दमनक चतुर्थी व्रत कथा गणेश दमनक चतुर्थी डेट व्रत कथा पूजा विधि महत्व

Ganesh damnak chaturthi vrat 2019 Date Vrat Katha Vidhi Poojan दमनक चतुर्थी व्रत कथा गणेश दमनक चतुर्थी डेट व्रत कथा पूजा विधि महत्व: हिन्दू कलेंडर के अनुसार चैत्र शुक्ल चतुर्थी तिथि को गणेश दमनक चतुर्थी मनाई जाती हैं. इस दिन बुद्धि के देवता व प्रथम पूज्य श्री गणेश जी का पूजन किया जाता हैं. 2019 में यह चतुर्थी व्रत 9 अप्रैल को हैं. भक्त अपने आराध्य गणेश जी प्रसन्न करने के लिए विघ्नहर्ता का व्रत कर दमनक चतुर्थी व्रत कथा का वाचन करते हैं इस दिन व्रत रखने का विशेष महत्व हैं,

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दमनक चतुर्थी व्रत कथा गणेश दमनक चतुर्थी डेट व्रत कथा पूजा विधि महत्व

गणेश दमनक चतुर्थी चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दिन साधक इसे मनाते हैं तथा गणेश दमनक चतुर्थी व्रत को रखा जाता हैं. माना जाता है कि इस दिन मोदक यानि लड्डू के साथ गणेश जी को भोग लगाकर पूजा की जाए तो वे प्रसन्न हो जाते हैं. तथा भक्त की सभी इच्छाएं पूर्ण हो जाती हैं.

हिन्दू धर्म में गणेश जी को प्रथम पूज्य माना गया है कोई भी शुभ कार्य आरम्भ करने से पूर्व उनकी पूजा की जाती हैं ऐसी मान्यता हैं कि गणेश जी के पूजन से समस्त परेशानियों का निवारण हो जाता हैं. हर माह में चतुर्थी तिथि दो बार आती हैं तथा शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी के नाम से जाना जाता हैं. इस दिन व्रत रखने से विशेष लाभ की प्राप्ति होती हैं. इस दिन गणेश को सिंदूर चढ़ाकर लड्डूओं का भोग लगाया जाता हैं.

विनायक चतुर्थी को वरद चतुर्थी भी कहते हैं वरद का आशय होता है अपनी मनोकामनाएँ पूर्ण कराने के लिए ईश्वर से प्रार्थना करना. जो साधक इस दिन व्रत धारण करता हैं गणेश जी उन्हें ज्ञान एवं धैर्य का आशीष देते हैं. इस दिन दोपहर के समय पूजन किया जाता हैं.

दमनक चतुर्थी व्रत कथा इन हिंदी

बहुत समय पहले की बात हैं एक राजा हुआ करता था उनकी दो पत्नियाँ थी जिनके एक एक राजकुमार था. एक का नाम था गणेश तथा दूसरे का नाम दमनक था. जब दोनों भाई ननिहाल जाते तो गणेश के साथ मामा मामी आदि अच्छा व्यवहार करते थे जबकि दमनक के साथ खूब काम करवाते कोई भी गलती होने पर उसकी पिटाई की जाती थी.

दमनक ननिहाल से खाली हाथ ही लौट आता जबकि गणेश को खूब मिठाइयाँ व उपहार देकर विदा किया जाता था. ननिहाल से घर आकर गणेश अपने मामा मामी की खूब तारिफ किया करता जबकि दमनक शांत एवं उदास रहता था.

जब दोनों राजकुमार बड़े हुए तो उनकी एक ही राजा की बेटियों से शादी करवा दी, जब गणेश अपने ससुराल जाता तो उसकी बड़ी आव भगत की जाती तथा लौटने पर उन्हें ढेर सारा धन देकर विदा करते जबकि दमनक को ससुराल में रोने के लिए घुडसाल में सुलाया जाता तथा लौटते समय उन्हें कोई उपहार नहीं दिया जाता.

दो भाइयों के साथ इस सौतेले व्यवहार को एक बूढी औरत रोजाना देखा करती थी. जब एक दिन शिव पार्वती पृथ्वी भ्रमण कर रहे तो वह महिला उनके पास गयी तथा गणेश दमनक की पूरी कहानी उन्हें बताई तथा घर, ससुराल और ननिहाल में एक को सम्मान तथा दूसरे को अपमान मिलने का कारण पूछा.

शिवजी तीनों लोक के ज्ञाता हैं उन्होंने उस बुढ़िया को दोनों के भेदभाव का कारण बताते हुए कहा- गणेश ने अपने पिछले जन्म में मामा मामी से जो प्यार दुलार लिया वह अब वापिस कर रहा हैं, जो सुसराल से मिला वह अब इसे चूका रहा हैं इसलिए उसका हर स्थान पर सम्मान किया जाता हैं.

दमनक अपने ननिहाल पक्ष से प्यार अवश्य लाता था मगर घर के कामकाज के चलते वह वापिस नहीं चूका पाता था, वैसा ही उसके ससुराल के साथ होता था वह उस तरफ से लाता तो था मगर वापिस नहीं करता था इसलिए उसे सम्मान की बजाय अपमान ही मिलता हैं.

दमनक चतुर्थी का महत्व

हिन्दू धर्म में व्यक्ति के कर्मो को सर्वाधिक महत्व दिया गया हैं. शास्त्रों में कहा गया हैं कि कर्म कभी समाप्त नहीं होते हैं यदि हमने कोई कर्ज लिया है तो उसे हमारी ही संतानों को लौटना पड़ता हैं. यहाँ तक कि भाई का लिया कर्जा भतीज तक को चुकाना पड़ता हैं. इसलिए व्यक्ति को जिससे जो मिला हैं उसे वह लौटा देना चाहिए. ननिहाल से जो मिला वह मामा को तथा ससुराल से जो मिला वह ऋण साले को चूका देना चाहिए.

गणेश दमनक चतुर्थी पूजा विधि

जिस दिन दमनक चतुर्थी व्रत हो यदि साधक पूर्ण श्रद्धा तथा विधि विधान के अनुसार गणेश जी की पूजा करता है तो उनके समस्त संकट टल जाते हैं. भगवान् गणेश को यह तिथि भी बहुत पसंद हैं अतः इनकी पूजा के लिए भक्तों को यह विधि अपनानी चाहिए.

  • धातु के सिक्के के गणेश की प्रतिमा खरीदे यदि संभव न हो तो गणपति की मिट्टी की मूर्ति अपने घर ले आए.
  • घर के एक कोने में गणेश जी की मूर्ति को स्थापित करे.
  • गं गणपतये नमः मंत्र का वाचन करते हुए अक्षत फूल आदि चढाएं अपनी मनोकामना बताएं तथा गणेश के चरणों में शीश नवाएँ.
  • गणपति की मूर्ति या फोटो पर सिंदूर का तिलक लगाएं.
  • गंध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप व नैवेद्य के साथ २१ दूर्वा दल उन्हें अर्पित करे.
  • प्रसाद को सभी लड्डूओं को भक्तों में प्रसाद के रूप में बाँट देवे.

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