सिन्धु सरस्वती सभ्यता | Indus Saraswati Civilization In Hindi

Indus Saraswati civilization in Hindi: सिन्धु और सरस्वती नदी अब भौतिक रूप में विद्यमान नही है. भू सरंचना में परिवर्तन के कारण यह विलुप्त हो गई है. वर्तमान में अस्तित्व में नही होने के कारण कतिपय विद्वान सरस्वती नदी को मात्र कल्पना मान रहे है. लेकिन भू उपग्रह द्वारा खिची गई तस्वीरों से सरस्वती नदी के बहाव क्षेत्र का अब पता लग गया है. सिन्धु घाटी सभ्यता (indus valley civilization) इतिहास, समय काल, उदय, अंत लोगों का जीवन इस प्रकार था.

सिन्धु सरस्वती सभ्यता | Indus Saraswati Civilisation in hindi

indus valley civilization in hindi-अतः सलिला आज भी यह प्रवाहित है. वैदिक साहित्य रामायण व महाभारत में सरस्वती नदी के अस्तित्व के पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध होते है. महाभारत युद्ध के समय कृष्ण के भाई बलराम ने सरस्वती नदी पर स्थित तीर्थों की यात्रा की थी. इसका विवरण प्राप्त होता है.

राजस्थान के मरुप्रदेश में भी सरस्वती नदी के किनारे बसे कई नगरो के पुरातात्विक अवशेष आज भी विद्यमान है, कालीबंगा उनमे से एक है. जो हनुमानगढ़ जिले में स्थित है.

सिन्धु घाटी सभ्यता (indus valley civilization in hindi)

सिन्धु व सरस्वती नदी तथा इसकी सहायक नदियों के विस्तृत भूभाग में विकसित मानव सभ्यता को सिन्धु सरस्वती सभ्यता के नाम से जाना जाता है. इस विकसित सभ्यता के बारे में पहले किसी को पता नही था कि भारत की प्राचीन सभ्यता का प्रमुख केंद्र रहा है.

यह सभ्यता मिटटी के टीलों में दबी हुई थी, मिटटी के टीलों में दबी हुई इस सभ्यता का काल क्या था? यह कब चरमोत्कर्ष पर थी और कब इसका अवसान हुआ? इस बारे में विद्वानों में मन्तैक्य नही है. लेकिन मौटे तौर पर यह माना जाता है कि इस सिन्धु सरस्वती सभ्यता का जन्म काफी पहले हुआ था और 3250 ईसा पूर्व तक यह पूर्ण रूप से विकसित हो गई थी.

इसके बाद यह 3250 से 2750 ईसा पूर्व तक चरम विकास पर पहुच गई थी. फिर 2750 ईसा के बाद इस सभ्यता का अवसान प्रारम्भ हुआ और 1500 के पूर्व तक आते आते यह विलुप्त हो गई.

सिन्धु सरस्वती सभ्यता का उत्खनन (Exploration of Indusa Saraswati civilization)

सन 1921 में राय बहादूर दयाराम साहनी ने अविभाजित भारत के पंजाब प्रान्त के मांटगोमरी जिले के हड़प्पा नामक कस्बे के पास बहने वाली रावी नदी के बाएँ किनारे पर स्थित एक पुरातात्विक टीलें की खोज की.

रायबहादुर दयाराम साहनी की तरह ही भारत के अन्य पुरातत्ववेत्ता राखलदास बनर्जी ने सन 1922 में अविभाजित भारत के सिंध प्राप्त के लरकाना जिले में बहने वाली सिन्धु नदी के पूर्वी किनारे पर स्थित मोहनजोदड़ो नामक टीलें की खोज की.

मोहनजोदड़ो का अर्थ होता है मुर्दों का टीला. इस टीले की खुदाई से नौ बार बसने और नौ बार उजड़ने वाले एक व्यवस्थित नगर के अवशेष बाहर निकल आए. खोज के क्रम में आरलस्टाइन ने पूर्वकालीन बहावलपुर रियासत हाकरा नदी, जो भारत की विलुप्त प्राचीन सरस्वती नदी के विस्तार का क्षेत्र था.

