खानवा का युद्ध कारण और परिणाम | 1527 Battle Of Khanwa In Hindi

Khanwa ka Yudh खानवा का युद्ध कारण और परिणाम | 1527 Battle Of Khanwa In Hindi: मेवाड़ व महाराणा सांगा के इतिहास में खानवा के युद्ध Khanwa Battle 1527 का महत्वपूर्ण योगदान हैं. भारत में मुगलों और मेवाड़ के राजपूतों के मध्य यह पहला युद्ध था. जिनके लिए कई कारण थे जिसका परिणाम राणा सांगा को इस युद्ध में पराजय का सामना करना पड़ा था. Rana Sasha and Babar Khanwa Battle In Hindi को हिंदी में विस्तार से जानेगे.

खानवा का युद्ध कारण और परिणाम | 1527 Battle Of Khanwa In Hindiखानवा का युद्ध कारण और परिणाम 1527 Battle Of Khanwa In Hindi

खानवा का युद्ध – Battle of Khanwa 1527 in Hindi खानवा युद्ध के परिणाम (Khanwa yudh ke parinam): जब मध्य एशिया में बाबर अपना राज्य स्थापित करने में असफल रहा तो लोदी सरदारों के आमंत्रण पर वह भारत आया और उसने यहाँ अपना साम्राज्य स्थापित करना चाहा

इस क्रम में उसने दिल्ली को जीत लिया. बाबर के लिए दिल्ली पर अधिकार करना सरल था. किन्तु अपनी शक्ति को दृढ़ बनाये रखना कठिन था. उत्तर पश्चिम भारत की विजय और पानीपत में इब्राहिम लोदी की हार ने बाबर को केन्द्रीय हिंदुस्तान का स्वामी बना दिया था.

लेकिन अब भी उसके समक्ष दो प्रतिद्वंदी थे राजपूत और अफगान. युद्ध परिषद ने अफगान शक्ति का सामना करने को सुझाया फिर भी इस बीच घटनाक्रमों ने बाबर का ध्यान सांगा की ओर केन्द्रित कर दिया. सांगा व मुगल सम्बन्धों में युद्ध के निम्न लिखित कारण थे.

खानवा युद्ध के कारण (Causes Of Battle of Khanwa 1527 in Hindi)

समझौतों का उल्लंघन 

बाबर ने अपनी आत्मकथा बाबरनामा में लिखा है कि राणा सांगा का दूत काबुल में उसके पास एक संधि प्रस्ताव लेकर उपस्थित हुआ और यह निश्चित हुआ कि बाबर पंजाब की ओर से इब्राहिम पर आक्रमण करेगा और राणा सांगा आगरा की ओर से.

आधुनिक शोध से यह स्पष्ट हो गया हैं कि इस प्रकार का समझौता अवश्य हुआ था. किन्तु डॉ गोपीनाथ शर्मा के अनुसार पहल राणा की ओर से न की जाकर बाबर की ओर से की गई. तथा उल्लंघन सांगा द्वारा किया गया था. अतः बाबर सांगा से युद्ध करना चाहता था.

धार्मिक कारण

पानीपत युद्ध के परिणाम ज्ञात होते ही राणा ने अपना साम्राज्य विस्तार प्रारम्भ कर दिया. रणथम्भौर के पास खंडार दुर्ग सहित करीब 200 स्थानों पर उसने अधिकार कर लिया जो इससे पूर्व सल्तनत के अधीन थे. अतः बाबर का चिंतित होना स्वाभाविक ही था. राणा स्वयं को हिन्दू धर्म का रक्षक मानता था. उधर बाबर चाहता था कि उस कि उस इस्लामी शासन को बनाये रखा जाय जो दिगत कुछ शताब्दियों से भारत आ रहा था.

