राजस्थान की राजधानी जयपुर कैसे बनी इतिहास | How Jaipur Became Rajasthan Capital History In Hindi

राजस्थान की राजधानी जयपुर कैसे बनी इतिहास | How Jaipur Became Rajasthan Capital History In Hindi: रियासतों के एकीकरण के फलस्वरूप बनने वाले राजस्थान की राजधानी कहाँ रखी जाए, यह वर्ष 1948-49 के दौरान एकीकरण के समय एक महत्वपूर्ण प्रश्न था. केंद्र सरकार के रियासती विभाग ने राजस्थान की राजधानी के चयन के लिए एक समिति गठित की जिसमें चार शहरों की दावेदारी पर विचार किया गया.

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When did Jaipur became the capital of Rajasthan? Why Jaipur is capital of Rajasthan? Why Jaipur is called Jaipur?: ये राज्य थे जयपुर, जोधपुर, अजमेर व उदयपुर. समिति में श्री बी आर पटेल (मुख्य सचिव पटियाला व ईस्ट पंजाब) अध्यक्ष ले कर्नल टी सी पूरी व श्री एपी सिन्हा सदस्य थे.

इस समिति ने 12 मार्च 1949 से कार्य करना आरम्भ किया. समिति के सामने विचारणीय योग्य विभिन्न मुद्दे थे जैसे प्रशासनिक सुविधा, भवनों की उपलब्धता, जलवायु पेयजल की सुविधा, बिजली व अन्य सुविधाएं.

राज्य के केंद्र में स्थित होने और भविष्य में राजस्थान के विलय की सम्भावना के बावजूद अजमेर की दावेदारी, पर्याप्त पेयजल की अनुपलब्धता व आवासीय समस्या के कारण निरस्त कर दी गई.

उदयपुर अपनी जलवायु व नयनाभिराम प्राकृतिक सौन्दर्य के कारण एक प्रबल दावेदार था, किन्तु आवासीय समस्याएं, पर्याप्त पेयजल, तार, फोन व सड़क परिवहन की कमी के कारण वह इस दौड़ में पिछड़ गया. चुनाव अब जयपुर और जोधपुर के बीच था.

समिति ने निर्णय लिया कि जयपुर में उपलब्ध विभिन्न सुविधाएं जैसे चौड़ी सड़कें, आवास उपलब्धता, भूमिगत जल निकासी व्यवस्था व बेहतर दूर संचार सुविधाएं, उनके राजधानी बनने में सहायक थी. और अन्तः जयपुर को राजस्थान की राजधानी घोषित कर दिया गया. यदपि समिति का निर्णय निर्विरोध और निर्विवाद नहीं था.

अजमेर के विलय के बाद राजधानी का प्रश्न फिर उठाया गया क्योकि अजमेर शासकीय हलकों में यह भावना व्याप्त थी कि जयपुर को राजधानी बनाने का निर्णय अस्थायी था. अजमेर राज्य सरकार द्वारा सशक्त तर्क राजधानी के पक्ष में भारत सरकार के गृह मंत्रालय को दिए जिसने जुलाई 1957 में पी सत्यनारायण राव की अध्यक्षता में राजस्थान कैपिटल इन्क्वायरी कमेटी गठित की गई. परन्तु पहले का निर्णय यथावत रहा.

7 अप्रैल 1949 को रियासती विभाग के परामर्श के अनुसार श्री हीरालाल शास्त्री के नेतृत्व में सरकार का गठन किया गया. सरकार के संचालन के लिए कई सलाहकार केंद्र सरकार द्वारा भी नियुक्त किये गये.

इस प्रकार राजस्थान का एकीकरण पूर्ण हुआ. इस भागीरथी प्रयास के सफल होने में सर्वाधिक श्रेय केन्द्रीय गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल व उनके विभाग के सचिव श्री बी पी मेनन को दिया जा सकता हैं. जिन्होंने समय की नब्ज पहचानते हुए कभी नरमी तथा कभी रक्त व लौह नीति (Blood And Iron) का पालन किया.

श्री वी पी मेनन के अनुसार हमने राज्यों के हित व शेष भारत के हितों के बीच खड़े सारे कृत्रिमअवरोध नष्ट कर दिए और एकीकृत प्रशासनिक व वित्तीय प्रशासन की नीव डाली.

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