गायत्री मंत्र का अर्थ | Gayatri Mantra Meaning in Hindi

Gayatri Mantra Meaning in Hindi- गायत्री मंत्र को हिन्दू धर्मों के ग्रंथो में विशेष महत्व दिया गया हैं. किसी भी शुभ कार्य से पूर्व गायत्री मंत्र का जाप होता हैं. क्या आपकों गायत्री मंत्र का अर्थ (मीनिंग) के साथ बतला रहे हैं. गायत्री एक पवित्र मंत्र है जिसमें पृथ्वी के तीनो देव ब्रह्मा विष्णु जी तथा शिवजी का गुणगान क्या हैं. भगवान कृष्ण ने गीता में उपदेश देते हुए कहा था कि मैं स्वयं गायत्री हूँ.

गायत्री मंत्र व इसका अर्थ- Meaning Of Gayatri Mantra in Hindiगायत्री मंत्र का अर्थ | Gayatri Mantra Meaning in Hindi

Gayatri Mantra in Hindi – Meaning and Translation

मंत्र- ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्

बुद्धि को निर्मल, पवित्र एवं उत्कृष्ट बनाने का महामंत्र है गायत्री मंत्र. गायत्री माता का आंचल श्रद्धापूर्वक पकड़ने वाला जीवन में कभी निराश नही रहता. गायत्री उपासना का अर्थ है सत्प्रेरणा को इतनी प्रबल बनाना कि सन्मार्ग पर चले बिना रहा ही न जा सके.

प्रणव (ॐ) का अर्थ- परमात्मा सभी प्राणियों में समाया हुआ है, इसलिए निष्काम भाव से सभी के प्रति समर्पित होकर कर्म करों.


भू का अर्थ हैं– शरीर अस्थायी औजार मात्र हैं, उस पर अत्यधिक आसक्त न होकर आत्मबल बढ़ाओं श्रेष्ट मार्ग का अनुसरण करो.


भुवः का अर्थ– कुसंस्कारों से जूझता रहने वाला मनुष्य देवत्व को प्राप्त करता हैं.

 


स्वः का अर्थ– विवेक द्वारा शुद्ध बुद्धि से सत्य को जानने, संयम और त्याग की नीति का आचरण करने के लिए अपने को तथा दूसरों को प्रेरणा देनी चाहिए.

 


तत का अर्थ- वही बुद्धिमान है, जो जीवन और मरण के रहस्य को जानता हैं. भय और आसक्ति रहित जीवन जीता हैं.


सवितुः का अर्थ– मनुष्य को सूर्य के समान तेजस्वी होना चाहिए और सभी विषय तथा अनुभूतियाँ अपनी आत्मा से ही सम्बन्धित हैं, ऐसा विचारना चाहिए.


वरेण्यम का अर्थ– प्रत्येक को श्रेष्ट देखना, श्रेष्ट चिन्तन करना, श्रेष्ट विचारना, श्रेष्ट कार्य करना चाहिए, पापों से सदैव सावधान रहना चाहिए.


देवस्य का अर्थ– देवताओं के समान शुद्ध दृष्टि रखने से परमार्थ कर्म में निरत रहने से मनुष्य के भीतर और बाहर देवलोक की सरष्टि होती हैं.


धीमहि का अर्थ– हम सब लोग ह्रदय में सब प्रकार की पवित्र शक्तियों को धारण करें. इसके बिना मनुष्य सुख शांति को प्राप्त नही होता.


धियो का अर्थ– शब्द बतलाता है कि बुद्धिमान को चाहिए कि वह उचित अनुचित का निर्णय तर्क, विवेक और न्याय के आधार पर वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए करे.


यो नः का अर्थ– हमारी जो भी शक्तियाँ एवं साधन है, उनके न्यून से न्यून भाग को ही अपनी आवश्यकता के प्रयोग में लाए, शेष निस्वार्थ भाव से असमर्थों में बाँट दे.


प्रचोदयात् का अर्थ– मनुष्य अपने आपकों तथा दूसरों को सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे.


गायत्री मंत्र की उपासना सत्प्रेरणा को इतनी प्रबल बनाती हैं कि सन्मार्ग पर चले बिना रहा ही नही जा सकता, संसार का सबसे बड़ा बल है आत्मबल, यह गायत्री साधक को प्राप्त होता हैं. अपने व्यक्तित्व को सुसंकारित बनाने वाले साधक को गायत्री महाशक्ति मातृवत संरक्षण प्रदान करती हैं.

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