राजपूत अफगान गठबंधन

राणा ने महमूद लोदी तथा हसन खां मेवाती को अपने पक्ष में लिया. यह अफगान राजपूत मैत्री बाबर के लिए अत्यधिक खतरनाक सिद्ध हो सकती थी. अनेक अफगान राणा के पास ससैन्य पहुचने लगे. इस मैत्री से बाबर चिंतित हुआ तथा संघर्ष अनिवार्य हो गया.

दोनों की महत्वकांक्षा

बाबर एवं सांगा दोनों ही महत्वकांक्षी थे, अतः युद्ध अवश्यभावी हो गया था. दोनों ओर युद्ध की तैयारियाँ होने लगी.

खानवा का युद्ध का इतिहास (History of the Battle of Khanwa In Hindi)

बाबर की गतिविधियों का अवलोकन कर राणा सांगा ससैन्य जनवरी 1527 ई के अंत में चित्तौड़ से रवाना हुआ, रणथम्भौर होता हुआ दह बयाना पंहुचा और 16 फरवरी को महंदीख्वाजा से बयाना दुर्ग छीन लिया. इसके बाद राजपूत सेना ने भुसावर में पड़ाव डालकर बाबर को काबुल एवं दिल्ली से मिलने वाली सहायता को रोक दिया.

1 मार्च 1527 ई को राणा सांगा फतेहपुर सिकरी से 16 किमी उत्तर पश्चिम में स्थित खानवा के मैदान में आ गया. बाबर आगरा से 16 फरवरी को रवाना हुआ. उसकी सेना की दशा बड़ी दयनीय थी. बयाना युद्ध से भागे हुए सैनिकों ने राजपूत शक्ति का बढ़ा चढ़ा कर वर्णन किया तथा मुगल सेना को हतोत्साहित कर दिया.

सभी कायरता की बाते करने लगे. ईरान के ज्योतिषी मुहमद शरीफ की भविष्यवाणी विजय में संदेह ने स्थति को और अधिक जटिल बना दिया था. बाबर चिंतित तो था किन्तु विचलित नहीं हुआ. उसने अपने शराब पीने के सभी पात्र तुड़वा दिए तथा भविष्य में कभी कभी शराब न पीने की कसम खाई.

साथ ही सेना के समक्ष उसने एक कुटनीतिक ओजस्वी भाषण भी दिया, जिससे सेना में नवीन उत्साह का संचार हुआ और सैनिक युद्ध करने को तैयार हो गये. सांगा व बाबर के नेतृत्व में दोनों सेनायें आमने सामने डटी रही और शनिवार मार्च 16, 1527 ई को प्रातः 9:30 बजे भीषण युद्ध प्रारम्भ हुआ.

बाबर ने पानीपत के आधार पर ही सेना की गृह रचना की. मुगल तोपखाने द्वारा भयंकर आग बरसाने पर भी वीर राजपूतों ने अपने निरंतर आक्रमणों से बाबर के होश गुम कर दिए गये थे. इस बीच राणा सांगा के तीर लग जाने से बेहोशी की हालत में उसे मैदान से हटा लिया गया. राणा के बाद सलुम्बर के रावत रतनसिंह और झाला अज्जा ने युद्ध जारी रखा किन्तु राजपूतों की हार हुई.

खानवा युद्ध में राणा सांगा की हार के कारण

सैनिक संख्या की अधिकता एवं सांगा जैसे योग्य नेतृत्व के उपरान्त भी राजपूत पराजित हुए, इस पराजय के निम्नांकित कारण थे.