इसके सूखे रास्ते ग्यारह पुरातात्विक स्थल खोज निकाले सिन्धु सरस्वती सभ्यता से सम्बधित अब तक 1500 स्थल खोजे गये हैं उनमे से 900 स्थल भारत में हैं.

तथा 600 स्थल पाकिस्तान में हैं सन 1947 में भारत के विभाजन के बाद सिन्धु सरस्वती सभ्यता के कुछ पुरातात्विक बड़े स्थल हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, गनवेरीवाला आदि पाकिस्तान के हिस्से में चले गए. कालीबंगा, राखीगढ़ी, धोलावीरा, लोथल, रंगपुर आदि बड़े पुरातात्विक भारत में हैं.

भारत के पुरातत्व विशेषज्ञों और इतिहासकारों ने स्वतंत्र भारत में सन 1947 के बाद नये ढंग से कार्य प्रारम्भ किया. पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में सिन्धु घाटी और उसके पहले तथा समानान्तर प्रणाली पर विकसित होने वाली सरस्वती दर्षद्वती नदीं घाटी से सम्बधित कई स्थल खोज निकाले.

सन 1953 में अमलानन्द घोष ने राजस्थान के बीकानेर संभाग में लगभग 25 पुरातात्विक स्थलों की खोज की. जिसमे सबसे प्रमुख कालीबंगा हैं.

पंजाब में रोपड़, बाड़ा, संधोल, गुजरात में रंगपुर, लोथल, रोजदी, हरियाणा में राखीगढ़ी, बनवाली, मिताथल आदि स्थानों पर सिन्धु सरस्वती संभ्यता के अवशेष मिले हैं.

सिन्धु -सरस्वती सभ्यता की विशेषता (Indus-Sarsvati civilization characteristic in hindi)

  • नगर नियोजन  (town planning)

सिन्धु सरस्वती सभ्यता के विकसित और उन्नत स्तर को प्रकट करने वाले अवशेषों में सबसे महत्वपूर्ण अवशेष इस सभ्यता से सम्बधित नगरो के हैं.

ऐसे नगरावशेषो में हडप्पा व मोहनजोदड़ो (दोनों अब पाकिस्तान में) कालीबंगा (राजस्थान) राखीगढ़ी (हरियाणा) तथा धोलावीरा लोथल (गुजरात) के अवशेष अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं.

इन नगरो के अवशेषों से यह तथ्य भी उद्घाटित होता हैं कि सिन्धु सरस्वती सभ्यता काल  के भारतवासी पहले योजना बनाकर अपने नगरो और नगरो में निर्मित किए जाने वाले भवनों व आवासों का निर्माण करते थे.

उनका भवन निर्माण कला सम्बन्धी ज्ञान आधुनिक स्थापत्य अभियांत्रिकी (सिविल इंजीनियरिंग) के स्तर का था.

  • सिंधुघाटी सभ्यता में नगर की आवास योजना (Municipal Housing Plan)

सिन्धु -सरस्वती सभ्यता के नगरो की सुव्यवस्थित सड़क प्रणाली के परिणामस्वरूप स्वत ;नगरो की आवास योजना में एक व्यवस्था उत्पन्न हो गई थी और नगर कई खंडो और मोहल्लो में विभक्त होकर सुनियोजित स्वरूप में उभर गए थे.

सामान्यतया प्रत्येक मकान में बीच  में खुला आंगन रखा जाता था और आंगन के चारों तरफ कमरे बनाए जाते थे. लगभग सभी मकानों में पानी रखने के फिरोने या परेडे शोचालय और स्नानघर अलग से निर्मित होते थे.

  • सड़क व्यवस्था (Road system)

सिन्धु सरस्वती सभ्यता से सम्बद्ध नगरो की सड़के पूर्व से पच्शिम उतर से दक्षिण की तरफ सीधी समान्तर निर्मित की गई थी सड़के एक दुसरे को समकोण पर काटती थी जहाँ चोराहे बने हुए थे.

