यीशु मसीह जीवन परिचय – Jesus Christ Biography in hindi

यीशु मसीह जीवन परिचय – Jesus Christ Biography in hindi : इतिहास में कई बड़े पुरुष हुए कालान्तर में वह युग उनके नाम से जाना गया तथा उनके द्वारा कही गई बातों एवं संदेशों ने एक पंथ व धर्म का आकर ग्रहण कर लिया. एक ऐसे ही पुरुष थे यीशु मसीह अर्थात ईसा मसीह जिन्हें हम आधुनिक ईसाई धर्म का संस्थापक भी मानते हैं. दुनियां के सबसे बड़े धर्म के संस्थापक यीशु मसीह की जीवनी जीवनी परिचय कहानी में आज हम Jesus Christ Biography आपके साथ साझा कर रहे हैं.

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Jesus Christ Biography in hindi

यीशु मसीह जिन्हे ईसाई धर्म का संस्थापक माना जाता हैं. ईसाई धर्मावलम्बियों का मानना है कि वे ईश्वर के पुत्र थे. यीशु को कई अलग अलग नामों ईसा मसीह, जीसस क्राइस्ट, नासरत का यीशु आदि से भी जाना जाता हैं. 4 ई पू को बेथलेहेम, जुडिया, रोमन साम्राज्य में इनका जन्म हुआ था. इनके पिता का नाम युसुफ तथा माँ का नाम मरियम था, जेम्स, जोसेफ, जुडास, साइमन इनके भाई थे.

ईसाई धर्म ग्रंथ बाइबल में यीशु के बारे में विस्तार से जानकारी मिलती हैं. यीशु ग्रीक शब्द ‘इसुआ’ का अंग्रेजी अनुवाद है, जिसका अर्थ है “जीवन देने वाला तथा इस धार्मिक पुस्तक में मसीह का नाम तक़रीबन ९०० बार प्रयोग हुआ हैं. यीशु का कोई उपनाम नही था जिसके कारण लोगों ने इसे यीशु मसीह अर्थात जीवन देने वाला अभिषिक्त जन के रूप में पुकारना शुरू कर दिया.

जॉन की माँ एलिजाबेथ और यीशु की मां मरियम चचेरी बहनें थी, एलिजाबेथ के गर्भ से जॉन का जन्म हुआ था. जबकि मरियम कुंवारी थी अलौकिक शक्ति से उनके गर्भ से यीशु का जन्म हुआ ऐसा कई पुस्तकों में पढने को मिलता हैं.

कई स्त्रोतों में यीशु का जन्म 25 दिसम्बर के दिन माना जाता है इसी मान्यता के चलते हर साल इस दिन को क्रिसमस डे के रूप में मनाया जाता हैं. यहूदी लोग इस दिन को हनुकाह के पर्व के रूप में मनाते हैं.

इनका जन्म फिलिस्तीन के बेथलेहम में हुआ था उस समय यहूदियों के राजा महान रोमन हेरोदेस हुआ करते थे. वह बेहद क्रूर शासक था जिसने राज्य में जन्में सभी नवजात बच्चों को मारने का आदेश दे दिया था. जब उन्हें एक चमत्कारी बालक यीशु के जन्म के बारे में पता चला तो उन्हें यह भय सताने लगा कि कही वह यहूदियों का राज्य न खो दे.

यीशु के पिता यूसुफ लकड़ी का काम करते थे जिनके बाद यीशु ने भी कई वर्षों तक इसे जारी रखा. बताया जाता है कि यीशु ने ३० साल की उम्रः में भी जन सेवा के कार्य में स्वयं को समर्पित कर दिया. ४० दिनों तक उपवास तथा ४० महीने तक अपने धर्म का प्रचार भी किया.

अपने जीवनकाल में यीशु ने कुल ३७ चमत्कार दिखाए जिनमें से पहला उपदेश उन्होंने माउंट पहाड़ी पर दिया था. इन चमत्कारों में इन्होने 3 मृत्युप्राप्त लोगों को पुनः जीवित कर दिया था. सबसे चमत्कारी रूपांतरण उनके परलोक जाने की घटना थी जिसमें वे अपने प्रेरितों के साथ आसमान में जाकर लुप्त हो गये.

२९ वर्ष की आयु तक यीशु अपने पिता का पुश्तैनी कार्य करते रहे. ३० साल की उम्रः में उनको ज्ञान की प्राप्ति हुई. यही वर्ष से इन्होने धर्म प्रचार का कार्य शुरू कर दिया. इजराइल की जनता से इन्होंने अपने धर्म के प्रचार की शुरुआत की. यीशु का मानना था कि गॉड एक है जो प्रेम रूप में सभी इंसानों को प्यार करता हैं. व्यक्ति को क्रोध में आकर किसी से बदला लेने की बजाय क्षमाभाव का गुण रखना चाहिए, वे लोगों को स्वयं मसीहा, ईश्वर की संतान तथा स्वर्ग के द्वार बताते हैं.

यहूदी कट्टरपंथी यीशु को अपना दुश्मन मानते थे. वे इन्हें केवल पाखंडी समझते थे तथा उनके द्वारा स्वयं को ईश्वर का दूत कहना विरोधियों को सबसे बुरा लगा. इन कट्टरपंथियों ने मिलकर यीशु की शिकायत रोमन गवर्नर पिलातुस से की. इन लोगों को खुश करने के लिए पिलातुस ने ईसा को क्रूस पर मृत्यु की सजा दी.

उनके साथ अमानवीय व्यवहार किया जाने लगा. कोड़ों से चमड़ी उड़ेल देने वाली पिटाई की जाने लगी. उनके सिर पर तीखे काँटों का ताज सजाया गया, लोगों ने उन पर थूका भी. अन्तः उनके पैर में क्रूस की कील ठोककर लटका दिया गया.

यह शुक्रवार का दिन था इस कारण ईसाई धर्म इतिहास में इस दिन को गुड फ्राइडे के रूप में याद किया जाता हैं. इतनी अमानवीय वेदना के साथ मरते हुए भी ईसा ने सभी के पाप स्वयं पर लेते हुए कहा कि हे ईश्वर इन सभी को माफ़ करना, क्योंकि इन्हें पता नही कि ये क्या कर रहे हैं.

बाइबिल की माने तो अपनी मृत्यु के तीन दिन बाद यीशु पुनः जीवित हो गये थे. एक महिला ने उसे अपनी कब्र के पास जीवित देखा तथा इस घटना को ईसाई धर्म में ईस्टर डे के रूप में मनाया जाता हैं. ईस्टर के चालीस दिन बाद ईसा स्वर्ग लोग को सिधार गये.

ईसा मसीह ने अपने 12 मुख्य शिष्यों के सहयोग से अपने धर्म का प्रचार किया. आज चलकर यह ईसा का धर्म अर्थात ईसाई कहलाया. उनके कई संदेश आज के युग में बड़े उपयोगी है उन्होंने कहा था जैसा व्यवहार आप अपने लिए सोचते है ऐसा दूसरो के साथ भी करिए, ईश्वर की सेवा का सरल उपाय यह है कि एक दुसरे इन्सान की सेवा करे.

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