स्त्री पुरुष समानता निबंध हिंदी | Gender Equality Essay In Hindi

स्त्री पुरुष समानता निबंध हिंदी Gender Equality Essay In Hindi: भारतीय संस्कृति ने महिला व पुरुष को समाज रुपी गाड़ी के दो पहिये माना हैं. दोनों के समान रूप से प्रगति से ही समाज की उन्नति सम्भव हैं. वैदिक काल से लेकर उत्तर मध्य काल तक भारत में नारियों व पुरुषों के मध्य कोई भेद नहीं माना जाता था. मगर अन्धकार मय मध्यकाल एवं विदेशी आक्रमणों के कारण हिन्दू समाज में स्त्री पुरुष की समानता में खाई बन गई, आज हम कक्षा 1,2,3,4,5,6,7,8,9,10 के बच्चों के लिए यहाँ Essay Gender Equality In Hindi का आर्टिकल यहाँ सरल भाषा में बता रहे हैं.

स्त्री पुरुष समानता निबंध हिंदी Gender Equality Essay In Hindi

Gender Equality Essay In Hindi

प्रकृति की रचना को ईश्वर ने बड़े ध्यान से की हैं. संसार की प्रत्येक वस्तु दूसरी चीज से पूर्णतया रंग आकार, गुण आदि में भिन्न हैं, शायद परमात्मा ने स्त्री पुरुष के चित में भी यही फर्क बनाया हैं जिसके चलते दोनों के बीच भिन्नता गुण स्वरूप को अर्थ पूर्ण रूप दिया हैं. आपसी बुनियादी भिन्नता के कारण ही दोनों में आकर्षण व प्रेम उत्पन्न हो पाया हैं जो अनवरत सृष्टि के नियमों का आधार भी हैं.

स्त्री पुरुष जितने दूर हो जितना फासला हो उनकी दूरियां बढने की बजाय आपसी प्रेम बढ़ता जाता हैं. जो रिश्तों के रूप में हम दैनिक जीवन में देखते हैं. इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि स्त्री पुरुष के बीच पूर्ण समानता को स्थापित किया जा सकता हैं क्योंकि एक समाज के रूप में दोनों एक दूसरे के पूरक होते हैं.

अगर एक पुरुष गणित विषय का ज्ञाता हैं और स्त्री भी गणित की विद्वान् हैं तो उनकी यह समानता निकट लाने की बजाय दोनों में ईष्या तथा घ्रणा को जन्म देगी, वही यदि पुरुष गणित का जानकार हैं तथा महिला धर्म, काव्य, संगीत किसी की समझ रखती हैं तो यह असमानता भी उन्हें एक दूसरे से आकर्षित करेगी तथा नजदीक ले आएगी.

हमारी संस्कृति में स्त्री को देवी का रूप माना गया हैं. माँ के रूप में उनके ममत्व गुण की तुलना न तो पुरुष कर सकता हैं न दुनिया की कोई अन्य वस्तु. पश्चिम में आज जिस तेज गति से परिवार टूट रहे हैं उसकी वजह वहां की परिवार व्यवस्था ही हैं. यदि भारत में ऐसा होने लगे तो कोई अचम्भे की बात नहीं हैं.

आज हम स्त्री पुरुष समानता की बात करते हैं और यह समानता उस स्तर तक चाहते हैं जो शायद प्रकृति के नियमों के साथ खिलवाड़ करने वाली हैं. हाल ही के वर्षों में स्त्री पुरुष समानता के नाम पर एक मांग जोरों से उठ रही हैं कि अब स्त्रियों को भी पुरुष टॉयलेट में जाने की इजाजत मिलनी चाहिए. कहने भर में यह घिनौनी बात लगती हैं. क्यों हमें ऐसी समानता चाहिए और इस तरह की मांग करने वाले लोगों का वैचारिक स्तर किस ढंग का हैं और उनका पोषण कहाँ से होता हैं ये विचारणीय प्रश्न हैं.