  1. विश्वासघात– कर्नल टॉड, श्यामलदास ने राणा की हार का प्रमुख कारण सिलह्दी तंवर का विश्वासघात माना हैं. जब युद्ध चल रहा था तब तंवर बाबर से मिल गया तथा सांगा की सैनिक कमजोरियों का ज्ञान कराया जिसका लाभ बाबर ने उठाया.
  2. दैवीय प्रभाव- हरविलास शारदा का मानना है कि युद्ध के समय सांगा की आँख में तीर लग जाने से वह सैन्य संचालन नहीं कर सका. युद्ध क्षेत्र से हटने के समाचार मिलते ही सेना में भगदड़ मच गई और यह हार का कारण बना.
  3. सांगा की सेना में एकता का अभाव– राणा की सेना में विविध वंशीय सैनिक थे. जो अपनी अपनी मान्यता के अनुसार युद्ध में शामिल हुए थे. और उनका सम्बन्ध जितना राणा से नहीं था उतना अपने वंशीय नेता से था. सम्पूर्ण सेना पर राणा का प्रभाव इन वंशीय नेताओं के माध्यम से था. इस प्रकार की सेना में एकसूत्र अनुशासन रहना संभव नहीं था.
  4. अपवित्र गठबंधन– रशब्रुक विलियम ने अफगान राजपूत गठबंधन को अपवित्र माना हैं. दोनों में जो उत्साह होना चाहिए वह नहीं था. दोनों के आदर्श व उद्देश भिन्न थे. दोनों वर्ग एक दूसरे को संदेह की दृष्टि से देखते थे. युद्ध के समय इस प्रकार आपसी संदेह हार में बदल सकता था.
  5. राणा की निष्क्रियता– एलिफंसटन के अनुसार यदि राणा सांगा मुगलों की प्रथम घबराहट पर ही आगे बढ़ जाता हैं. तो उसकी विजय निश्चित थी. डॉ ओझा के अनुसार राणा को बयाना विजय के बाद खानवा पहुच जाना चाहिए था. यों उसने पहली विजय के बाद एकदम युद्ध न करके बाबर को तैयारी करने का सुअवसर प्रदान कर दिया था.
  6. पैदल सेना की अधिकता– राजपूतों में पैदल सैनिक अधिक थे, जबकि मुगलों की सेना अधिकांश में घुड़सवारों की थी. द्रुतगति व पैंतरेबाजी की चाल में पैदल और घुड़सवारों का कोई मुकाबला नहीं था.
  7. बाबर का तोपखाना– राजस्थानी यौद्धाओं को पहली बार तोप का सामना करना पड़ा था. बारूद के प्रयोग, तोपों और बन्दूकों की तुलना में तीर कमान भाले तलवारें बर्छिया आदि निम्न कोटि के थे, तीर गोलियों का प्रत्युतर नहीं दे सके.
  8. उन्नत मुगल सैनिक पद्धति– मुगल रिजर्व तथा घुमाव पद्धति को प्रधानता देते थे और बारी बारी से इनका प्रयोग करते थे. साथ ही इनमें तोपों और घुड़सवारों की आक्रमण विधि में एक संतुलन था. मुगल नेता व सेनापति सुरक्षित रहते हुए युद्ध का संचालन करते थे वहां राजपूत एक धक्के की विधि से शत्रु दल में भगदड़ मचा कर, राजपूत सेना सजधज के साथ हाथी पर बैठकर स्वयं अपना शौर्य प्रदर्शित करता था जिससे वह शीघ्र ही सभी बातों का शिकार बन जाता था. राजपूत सैनिक परम्परागत युद्ध की गतिविधि से परिचित थे और उसी में विशवास रखते थे. मुगल व्यवस्था एक परिष्कृत सैनिक अवस्था थी जिसमें अफगान, उजबेग, तुर्क, मंगोल, फ़ारसी, भारतीय आदि युद्ध प्रणालियों को समाविष्ट किया गया था. अतः पुरातन और नवीन पद्धति की कोई तुलना न थी. इन कारणों से सांगा व राजपूती सेना खानवा के मैदान में बाबर से लड़ती हुई पराजित हुई.

खानवा युद्ध का परिणाम (Battle Of Khanwa In Result Hindi)

खानवा का युद्ध जो कोई 10 घंटे चला अविस्मरणीय युद्धों में से एक था. युद्ध का निर्णय अंत समय तक तुला में लटका रहा. पानीपत के युद्ध का कार्य खानवा के युद्ध ने कार्य किया. इसने राजपूतों के भारतीय राज्य के स्वप्न को भंग कर दिया. इसके परिणाम निम्नांकित रहे.