नगरो की मुख्य और बड़ी सड़के सामान्यतया 10 मीटर, छोटी सड़के 5 मीटर तथा गलियाँ एक से दो मीटर तक चौड़ी होती थी. सडकों के किनारों पर स्थान स्थान पर कूड़ा कचरा डालने के लिए कचरापात्र रखे रहते थे.

  • सिन्धु घाटी सभ्यता में नगर की सफाई जल निकास प्रणाली एवं स्वच्छता का प्रबंध (Cleanliness of drainage system and cleanliness of the city in Indus Valley Civilization)

सिन्धु सरस्वती सभ्यता से सम्बन्धित नगरों और नगरो के मकानों में स्वच्छता और सफाई की समुचित व्यवस्था देखने को मिलती है. नगरों की गलियाँ, सडको और मुख्य सड़क पर बनी बड़ी बड़ी नालियों और गटरों से सहज ही यह अनुमान लगाया जा सकता है, कि मकानों मोहल्लों और पूरे नगर से गंदा पानी बाहर निकालने की समुचित व्यवस्था थी.

रोजमर्रा का कूड़ा कचरा डालने के लिए सड़कों पर जगह जगह कुड़ापात्र रखे गये थे. सिन्धु सरस्वती सभ्यता के नगरों में निजी मकानों एवं नगरों में सार्वजनिक सफाई और स्वच्छता का प्रबंध नजर आता है.

जिससे यह साफ़ जाहिर हो जाता है कि सिंधु सभ्यता काल में भारतवासियों का जीवन स्तर उच्च था, वे शोभा और दिखावे के स्थान पर सुविधा और उपयोगिता को अधिक महत्व देते थे. और स्वास्थ्य के प्रति जागरूक थे.

  • विशेष सामग्री एवं भग्नावशेष (Special Materials & Landscape)

सिन्धु सरस्वती सभ्यता के काल के विभिन्न नगरों की पुरातात्विक खुदाई में कुछ विशेष प्रकार की निर्मितियाँ भवन और इमारतों के भग्नावशेष मिले है.

इसमें नगर के गढ़ी वाले भाग में रक्षा प्राचीर, धातु पिघलाने के स्थान, भट्टियाँ, यज्ञ वेदियाँ, विशाल स्नानागार तथा विशाल अन्नागार आदि प्रमुख है. ये अवशेष सभ्यता की उन्नति व वैज्ञानिकता के प्रमाण है.

सिन्धु घाटी सभ्यता के लोगों का सामाजिक जीवन (The social life of the people of Indus Valley Civilization)

सिन्धु सरस्वती सभ्यता से सम्बन्धित विभिन्न स्थानों की खुदाई में कई ऐसी वस्तुएं मिली है, जिनसे यह पता चलता है कि उस काल में समाज में कई तरह के काम धंधे करने वाले लोगों से मिलकर बना था.

व्यक्ति अपनी योग्यता के अनुसार विभिन्न कार्य कर सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने में अपना योगदान देता था, धार्मिक, प्रशासनिक, चिकित्सा, सुरक्षा और उत्पादन कार्य प्रमुख थे.

  • सिन्धु कालीन परिवार व्यवस्था (Indus Valley Family System)

सिन्धु सरस्वती सभ्यता काल के भवनों व मकानों की व्यवस्था के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि उनके समाज की प्रमुख ईकाई परिवार ही था. बहुत अधिक संख्या में नारियों की मूर्तियाँ मिलने से यह माना जाता है कि सिन्धु सरस्वती सभ्यता के काल के समाज और परिवार में नारी को सम्मान जनक स्थान प्राप्त था.

पर्दा प्रथा प्रचलित नही थी, स्त्रियाँ चाँदी व तांबे के आभूषन पहनती थी, ये लोग सूती वस्त्र पहनते थे, इन्हें अस्त्र शस्त्र का भी ज्ञान नही था. मनोरंजन के साधनों में संगीत, नृत्य व शिकार प्रमुख थे.

सिन्धु सरस्वती सभ्यता के लोग गेहू, जौ, चावल, दूध तथा मासाहार का भोजन में उपयोग करते थे.

