Jagannath Puri Rath Yatra 2018 | जगन्नाथ पुरी रथ यात्रा 2018

Jagannath Puri Rath Yatra 2018 temple images history Essay Story In Hindi:- पुरी का श्री जगन्नाथ मंदिर भारत के उड़ीसा राज्य में हैं, भगवान कृष्ण को समर्पित यह हिन्दुओं के चार धामों में से एक हैं. जगन्नाथ पुरी रथ यात्रा 2018 का आगाज 14 जुलाई से हो रहा हैं. इस तिथि से प्रसिद्ध जगन्नाथ रथयात्रा का शुभारम्भ हो जाएगा. राज्य सरकार द्वारा Jagannath Puri Rath Yatra के लिए राज्य सरकार द्वारा विशेष तैयारी व प्रबंध किये जाते है. लाखों की संख्या में देशी व विदेशी यात्री यहाँ दर्शन करने आते हैं. पुरी शहर समुद्र तट पर स्थित हैं, इसका शाब्दिक अर्थ होता संसार का स्वामी.

Jagannath Puri Rath Yatra 2018 | जगन्नाथ पुरी रथ यात्राJagannath Puri Rath Yatra 2018 | जगन्नाथ पुरी रथ यात्रा 2018

आषाढ़ शुक्ल पक्ष द्वितीया को जगन्नाथ रथ यात्रा का उत्सव मनाया जाता हैं. इस दिन भगवान का रथ सुभद्रा सहित बड़े धूम धाम से निकाला जाता हैं. जगन्नाथ पुरी में भगवान जगदीश का जो रथ निकाला जाता हैं, वो पूरे भारत में विख्यात हैं.

जगन्नाथ जी का जो रथ उठता हैं वह ४५ फीट ऊँचा, ३५ फीट चौड़ा तथा ३५ फीट लम्बा होता हैं, जिसमें 16 पहिये होते हैं. इसी तरह सुभद्रा जी का रथ ४३ फुट ऊँचा तथा १२ पहियों वाला होता हैं. प्रतिवर्ष नयें रथों का इस्तमोल किया जाता हैं.

मंदिर के सिंह द्वार से रथासीन होकर भगवान जनकपुर की ओर प्रस्थान करवाएं जाते हैं. जनकपुर पहुचने पर भगवान वहां तीन दिन निवास करते हैं. इसी स्थल पर लक्ष्मी जी से भी उनका साक्षात्कार होता हैं. तत्पश्चात पुनः रथ जगन्नाथपुरी को लौट आता हैं.

जगन्नाथ रथों का निर्माण

इस रथयात्रा के लिए विशेष प्रकार से निर्मित रथों का प्रयोग किया जाता हैं. इन रथों की सबसे खास बात यह हैं, कि इनकें निर्माण में तनिक भर भी धातु का उपयोग नही किया जाता है. सम्पूर्ण रथ सामग्री को नीम के वृक्ष की लकड़ी से बनाया जाता हैं. इसके निर्माण का जिम्मा मंदिर संचालन समिति द्वारा गठित समिति को दिया जाता हैं.

यह समिति कई दिन पूर्व से इस कार्य में जुट जाती हैं, तथा पूर्ण स्वास्तिक नीम के वृक्ष की इस कार्य के लिए टीका जाता हैं, उस पहचाने गये पेड़ को आमभाषा में दारु के नाम से पुकारा जाता हैं. हरे व गेरुएँ रंग से निर्मित बलराम रथ को तालध्वज, जगदीश रथ को नदीघोष अथवा गुरुद्ध्वज कहा जाता हैं, जिनमें लाल एवं पीले रंग की प्रधानता होती हैं. नीले व काले रंग से निर्मित रथ  दर्पदलन’ या ‘पद्म रथ कहा जाता है, जो सुभद्रा जी का रथ होता है.

जगन्नाथ पूरी रथ यात्रा की कहानी | Jagannath Puri Rath Yatra Story In Hindi

पुरी की इस रथ यात्रा से जुडी कई पौराणिक कथाएँ एवं मान्यताएं हैं. पुरी का संबंध भगवान श्री कृष्ण से हैं तथा इनके साथ भाई बलराम तथा बहिन सुभद्रा से जुड़े प्रसंग सुनने को मिलते हैं. यहाँ आपको पुरी रथ यात्रा से जुडी कुछ स्टोरी संक्षिप्त में बता रहे हैं.