बाबर की कठिनाइयों का अंत

खानवा का युद्ध एक निर्णायक युद्ध था. इस युद्ध ने बाबर की कठिनाइयों का अंत कर दिया. उसे अपने जीवन की रक्षार्थ जगह जगह घूमना पड़ा था. काबुल से भारत आने पर भी उसे शान्ति नहीं मिली थी. राणा सांगा पर विजय प्राप्त करने के उपरान्त बाबर तथा उसके सैनिकों को किसी प्रकार की चिंता न रही और उनके लिए भारत में आगे विजय करना सरल हो गया.

राजपूत शक्ति खंडित

रशब्रुक विलियम्स ने बताया कि इस युद्ध से भारतवर्ष की सार्वभौमिकता राजपूतों के हाथ से निकल कर मुगलों के हाथ में चली गई थी. लेनपूल ने इस विजय को अंतिम और पूर्ण माना हैं. उसका तो मानना है कि यदि बाबर राजपूतों का पीछा करता तो एक भी राजपूत जीवित नहीं रह सकता था.

निसंदेह यह कथन अतिशयोक्ति पूर्ण हैं. राजपूतों की सैनिक शक्ति खंडित हो गई थी किन्तु पुर्णतः नष्ट नहीं हुई. सय बाबर ने भी यह माना हैं कि राजपूत हारे हैं परन्तु उनकी शक्ति नष्ट नहीं हुई. अतः उसने खानवा युद्ध के बाद राजस्थान पर आक्रमण करने की नहीं सोची.

राणा का स्वप्नं भंग

मेवाड़ के लिए तो इस युद्ध के घातक प्रभाव ही हुए हैं. सांगा का यह सम था कि वह बाबर को परास्त कर हिन्दू साम्राज्य की स्थापना करेगा परन्तु उसका स्वप्न साकार न हो सका और सांगा की पराजय उसकी मृत्यु का कारण बनी.

मुगल साम्राज्य की स्थापना

इस युद्ध के परिणाम स्वरूप भारतवर्ष में मुगल साम्राज्य की स्थापना हुई जो आगामी 200 वर्षों तक बना रहा. तब कोई ऐसा नरेश नहीं था. जो कि मुगलों का सामना कर पाता. वास्तव में इस युद्ध ने पानीपत के कार्य को पूरा कर दिया. इसके बाद राजपूत कभी संगठित नहीं हो सके.

बाबर के स्थायी राज्य की स्थापना

इस युद्ध के राजनीतिक परिणाम भी महत्वपूर्ण रहे थे. जैसा कि बताया गया बाबर का घुम्मकड जीवन समाप्त हो गया. अब तक वह काबुल के गीत गाया करता था. उसे यह देश अच्छा नहीं लगता था किन्तु इस विजय ने उसे काबुल को भूला दिया और शेष जीवन उसने भारत में ही बिताया.

बाबर की राजल की भावना में परिवर्तन

अब बाबर की राजत्व भावना में भी बड़ा परिवर्तन आया, उसने बादशाह की उपाधि धारण की. वह शासक के दैवी सिद्धांतों में विश्वास करता हुआ अपने आपकों ईश्वर की प्रतिछाया मानता था जिसे धीरे धीरे लोगों के ह्रदय में भी स्थान कर लिया.

अफगानों के विध्वंस में सरलता

खानवा के युद्ध में राजपूतों की शक्ति का विनाश हो जाने से बाबर को अफगानों की बची हुई शक्ति की विध्वंस करने में तथा विद्रोह का दबाने में बड़ी सहायता मिली.

युद्ध प्रणाली में परिवर्तन

खानवा युद्ध के बाद युद्ध के तरीको में भी भारी परिवर्तन हो गया था. राजपूत भी गोला बारूद के प्रयोग से परिचित हुए तथा हाथियों का महत्व घटने लगा. नई रणनीति तुलुगमा पद्धति का प्रयोग आरम्भ हुआ.

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