधोभाग पर भारी पड़ जाता है
लोगों के गले यह नही उतरता
और मेरे माथे पर बट्टा लग जाता है
इम्प्रॉपर फेक्शन का

क्या माथा अधोभाग से भारी होना
इतना अनुचित है मेरे मेरे मालिक मेरे आका?
क्या इससे बढ़ जाती है मेरी दुरुहता?
कितने बरस और अभी रहेगे आप
इस पांचवी कक्षा के बालक की मनोदशा से?
लगातार मुझे कांटते छांटते

गोदी में मेरी
नन्ही इकाइयां बिठाकर
वही लगड़ी भिन्न बनाते
फिर होल नम्बर फलां बटा फला ?

कब तक बाँटना कब तक छांटना
देखिए मुझे अंतिम दशमलव तक
फिर कहिये, क्या मैं बहुत भिन्न हूँ आपसे ?

Funny Poem On Maths In Hindi

mathematics poem in hindi:-

होड़ मची संख्याओं के बिच, है कौन सबसे महान
किसकी पूजा हो पहले, किसकी हो पहले पहचान
सब अपनी करते थे बड़ाई, फिर उनमें हो गई लड़ाई

किसी की बुद्धि काम न आई, फिर सबने मिलकर सभा बुलाई
जज बने युनिवर्सल दादा, इम्पटी, सिंगल्टन, पेपर, सबसेट
सब थे मध्य मौजूद, अकड दिखाकर जीरों बोला
अपनी वकील हूँ मैं खुद

संख्याओं ने तब कहा विनय से-
हे युनिवर्सल दादा ! जरा करें हम सबकी पहचान
जीरों अकड रहा है कब से, दिखा रहा है जूठी शान
मुछ पर अपनी ताव देकर अकड़कर फिर जीरों बोला- हाँ हाँ हाँ

जिस पर मेरी नजर बढ़े, हो जाए वो मालामाल
जिस पे मेरी नजर चढ़े, पल में कर दूँ उसकों कंगाल
आगे किसी के जब लग जाऊं, एक को मैं दस बनाऊ
अगर पीछे कभी ना आऊ, फिर मैं उनका भाव घटाऊ

भाग लगे जब किसी को मुझसे, खजाना हो उसका अनन्त
गुणा करो जब किसी किसी को मुझसे, कर देता उसका अंत
जन्म हुआ भारत में मेरा, पूरे विश्व ने अपनाया

जब चाहा किसी को जीरो, और किसी को अनन्त बनाया
संख्याओं के इलेक्शन में, फिर जीरो का हुआ सलेक्शन
सब संख्या लौटे अपने घर दादा से लेकर बनेडिक्शन

गणित पर कविता के इस लेख में बच्चों के पढ़ने के लिए भिन्न, संख्याओं और जीरों की कहानी बहुत रोचक रूप से प्रस्तुत की गई हैं. आशा करता हूँ हमारा ये आर्टिकल आपकों पसंद आया होगा.

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