  1. कहते हैं, कि कृष्ण की बहिन सुभद्रा अपने पीहर में आती है, तथा बलराम व श्रीकृष्ण से शहर यात्रा के बारे में इच्छा जताती हैं, तब दो भाई व बहिन रथ में बैठकर नगर की यात्रा को निकलते हैं. तथा इस मान्यता के कारण आज भी रथयात्रा निकाली जाती हैं.
  2. प्रसिद्ध गुडिचा मंदिर में विराजमान देवी को बलराम सुभद्रा श्रीकृष्ण की माँ की जसोदा की बहिन बताया जाता हैं, मौसी के आग्रह पर तीनों उनके घर रथ के द्वारा मिलने गये थे, जिसकी परम्परा में हर साल रथ यात्रा का आयोजन होता हैं.
  3. कुछ लोग इस यात्रा को मामा कंस से जोड़ते हैं, माना जाता हैं कि कंस के बुलाने पर कृष्ण व भाई बहिन रथ में बैठकर जातर हैं, जबकि यह भी विश्वास हैं, कि कंस की मृत्यु के उपरांत नन्दलाल अपने भाई बलराम को राज्य की सैर रथ द्वारा करवाते हैं.

जगन्नाथ मंदिर से जुड़ा इतिहास ( Jagannath Puri Rath Yatra History)-

मान्यता है, कि भगवान श्री कृष्ण के देह त्यागने पर उन्हें द्वारका लाया जाता हैं. इनकी मृत्यु का सबसे अधिक कष्ट बड़े भाई बलराम तथा बहिन सुभद्रा को होता हैं. भाई कृष्ण के पार्थिव शरीर को देखकर बलराम इसे लेकर समुद्र में कूद जाते हैं. साथ में सुभद्रा भी कूद जाती हैं.

उसी समय की बात हैं. राजा इन्द्रद्युम्न जो नीलांचल सागर, उड़ीसा के शासक हुआ करते थे, एक रात्रि में उन्हें स्वप्नं आया, जिसमें उन्हें भगवान कृष्ण को समुद्र में तेरते हुए देखा. अपने स्वपन की सच्चाई पता करने के लिए जब वे सुबह समुद्र तट पर गये तो वहां कृष्ण का कंकाल मिला. इस पर उन्होंने एक भव्य कृष्ण मंदिर बनाने की सोची.

राजा कई दिनों तक मन ही मन विचार कर ही रहा था, कि कौन बढ़ई इसे बना सकता हैं, तभी विश्वकर्मा स्वयं बढ़ई का अवतार लेकर आए, तथा बोले राजन व्यथित ना हो, मूर्तियाँ मैं बना दूंगा, मगर मेरी एक शर्त हैं, मैं उसी घर में काम करुगा जहाँ मुझे कोई स्त्री पुरुष न देख सके. मुझे न तो कुछ खाने की जरूरत हैं न पीने की. शर्तनुसार बढ़ई राजा के एक बंद कमरे में ठहरे.

कुछ दिन बीतने के बाद रानी को यह शंक हुआ कि भला कैसे कोई इंसान बीना खाएं पीएं काम कर सकता हैं, उसने जब दरवाजा खोला तो विश्वकर्मा जी अपनी शर्त के अनुसार अन्तर्धान हो गये, तथा अधूरी कृष्ण, बलराम तथा सुभद्रा की मूर्तियाँ वहां पड़ी थी. जब राजा को इस बात का पता चला तो वह बहुत व्याकुल हुआ.

तभी तेज गर्जना के साथ आकाशवाणी हुई ” राजन दुखी मत हो” इन मूर्तियों को गंगाजल से पवित्र कर सुभद्रा की इच्छा के अनुसार कृष्ण, बलराम तथा सुभद्रा की रथयात्रा पर ले जाओं और इन्हें स्थापित कर दो. माता सुभद्रा की नगर भ्रमण इच्छा में हर साल रथ यात्रा का आयोजन किया जाता हैं.

2018 श्री जगन्नाथ रथ यात्रा / ଶ୍ରୀ ଜଗନ୍ନାଥ ରଥ ୟାତ୍ରା JAGANNATH PURI RATHA YATRA ESSAY HINDI / BAHUDA YATRA

यह रथ यात्रा (Ratha Yatra) भारत के प्रसिद्ध उत्सवों की तरह मनाई जाती हैं, 9-10 दिनों तक धूमधाम से रथ यात्रा का आयोजन किया जाता हैं. कृष्ण, बलराम तथा सुभद्रा के रथ 9 दिनों तक चलते हैं, फिर मुख्य धाम पुरी की ओर प्रस्थान करते हैं, जिन्हें बहुडा कहा जाता हैं. भारत के अतिरिक्त कुछ अन्य देशों में भी इसे मनाया जाता हैं. तीनों रथों को दो सौ किलोंग्राम सोने के साथ सजाया जाता हैं.

हर हिन्दू अपने जीवन में जगन्नाथ पुरी की यात्रा करने का पुण्य पाता हैं. भगवान की इस नगरी में रथ यात्रा के दौरान रथ की रस्सी खीचने की परम्परा हैं, लाखों जात्री इस आशा में पुरी पहुचते है, कि वो भी इस रस्सी को अपना हाथ लगाकर अपने जीवन को सफल बना सके.

आप सभी को hiHINDI की तरफ से RATHA YATRA 2018 की हार्दिक शुभकामनाएं ! Happy Jagannath Ratha Yatra 2018.

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