सिंधु कालीन सभ्यता में लोगों का आर्थिक जीवन स्तर (Economic life standard of people in Indus Valley Civilisation)

  • कृषि एवं पशुपालन (Agriculture and animal husbandry)

कालीबंगा में जुते हुए खेत के अवशेष मिले है. इससे लगता है कि सिन्धु सरस्वती सभ्यता के लोग खेती करते थे. वस्तुओं पर बने चित्रों के आधार पर पता चलता है कि सिन्धु सरस्वती सभ्यता काल के लोग गेहूं, जौ, चावल, तिल आदि की खेती करते थे. फल भी उगाते थे.

कृषि के साथ पशुपालन सिंधुघाटी सभ्यता से सम्बन्ध लोगों का दूसरा मुख्य व्यवसाय था, पालतू पशुओं में गौवंश का बहुत अधिक महत्व था.

  • व्यापार व वाणिज्य (Trade and commerce)

यहाँ के निवासी तांबे व कांसे के बर्तन व औजार बनाने के साथ ही मिट्टी के बर्तन व मटके बनाने की कला में भी निपुण थे. चन्हुदड़ों तथा कालीबंगा की खुदाई में तोल के अनेक बाट मिले है.

मोहनजोदड़ो में सीप की एक टूटी पटरी मिली है. ये अवशेष उनके उन्नत और विकसित व्यापारिक तथा गणित सम्बन्धी ज्ञान के परिचायक है. गुजरात में लोथल नामक स्थान पर खुदाई में निकली एक गोदी (बन्दरगाह) के अवशेषों से पता चलता है कि यह समुद्री यातायात का प्रमुख केंद्र था.

मिस्त्र, सुमेर, सीरिया आदि दूर के देशों से इनके घनिष्ट व्यापारिक सम्बन्ध थे. भारत व मेसोपोटामिया की खुदाई से प्राप्त वस्तुओं में समानता मिलना इस बात का प्रमाण है कि उनमे आपस में वस्तुओं का क्रय विक्रय होता था.

व्यापार की उन्नत व्यवस्था के कारण ही सिन्धु सरस्वती सभ्यता को व्यापार प्रधान सभ्यता कहा जाता है.

सिंधु कालीन सभ्यता में लोगों का धार्मिक जीवन स्तर (Religious living standards of Indus Valley Civilisation)

सिन्धु सरस्वती सभ्यता काल के लोग प्रमुख रूप से प्राकृतिक शक्तियों के उपासक थे. तथा पृथ्वी, पीपल, नीम, जल, सूर्य, अग्नि आदि में देवी शक्ति मानकर उनकी उपासना करते थे.

मूर्तियों और मुद्राओं तथा ताबीजों के आधार पर यह स्पष्ट हो जाता है कि बलि प्रथा तथा जादू टोना आदि अंधविश्वास भी प्रचलित थे. लोथल, बनावली एवं राखीगढ़ से प्राप्त अग्नि वेदिकाओं से लगता है वहां यज्ञ और अग्नि पूजा का प्रचलन रहा होगा.

मूर्तियों की उपासना के लिए धूप जलाई जाती थी. मातृदेवी व शिव की उपासना भी की जाती थी. मृतक संस्कार शव को गाढ़कर या दाहकर्म करके किया जाता था.

सिंधु घाटी सभ्यता का अंत कैसे हुआ (How the Indus Valley Civilization ended)

सिन्धु लिपि अभी सही ढंग से पढ़ी नहीं जा सकी है. अनुमान है कि इस सभ्यता का पतन प्राकृतिक कारणों से हुआ. वहां उस युग में रहने वाले निवासियों द्वारा परिश्रम से बनाए गये नगर भुपरिवर्तन से खंडहर बन गये.

किन्तु उस अतीत में विकसित सभ्यता और संस्कृति के तत्व नष्ट नही हो सके, उसका आगे आने वाले युगों में भारतीय जनजीवन में परोक्ष प्रभाव बना रहा. भारतीय संस्कृति के प्रारम्भिक चरणों के निर्माण में सिन्धु सरस्वती सभ्यता का महत्वपूर्ण योगदान रहा.

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