कोई नहीं चाहेगा कि स्त्रियों को केवल इस आधार पर राजनीति, खेल, शिक्षा, चिकित्सा में अवसर न मिले क्योकि वे स्त्री हैं. ऐसा कतई नहीं हैं. भारत में आज नगरीय जीवन में आपकों स्त्री पुरुष में भेदभाव या असमानता के उदाहरण खोजे नहीं मिलेगे. मगर फिर भी समानता का डमरू बजाने भर के लिए स्त्रियों के हक के स्वर को बुलंद करने वाले ngo और संस्थाओं की प्रष्ठभूमि जाननी होगी.

हाँ हमें स्वीकार करना चाहिए कि एक लम्बा दौर चला जब हमारी बहिनों बेटियों माताओं के साथ दोअम दर्जे का व्यवहार हुआ, मगर इसके लिए जिम्मेदार समाज न होकर उस समय की परिस्थतियाँ थी. बाल विवाह, पर्दा प्रथा, कन्या भ्रूण हत्या जैसे नासूर ऐसे लोगों के कारण पनपे क्योंकि वे नारी को केवल भोग की वस्तु समझते थे. समाज सुधारकों एवं समाज में जागृति ने समय के साथ इन कुरीतियों को त्यागा हैं. आज तीन तलाक, हलाला जैसे विषयों को भी समाप्त कर देश के एक वर्ग ने स्त्री पुरुष समानता की ओर कदम बढाएं हैं.

लड़का लड़की एक समान पर निबंध, gender equality essay in hindi (250 शब्द)

लिंग समानता का विषय लम्बे अरसे से चर्चा का विषय रहा हैं. जिम्मेदारियों अधिकारों और अवसरों के सन्दर्भ में स्त्रीपुरुष की समानता की बात कही जाती हैं. भारत में आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं तथा बालिकाओं को पुरुषों के मुकाबले कमतर आँका जाता हैं. जबकि इन्होने कई बार स्वयं को पुरुषों से मुकाबला कर साबित किया हैं.

हमारा समाज तभी आगे बढ़ सकता हैं जब स्त्री पुरुष में एक स्तर तक समानता के अवसर समाज में सर्वसुलभ हो. आज कई क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ स्त्रियाँ चाहते हुए भी योग्य होने के उपरांत भी अपना योगदान नहीं दे पाती हैं. जिसके चलते आधी आबादी की क्षमता का समाज सदुपयोग नहीं कर पाता हैं.

लिंग समानता और इसका महत्व:

हमारे समाज में लोगों की दोहरी मानसिकता पर शर्म ही की जा सकती हैं. एक तरफ हम कष्ट पीड़ा निवारण के लिए देवी दुर्गा को पूजते हैं विद्या के लिए सरस्वती मैया तथा दरिद्रता भगाने के लिए माँ लक्ष्मी की कृपा मानते हैं. यानी हमने ही स्त्री को देवी मानकर उन्हें पूजनीय बनाया मगर दूसरी तरफ हम उसी देवी रूप स्त्री को स्वयं से कमतर आकने की गलती करते हैं.

हमने ऐसी मानसिकता बनाई हैं कि लड़की है तो पढ़ना लिखना ऑफिस जाना या राजनीति में उनका कोई काम नहीं हैं वह घर के काम सीखे तथा बच्चों की ढंग से परवरिश करे, समय पर हमारे लिए खाना बनाए. करती हैं स्त्री अपनी ड्यूटी वह जीवन भर एक दिन भी अपने कर्तव्य से विमुख नहीं होती, दिन भर जुआ खेलने और रात को शराब पीकर घर आने वाले पति के लिए भी वह थाली में खाना परोसकर देती हैं.

वहीँ अगर कभी वो किसी कारण वंश घर का काम एक समय के लिए नहीं कर पाती हैं तो उन पर किन तरह के कहर बर्फाये जाते हैं इस की खबरे हमें समाचार पत्रों में पढ़ने को मिल जाती हैं. वक्त बदला हैं हमें नई सोच को स्वीकार करना होगा तथा स्त्री को पुरुष के समान ही समानताएं देनी होगी, तभी सच्चे अर्थों में हमारा समाज और देश आगे बढ़ पाएगा. इसकी शुरुआत हमें अपने घर से करनी चाहिए.

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